गृह मंत्रालय
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज मुंबई में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई द्वारा आयोजित गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया
मोदी सरकार एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई को हरसंभव समर्थन और सहयोग दे रही और आगे भी देगी
आने वाले दिनों में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई भारतीय ज्ञान परंपरा का वाहक बनकर उसे देशभर में पहुंचाएगी
महाराष्ट्र की भूमि की ऊर्जा में ही सरस्वती की ऊर्जा समाहित है, एशियाटिक सोसाइटी की नई टीम ज्ञान की इस संपदा का विस्तार करे
ज्ञान को डिजिटल बनाकर देशभर के पुस्तकालयों के साथ साझा किया जाए और अपनी धरोहरों को संभालने वाली संस्थाओं व पुस्तकालयों का एक साझा मंच बने
'ज्ञान भारतम' राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन से भी एशियाटिक सोसाइटी जुड़ी है, ये गांव-गांव में बिखरे ज्ञान व पांडुलिपियों को एकत्रित कर शोध की व्यवस्था बनाये
भारत को आर्थिक और रक्षा की दृष्टि से विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनाने का बीज इन्हीं पांडुलिपियों में निहित है, इस पर शोध निरंतर आगे बढ़ाया जा रहा है
इंडोलॉजी का उद्देश्य भारत की व्यवस्थाओं को समझ लंबे कालखंड तक जनता पर शासन करना था, जबकि भारतीय ज्ञान परंपरा का उद्देश्य सदैव विश्व कल्याण रहा
डी-कॉलोनाइजेशन की प्रक्रिया इतिहास मिटाना नहीं; इसका अर्थ इतिहास को संपूर्ण, प्रामाणिक और भारतीय दृष्टिकोण के साथ फिर से लोगों के सामने रखना है
जो राष्ट्र अपनी स्मृति, इतिहास, भाषा व परंपराओं की रक्षा नहीं करता, वह मिट जाता है और जो इनकी रक्षा करता है, वो गुलामी के बाद भी खड़ा रहता है,भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है
विश्व का मार्गदर्शन करने के लिए खड़े हुए भारत के ओजस्वी ज्ञान को अनेक शक्तियों ने मिटाने का प्रयास किया, किंतु वे सफल नहीं हो सके
नालंदा का पुस्तकालय तो जलाया जा सकता है; पर जो ज्ञान श्रुति और स्मृति के रूप में लोगों के चित्त में बस चुका है, उसे कोई समाप्त नहीं कर सकता
हमारी परंपरा की विशेषता यह है कि पराजय में धैर्य रखकर आगे बढ़ते हैं और विजय मिलने पर पराजित का नाश किए बिना उसे अपनी परंपरा में जोड़ने का प्रयास करते हैं
अंग्रेजों ने ज्ञान और सत्ता को एक-दूसरे में गूंथ दिया था, आज हमारा काम ज्ञान को सत्ता से मुक्त कर, ज्ञान के आधार पर सत्ता की रचना करना और उसी आधार पर देश को आगे बढ़ाना है
प्रविष्टि तिथि:
13 SEP 2026 5:40PM by PIB Delhi
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज मुंबई में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई द्वारा आयोजित गणेश ज्ञानार्थी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फड़णवीस, उप-मुख्यमंत्री श्री एकनाथ शिंदे और एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई के अध्यक्ष डॉ. विनय सहस्रबुद्धे सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री अमित शाह ने कहा कि वे एशियाटिक सोसाइटी में गृह मंत्री के नाते नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा को सहस्त्र वर्षों तक आगे ले जाने के आंदोलन के एक सहभागी के रूप में आए हैं। श्री शाह ने विश्वास जताया कि एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई भारतीय ज्ञान परंपरा की वाहक बनकर इसे देशभर में पहुंचाएगी।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि जो राष्ट्र अपनी स्मृति, इतिहास, संस्कार, भाषा, अभिलेख और परंपराओं की रक्षा नहीं कर सकता, वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसके पतन में देर नहीं लगती; और जो राष्ट्र अपनी स्मृति, इतिहास, परंपराएँ, संस्कार, अभिलेख, भाषा और व्याकरण की रक्षा करता है, वह कितने भी वर्षों तक गुलाम रहे, उसे कोई सच्चे अर्थों में गुलाम नहीं बना सकता। उन्होंने कहा कि विश्व का मार्गदर्शन करने के लिए खड़े हुए भारत के ओजस्वी ज्ञान को अनेक शक्तियों ने मिटाने का प्रयास किया, किंतु वे सफल नहीं हो सके। श्री शाह ने कहा कि नालंदा का पुस्तकालय तो जलाया जा सकता है; महीनों तक धुआँ उठे, इतनी प्रचंडता से उसे भस्म किया जा सकता है, पर जो ज्ञान श्रुति और स्मृति के रूप में लोगों के चित्त में बस चुका है, उसे कोई समाप्त नहीं कर सकता।

श्री अमित शाह ने कहा कि हमारे देश का संस्कार है कि जब हम पराजित होते हैं, तो धैर्य रखकर आगे बढ़ते हैं; और जब विजयी होते हैं, तो जिन पर विजय प्राप्त की है, उनकी स्मृतियों को नष्ट किए बिना उन्हें अपनी परंपरा से जोड़ने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा ज्ञान कभी किसी विचारधारा का बंधक नहीं होता। ज्ञान स्वयं एक विचारधारा है; उसे किसी भी प्रकार से बाँध दिया जाए, तो ज्ञान का अर्थ ही बदल जाता है। श्री शाह ने कहा कि ज्ञान मुक्त होना चाहिए, उन्मुक्त होना चाहिए और उसकी उद्घोषणा भी मुक्त तथा उन्मुक्त होनी चाहिए। इसलिए एशियाटिक सोसाइटी किसने बनाई और किस उद्देश्य से बनाई, इसमें उलझने के बजाय यह देखना चाहिए कि आज जो ज्ञान और संग्रह हमारे सामने पड़ा है, उसका उपयोग महान भारत की रचना में कैसे हो सकता है।
केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि एशियाटिक सोसाइटी को यदि समझना है, तो ‘इंडोलॉजी’ शब्द को भी समझना पड़ेगा। मुद्राशास्त्र, पुरालेखशास्त्र, रूपविज्ञान, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषाविज्ञान, दर्शनशास्त्र, साहित्य, धर्मशास्त्र और व्याकरण — इन सब को मिलाकर इंडोलॉजी की रचना हुई। इसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान-परंपरा का वह उद्देश्य नहीं था, जिसका लक्ष्य विश्व और ब्रह्मांड का कल्याण है। उस समय इसका उद्देश्य यहाँ की व्यवस्थाओं को समझकर लंबे कालखंड तक यहाँ की जनता पर शासन करना था। श्री शाह ने कहा कि जब कोई बाहरी शक्ति किसी सभ्यता का अध्ययन करती है, तो वह या तो अध्ययन करती है, या उसे परिभाषित करती है। इन दोनों में एक मूल अंतर है। अध्ययन करने पर उसे स्वीकारा भी जाता है और स्वयं को बदला भी जाता है। पर जब उसे परिभाषित किया जाता है, तो यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि उस परिभाषा का लक्ष्य क्या है। उन्होंने कहा कि इंडोलॉजी शब्द के अस्तित्व में आने के बाद प्रारंभिक वर्षों में यह खतरा निरंतर बना रहा।
श्री अमित शाह ने कहा कि भारत का ज्ञान भारत की आवाज़ में नहीं लिखा जा रहा था। वह औपनिवेशिक दृष्टिकोण की भाषा में लिखा जा रहा था, जिसका उद्देश्य समाज के भीतर एक सामूहिक हीनभावना पैदा करना और हमारी प्रजा के आत्मविश्वास को कम करना था। उन्होंने कहा कि जब प्रजा का आत्मविश्वास कम होता है, तो लंबे समय तक दासता का विरोध नहीं उठता। गृह मंत्री ने कहा कि ज्ञान की पूँजी की व्याख्या भी उसी दृष्टि से की गई, किंतु आज देश स्वतंत्र हो चुका है। आजादी के अस्सी से अधिक वर्ष बीत चुके हैं। सरकार भी बदली है, एशियाटिक सोसाइटी की समिति भी बदली है और अब विश्वास है कि ज्ञान का यह भंडार ब्रह्मांड, विश्व और देश के कल्याण के लिए प्रयुक्त होगा और यह सुनिश्चित करना संस्था की नई समिति की जिम्मेदारी है। श्री शाह ने कहा कि भारतीय ज्ञान-परंपरा के उद्देश्यों को समझकर देखना होगा कि यह ज्ञान देश सहित पूरे विश्व में कैसे फैले और इसे स्वीकृति कैसे मिले। उन्होंने कहा कि भारत रत्न पंडित पांडुरंग वामन काणे की कृतियों पर आधारित ‘काणे समग्र’ की रचना कर उसका एक-एक शब्द आने वाली पीढ़ी के लिए तैयार करना चाहिए, जिससे नई पीढ़ी का निर्माण हो। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की अनेक निधियाँ इस संस्था में मौजूद हैं।

गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि अंग्रेजों ने ज्ञान और सत्ता को एक-दूसरे में गुँथ दिया था। हमारा काम है ज्ञान और सत्ता का पूर्ण विच्छेद करना, ताकि ज्ञान के आधार पर सत्ता की रचना हो, और उसी आधार पर देश चले। ऐसी व्यवस्था बनाना एशियाटिक सोसाइटी का कार्य है। उन्होंने कहा कि देश में अक्सर कहा जाता है कि इतिहास मिटाया जा रहा है। श्री शाह ने कहा कि वे उन विद्वानों से सहमत नहीं हैं। डी-कॉलोनाइजेशन की प्रक्रिया इतिहास मिटाना नहीं है। इसका अर्थ है इतिहास को संपूर्ण, प्रामाणिक और भारतीय दृष्टिकोण के साथ फिर से लोगों के सामने रखना। यही डी-कॉलोनाइजेशन है और यह होना ही चाहिए। डी-कॉलोनाइजेशन का अर्थ मिटाना नहीं है। डी-कॉलोनाइजेशन का अर्थ सत्य को विश्व-कल्याण के लिए दुनिया के सामने रखना है। आज हम डी-कॉलोनाइजेशन की ओर बढ़े हैं। उन्होंने कहा कि एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई में महाभारत के चित्र, जैन कल्पसूत्र, बौद्ध धर्म के ऐसे दुर्लभ ग्रंथ उपलब्ध हैं, जिन्हें बहुत पहले बाहर आ जाना चाहिए था।
केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि महाराष्ट्र सारस्वतों की भूमि है। इस भूमि की ऊर्जा में ही सरस्वती की प्राथमिकता और महत्ता पहले से निहित है। उन्होंने कहा कि एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई की नई टीम से अपेक्षा है कि वह यहाँ पड़े ज्ञान के भंडार को विस्तार देगी। यह विस्तार तीन दृष्टि से होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एशियाटिक सोसाइटी का विस्तार हो और यहाँ उपलब्ध पांडुलिपियों को भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए ज्ञान भारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन से पूर्ण रूप से जोड़ा जाए। एशियाटिक सोसाइटी महाराष्ट्र के गाँव-गाँव में, विद्वानों के घरों में पुश्तैनी दस्तावेज़ एकत्र करने का अभियान चलाने और इन्हें ज्ञान भारतम पांडुलिपि सर्वेक्षण से जोड़ने की संभावना तलाशे। उन्होंने कहा कि यहाँ मौजूद पांडुलिपियों से जुड़े जितने विभाग बने हैं, ज्ञान भारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान के अंतर्गत उनमें शोध की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। श्री शाह ने कहा कि पांडुलिपियों में जो अगाध ज्ञान पड़ा है, उस पर अनुसंधान आवश्यक है। इनमें देश को आगे बढ़ाने की शक्ति निहित है। उन्होंने कहा कि ज्ञान भारतम पांडुलिपि मिशन की पहली अनौपचारिक बैठक में एक जैन साधु ने कहा था कि भारत को आर्थिक और रक्षा की दृष्टि से विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनाने का बीज इन्हीं पांडुलिपियों में भरा है। इस पर शोध की व्यवस्था होनी चाहिए।
श्री अमित शाह ने कहा कि उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेन्द्र फड़णवीस से कहा है कि वे सोसाइटी को शक्ति दें। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत सरकार एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई को हरसंभव समर्थन और सहयोग दे रही है और आगे भी देगी। श्री शाह ने कहा कि देश के हर गाँव, हर नगर और हर राज्य में ऐसे जितने भी संस्थान हैं, उन्हें एशियाटिक सोसाइटी ऑफ मुंबई से जोड़कर ज्ञान का एक साझा सम्पुट बनाना चाहिए, ताकि वह पूरे देश के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और अनुसंधानकर्ताओं के लिए उपलब्ध हो सके।
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RK/RR/PS/PR
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