प्रविष्टि तिथि:
27 AUG 2026 5:35PM by PIB Raipur
छत्तीसगढ़ में धान की फसल इस समय लगभग 45 दिन या उससे अधिक की हो चुकी है। किसानों द्वारा खरपतवार नियंत्रण, निराई-गुड़ाई तथा अन्य आवश्यक कृषि कार्य पूरे किए जा चुके हैं। संतुलित मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग से फसल की वृद्धि भी अच्छी हो रही है। आगामी दिनों में मौसम की परिस्थितियां विभिन्न कीटों के प्रकोप के लिए अनुकूल हो सकती हैं। वर्तमान अवस्था में लीफ फोल्डर (पत्ती मोड़क) तथा फसल की आगामी अवस्था में पीला तना छेदक धान के प्रमुख कीट हो सकते हैं। इसे देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान ने किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने और आवश्यकता के अनुसार समेकित कीट प्रबंधन उपाय अपनाने की सलाह दी है।

आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय ने किसानों से फसल की नियमित निगरानी करने तथा कीटों की प्रारंभिक अवस्था में पहचान सुनिश्चित करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि अनावश्यक और अंधाधुंध कीटनाशियों के प्रयोग से बचना चाहिए। इस अवस्था में धान की फसल की नियमित निगरानी अत्यंत आवश्यक है। कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर तक पहुंचने पर ही आवश्यक नियंत्रण उपाय अपनाने से उत्पादन लागत कम करने के साथ-साथ मित्र कीटों और पर्यावरण का संरक्षण किया जा सकता है।

संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि लीफ फोल्डर धान का प्रमुख कीट है। इसकी सूंडियां धान की पत्तियों को लंबाई में मोड़कर उनके भीतर रहती हैं और हरे ऊतकों को खुरचकर खाती हैं। इससे पत्तियों पर सफेद धारियां दिखाई देती हैं तथा प्रकाश संश्लेषण की क्षमता प्रभावित होती है। अधिक प्रकोप की स्थिति में फसल की वृद्धि और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने किसानों को खेतों में मुड़ी हुई पत्तियों, सूंडियों तथा पत्तियों पर दिखाई देने वाले विशिष्ट क्षति लक्षणों की नियमित जांच करने की सलाह दी। कीट का प्रकोप अनुशंसित आर्थिक क्षति स्तर से अधिक होने पर ही उचित नियंत्रण उपाय अपनाने को कहा गया है।
डॉ. शर्मा ने बताया कि फसल की वृद्धि के साथ पीला तना छेदक भी महत्वपूर्ण समस्या बन सकता है। इस कीट के भूरे रंग के अंड समूह प्रायः पत्तियों के सिरे के पास दिखाई देते हैं। अंडों से निकलने वाली सूंडियां तने में प्रवेश कर अंदर के ऊतकों को नुकसान पहुंचाती हैं। वानस्पतिक अवस्था में इसके प्रकोप से ‘डेड हार्ट’ तथा बाद की अवस्था में ‘व्हाइट ईयर’ यानी सफेद बालियों के लक्षण दिखाई देते हैं। इसलिए कीट की प्रारंभिक अवस्था में पहचान और प्रभावी नियंत्रण महत्वपूर्ण है।
किसानों को नियमित रूप से खेतों की निगरानी करने, दिखाई देने वाले अंड समूहों को एकत्र कर नष्ट करने तथा वयस्क कीटों की निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है। आवश्यकता के अनुसार ट्राइको-कार्ड का उपयोग भी किया जा सकता है। प्रभावित और अत्यधिक क्षतिग्रस्त पौधों तथा कोंपलों को खेत से निकालकर नष्ट करने से भी कीट का प्रकोप कम किया जा सकता है। कीटनाशियों का प्रयोग केवल आवश्यकता होने पर ही किया जाना चाहिए और इसके लिए अनुशंसित दवा, उचित फसल अवस्था तथा लेबल पर निर्धारित स्वीकृत मात्रा का पालन आवश्यक है।
डॉ. पी. के. राय ने कहा कि समेकित कीट प्रबंधन के अंतर्गत नियमित निगरानी एवं यांत्रिक उपाय, जैविक नियंत्रण, प्राकृतिक शत्रु कीटों का संरक्षण तथा आवश्यकता आधारित कीटनाशी प्रयोग धान में कीट प्रबंधन का प्रभावी और टिकाऊ तरीका है। उन्होंने किसानों से आगामी सप्ताहों में फसल की विशेष निगरानी करने तथा कीटों का असामान्य प्रकोप दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञों से तत्काल सलाह लेने का आग्रह किया।
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एसके/बीकेटी