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कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय
पारंपरिक कृषि उपज और बीजों का संवर्धन
प्रविष्टि तिथि:
28 JUL 2026 6:16PM by PIB Delhi
सरकार ने देश में पारंपरिक कृषि उत्पादों तथा देशी/स्थानीय फसल किस्मों के संरक्षण, अनुसंधान, उत्पादन, मूल्य संवर्धन और प्रचार-प्रसार के लिए कई उपाय किए हैं। इन उपायों में निम्नलिखित शामिल हैं:
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीपीजीआर) तथा उससे संबद्ध शोध संस्थानों के नेटवर्क के माध्यम से, देशी जर्मप्लाज्म के अन्वेषण, संग्रहण, आदान-प्रदान, कैरेक्टराईजेशन, मूल्यांकन, संरक्षण एवं अभिलेखीकरण का कार्य करता है।
- पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण (पीपीवी एवं एफआर) अधिनियम, 2001 के अंतर्गत परंपरागत एवं कृषक किस्मों को बौद्धिक संपदा अधिकार प्रदान किए जाते हैं। 15 जुलाई, 2026 तक, पीपीवी एवं एफआर प्राधिकरण द्वारा परंपरागत रूप से उगाई जाने वाली किस्मों और स्थानीय प्रजातियों (लैंडरेस) से संबंधित 5346 कृषक किस्मों का पंजीकरण किया जा चुका है।
- परंपरागत किस्मों सहित पादप आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण एवं सतत उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पीपीवी एवं एफआर अधिनियम, 2001 के अंतर्गत राष्ट्रीय जीन कोष की स्थापना की गई है। यह कोष लाभ-साझाकरण, पुरस्कार तथा मान्यता योजनाओं के माध्यम से पादप आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण, सुधार एवं परिरक्षण में संलग्न किसानों और समुदायों को पुरस्कृत एवं प्रोत्साहित करने का प्रयास करता है, साथ ही कृषि-जैवविविधता की सुरक्षा हेतु क्षमता निर्माण गतिविधियों को भी समर्थन प्रदान करता है। अब तक देशभर के किसानों/कृषक समुदायों को 45 पादप जीनोम संरक्षक सामुदायिक पुरस्कार, 69 पादप जीनोम संरक्षक कृषक पुरस्कार तथा 88 पादप जीनोम संरक्षक कृषक मान्यता प्रदान किए जा चुके हैं।
- फसलों की परंपरागत किस्मों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (एनएफएसएनएम) के बीज घटक के अंतर्गत "परंपरागत किस्मों के बीज उत्पादन संवर्धन" नामक एक उप-घटक आरंभ किया गया है। इस हस्तक्षेप के अंतर्गत, निर्धारित लागत मानदंडों के अनुसार परंपरागत किस्मों के बीज वितरण, बीज उत्पादन, क्षमता निर्माण तथा बीज बैंकों के सृजन/विकास के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में 'वोकल फॉर लोकल' पहल को बढ़ावा देने के लिए, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (पीएमएफएमई) में एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक एवं देशी उत्पादों सहित जिला-विशिष्ट कृषि और उद्यानिकी उत्पादों को समर्थन देते हुए देश के सभी जिलों में संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना है। मखाना, शाही लीची, जर्दालू आम जैसे परंपरागत एवं देशी उत्पादों सहित 35 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के 726 जिलों के लिए ओडीओपी स्वीकृत किए गए हैं। पीएमएफएमई योजना पारंपरिक उत्पादों सहित इन उत्पादों के प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग एवं विपणन के लिए वित्तीय, तकनीकी और व्यावसायिक सहायता प्रदान करती है।
- विशिष्ट भौगोलिक विशेषताओं (जी आई) वाले परंपरागत कृषि उत्पादों को उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) द्वारा प्रशासित वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के अंतर्गत पंजीकरण के माध्यम से भी संरक्षित किया जाता है, जिससे उनकी पहचान, ब्रांडिंग तथा बाजार मूल्य को और सुदृढ़ किया जाता है।
- इसके अतिरिक्त, परंपरागत कृषि उत्पादों को चाय बोर्ड, कॉफी बोर्ड, मसाला बोर्ड, एपीडा तथा राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड जैसे वस्तु-विशिष्ट बोर्डों एवं एजेंसियों के माध्यम से, उनकी संबंधित योजनाओं के अंतर्गत गुणवत्ता सुधार, ब्रांडिंग, मूल्य संवर्धन, निर्यात प्रोत्साहन तथा बाजार विकास हेतु बढ़ावा दिया जाता है। हाल ही में, सरकार ने मखाना के उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं विपणन के लिए राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की भी स्थापना की है।
- अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष के आयोजन के पश्चात, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन के माध्यम से परंपरागत मिलेट्स ("श्री अन्न") पर विशेष बल दिया गया है। हैदराबाद स्थित भारतीय मिलेट्स शोध संस्थान (आईसीएआर-आईआईएमआर) को मिलेट्स में अंतरराष्ट्रीय शोध एवं विकास को बढ़ावा देने हेतु मिलेट्स संबंधी वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र के रूप में नामित किया गया है।
- संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2023 को "अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष" घोषित किए जाने के पश्चात, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) के अंतर्गत मिलेट्स के मूल्य संवर्धन एवं व्यावसायीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए एक समर्पित मिलेट-आधारित उत्पाद (पीएलआईएसएमबीपी) घटक जोड़ा गया।
सरकार कृषि उत्पादों और बीजों की देशी/स्थानीय किस्मों में सुधार लाने के उद्देश्य से किए जाने वाले शोध कार्य को प्रोत्साहित एवं समर्थित करती है। इसका ब्यौरा तथा उठाए गए कदम निम्नानुसार हैं:
- आईसीएआर-आईएआरआई, आईसीएआर, डीबीटी तथा डीएसटी के सहयोग से, गेहूं, चावल, मक्का, तिल, मसूर, खीरा एवं टमाटर जैसी फसलों में देशी जर्मप्लाज्म, स्थानीय प्रजातियों (लैंडरेस) एवं जंगली प्रजातियों के कैरेक्टराईजेशन, मूल्यांकन तथा उपयोग हेतु 13 समर्पित शोध परियोजनाओं का कार्यान्वयन कर रहा है। ये परियोजनाएं बेहतर, जलवायु-सह्य तथा रोग-प्रतिरोधी फसल किस्मों के विकास के लिए कृषि-जैवविविधता, जर्मप्लाज्म मूल्यांकन, आण्विक प्रजनन, जीनोमिक्स एवं जीनोम संपादन पर केंद्रित हैं।
- आईसीएआर-आईएआरआई में परंपरागत बासमती किस्मों में सुधार हेतु किए गए शोध के परिणामस्वरूप उन्नत पूसा बासमती चावल किस्मों का विकास हुआ है, जिनका भारत के बासमती निर्यात में प्रमुख हिस्सा है।
- पूर्वी उत्तर प्रदेश के विशिष्ट भौगोलिक संकेतक क्षेत्रों को लक्षित करते हुए, परंपरागत स्थानीय किस्म "कालानमक" के बेहतर उत्पादन तथा नॉन-लॉजिंग गुण वाली दो उच्च उत्पादक किस्में - पूसा नरेंद्र केएन1 तथा पूसा सीआरडी केएन2 - जारी की गई हैं।
- आईसीएआर-एनबीपीजीआर आनुवंशिक संसाधनों का अभिलेखीकरण करता है, उनको सूचीबद्ध (इन्वेंटरी) करता है तथा उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में लाता है, जिससे शोध एवं फसल सुधार में उनके सुरक्षित तथा तेज़ उपयोग को सुविधाजनक बनाया जा सके। इससे शोधकर्ताओं एवं प्रजनकों को किस्म सुधार के लिए देशी जर्मप्लाज्म तक पहुंच प्राप्त होती है। 15 जुलाई तक, राष्ट्रीय जीन बैंक में 1 लाख से अधिक स्थानीय प्रजातियां/परंपरागत किस्में संरक्षित हैं।
- आईसीएआर के तत्वावधान में एलायंस बायोवर्सिटी-सीआईएटी और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली के बीच संयुक्त कार्य योजना के अंतर्गत, 25 फसलों की 5,000 से अधिक देशी किस्मों के अभिलेखीकरण तथा सहभागी किस्म मूल्यांकन (क्राउडसोर्सिंग) के माध्यम से 11 राज्यों में मूल्यांकन जैसी प्रचार गतिविधियां चलाई जा रही हैं, जिनके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर खेती के लिए लगभग 300 उत्कृष्ट परंपरागत किस्मों की पहचान हुई है। इसके अतिरिक्त, इस योजना के अंतर्गत देशभर में लगभग 50 सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किए गए हैं, जिनमें 25 से अधिक फसलों की 4,000 से अधिक परंपरागत किस्मों का संरक्षण किया जा रहा है। इसके साथ ही, नेटिव बास्केट, माउंटेन ग्रेन्स, धरती नेचुरल्स जैसे ब्रांडों के माध्यम से देशी उत्पादों के ब्रांडिंग एवं व्यावसायीकरण तथा उन्हें मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ने में सहायक 3,000 से अधिक परंपरागत किस्मों की पोषण प्रोफाइलिंग भी की गई है।
- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की शोध एवं विकास योजना (प्रधानमंत्री किसान सम्पदा योजना के मानव संसाधन एवं संस्थान घटक का एक उप-घटक) के अंतर्गत अब तक 257 शोध एवं विकास प्रस्तावों को स्वीकृति दी जा चुकी है, जिनमें से कई परंपरागत/देशी उत्पादों (मिलेट आधारित उत्पाद, महुआ, सहजन आदि) पर केंद्रित हैं।
यह जानकारी कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री रामनाथ ठाकुर ने आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।
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आर सी / एम एस
(रिलीज़ आईडी: 2290665)
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