कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय
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आईसीएआर-एनआईबीएसएम में राष्ट्रीय महिला किसान दिवस पर टिकाऊ कृषि और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने का सन्देश

70 किसानों ने लिया भाग, आयवर्धक कृषि पद्धतियों और पोषण सुरक्षा पर विशेषज्ञों ने साझा की जानकारी

बटेर पालन, पोषण वाटिका और वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन से आजीविका बढ़ाने पर जोर

प्रविष्टि तिथि: 15 OCT 2026 6:34PM by PIB Raipur

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के रायपुर स्थित राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (एनआईबीएसएम) में राष्ट्रीय महिला किसान दिवस के अवसर पर जागरूकता एवं ज्ञान-साझाकरण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में 70 किसानों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य कृषि विकास, ग्रामीण आजीविका और परिवारों की पोषण सुरक्षा में महिला किसानों की भूमिका को रेखांकित करने के साथ उन्हें टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना था।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय ने कृषि विकास और ग्रामीण समृद्धि में महिला किसानों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने महिलाओं के ज्ञान एवं कौशल को सशक्त बनाने तथा टिकाऊ कृषि तकनीकों तक उनकी पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इससे आजीविका के अवसरों का विस्तार करने, संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित करने और कृषक परिवारों के जीवन स्तर में सुधार लाने में मदद मिलेगी।

कार्यक्रम के दौरान आयवर्धक एवं पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों पर चार विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किए गए। प्रधान वैज्ञानिक डॉ. पी. मुवेंथन ने वैकल्पिक आजीविका के साधन के रूप में बटेर पालन की संभावनाओं और कृषि परिवारों की आय में विविधता लाने में इसकी उपयोगिता की जानकारी दी। वैज्ञानिक डॉ. प्रियंका मीणा ने कीटनाशकों के अनियंत्रित उपयोग से पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में बताया। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए कीटनाशकों के विवेकपूर्ण एवं सुरक्षित उपयोग की आवश्यकता रेखांकित की।

वैज्ञानिक डॉ. अजय वर्मा ने पारिवारिक पोषण सुरक्षा में पोषण वाटिका की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि घर के आसपास पोषण वाटिका विकसित करने से परिवारों को ताजी और पौष्टिक सब्जियां उपलब्ध कराने के साथ उनके पोषण स्तर में सुधार लाने में मदद मिल सकती है। वहीं, प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एस. के. शर्मा ने वर्मीकम्पोस्ट उत्पादन, जैविक पोषक तत्व प्रबंधन और कृषि अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन पद्धतियों को अपनाकर किसान स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं और बाहरी कृषि निवेशों पर निर्भरता कम कर सकते हैं।

कार्यक्रम के माध्यम से किसानों को आजीविका के विविधीकरण, कीटनाशकों के सुरक्षित उपयोग, पोषण सुरक्षा तथा स्थानीय संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी प्रदान की गई। संस्थान ने वैज्ञानिक जागरूकता, टिकाऊ कृषि तकनीकों और किसान-केंद्रित क्षमता विकास के माध्यम से कृषक समुदायों को सशक्त बनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। कार्यक्रम का समन्वय प्रधान वैज्ञानिक डॉ. के. सी. शर्मा ने किया।


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आरडीजे/बीकेटी


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