जनजातीय कार्य मंत्रालय
12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर जनजातीय कार्य मंत्रालय ने ट्राइफेड के सहयोग से ‘रीसा: टाइमलेस ट्राइबल’ के माध्यम से भारत की समृद्ध जनजातीय वस्त्र विरासत का प्रदर्शन किया
भारत की जनजातीय बुनाई परंपराओं का उत्सव
प्रविष्टि तिथि:
07 AUG 2026 5:47PM by PIB Delhi
भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय तथा ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ट्राइफेड) ने 7 अगस्त, 2026 को 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर नई दिल्ली स्थित स्टेट एम्पोरिया कॉम्प्लेक्स, बाबा खड़क सिंह मार्ग में रीसा फ्लैगशिप स्टोर पर “ट्राइबल वीव्स ऑफ इंडिया” का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में ‘रीसा: टाइमलेस ट्राइबल’ के माध्यम से भारत की समृद्ध एवं विविध जनजातीय वस्त्र परंपराओं का प्रदर्शन किया गया।
कार्यक्रम का उद्घाटन जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव, श्रीमती रंजना चोपड़ा ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने सुदृढ़ बाजार संपर्कों के माध्यम से जनजातीय समुदायों के लिए सतत् आजीविका के अवसर सृजित करने के महत्व पर बल दिया, जिससे वे विशिष्ट वस्त्र खंड में अपनी अलग पहचान स्थापित कर सकें तथा व्यापक ग्राहक वर्ग की बदलती आकांक्षाओं को पूरा कर सकें। उन्होंने आगे कहा कि जनजातीय वस्त्र पीढ़ियों से संचित स्वदेशी ज्ञान, सांस्कृतिक पहचान और सतत् परंपराओं के प्रतीक हैं। साथ ही उन्होंने दोहराया कि रीसा जैसी पहलें इन परंपराओं के संरक्षण के साथ-साथ बाजार तक पहुंच का विस्तार करने तथा देशभर के जनजातीय शिल्पकारों के लिए बेहतर आजीविका के अवसर सृजित करने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती हैं।

सभा को संबोधित करते हुए ट्राइफेड के प्रबंध निदेशक श्री एम. राजमुरुगन ने कहा कि ‘रीसा: टाइमलेस ट्राइबल’ जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा प्रारंभ किया गया एक प्रीमियम ब्रांड है, जिसका संचालन ट्राइफेड के माध्यम से किया जाता है। इसका उद्देश्य भारत की जनजातीय बुनाई एवं शिल्प परंपराओं का संरक्षण करते हुए उन्हें भारत तथा विश्वभर के पारखी उपभोक्ताओं से जोड़ना है। उन्होंने आगे कहा कि यह ब्रांड प्रामाणिकता, गुणवत्ता और समकालीन डिजाइन के समन्वय के माध्यम से जनजातीय वस्त्रों एवं हस्तशिल्प को प्रीमियम उत्पादों के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है, साथ ही जनजातीय शिल्पकारों के लिए सतत् आजीविका के अवसर सृजित करने तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक उनकी पहुंच का विस्तार करने की दिशा में कार्य करता है।

उद्घाटन के उपरांत “व्हाट मेक्स ट्राइबल वीव्स टाइमलेस?” विषय पर एक पैनल चर्चा आयोजित की गई, जिसमें शिक्षा, वस्त्र, डिजाइन और शिल्प के क्षेत्रों की प्रतिष्ठित हस्तियों ने भाग लिया।
सत्र का संचालन नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट) की संस्थापक संकाय सदस्य एवं पूर्व संकायाध्यक्ष श्रीमती आशा बक्शी ने किया। विशिष्ट पैनल में दस्तकारी हाट समिति की संस्थापक एवं प्रख्यात शिल्प पुनरुद्धारक श्रीमती जया जेटली, अकारो के संस्थापक एवं क्रिएटिव डायरेक्टर श्री गौरव जय गुप्ता, टैक्सटाइल आर्टिस्ट, श्री गौरांग शाह, सेव द लूम के संस्थापक श्री रमेश मेनन तथा फैशन डिजाइनर सुश्री अंजू मोदी शामिल थीं।

पैनल ने जनजातीय शिल्पकारों के लिए समकालीन डिजाइन और बाजार के अवसर सृजित करते हुए पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण के उपायों पर विचार-विमर्श किया। चर्चा के दौरान भारत की जनजातीय बुनाई परंपराओं की स्थायी प्रासंगिकता, समृद्ध ज्ञान परंपराओं के संरक्षण, समकालीन डिजाइन हस्तक्षेपों तथा जनजातीय वस्त्रों के लिए सतत् बाजार संपर्कों पर विचार किया गया। चर्चा में इस बात पर भी बल दिया गया कि जनजातीय बुनाई परंपराओं की प्रामाणिकता और सांस्कृतिक महत्व को बनाए रखते हुए उन्हें बदलते वैश्विक बाजार में निरंतर विकसित करने के लिए शिल्पकारों, डिजाइनरों, संस्थानों तथा उद्योग से जुड़े हितधारकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है।
कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों की जीआई-टैग प्राप्त उत्कृष्ट बुनावटों का प्रदर्शन किया गया, जिनमें कोटपाड कॉटन, टसर सिल्क, एरी सिल्क, मूगा सिल्क, टोडा कढ़ाई तथा डोंगरिया कढ़ाई शामिल थीं। इसके साथ ही, प्रसिद्ध भारतीय फैशन डिजाइनरों—श्री अबू जानी संदीप खोसला, सुश्री अंजू मोदी, श्री मनीष त्रिपाठी, श्री गौरव जय गुप्ता तथा सुश्री समीरा दलवी—के ऐसे संग्रह भी प्रदर्शित किए गए, जिनमें जनजातीय बुनकरों से सीधे प्राप्त वस्त्रों का उपयोग किया गया था। रीसा ने लॉन्गपी पॉटरी (मणिपुर), तुरतुक ब्रास कटलरी (लद्दाख), वारली कला (महाराष्ट्र) तथा विश्वविख्यात ढोकरा कला (छत्तीसगढ़) सहित विशिष्ट हस्तशिल्पों का भी प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम में जनजातीय मास्टर शिल्पकारों का सम्मान, उत्कृष्ट जनजातीय वस्त्रों की विशेष रूप से क्यूरेटेड प्रदर्शनी का अवलोकन तथा जनजातीय वस्त्रों पर वारली और गोंड कला के सजीव प्रदर्शन भी शामिल थे, जिससे आगंतुकों को भारत की समृद्ध जनजातीय कलात्मकता एवं वस्त्र विरासत का अनुभव करने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के माध्यम से रीसा के प्रति व्यापक जागरूकता उत्पन्न हुई और एक सामान्य फैशन ब्रांड के बजाय शिल्पकारों तथा शिल्प-कला केंद्रित ब्रांड के रूप में इसकी विशिष्ट पहचान और अधिक सुदृढ़ हुई। इस ब्रांड की मूल विशेषता भारत के इतिहास, संस्कृति और सामाजिक परंपराओं में गहराई से निहित विरासत का उत्सव मनाना है। ये परंपराएं भारत की सांस्कृतिक विरासत और स्वदेशी ज्ञान का एक समृद्ध भंडार हैं, जिनका संरक्षण और संवर्धन आने वाली पीढ़ियों के लिए किया जाना आवश्यक है।

सौंदर्यपरक आकर्षण से परे, रीसा जनजातीय शिल्पकारों के लिए सतत् आजीविका के अवसर सृजित करके एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य की भी पूर्ति करता है। रीसा के शुभारंभ तथा ‘ट्राइबल वीव्स ऑफ इंडिया’ जैसी पहलों के माध्यम से जनजातीय कार्य मंत्रालय और ट्राइफेड ने माननीय प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण के अनुरूप अनुसूचित जनजातियों के समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जिसमें जनजातीय शिल्प, वस्त्र तथा स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया गया है।
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पीके/केसी/पीके/डीए
(रिलीज़ आईडी: 2296262)
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