राज्यसभा सचिवालय
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शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 377वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति

प्रविष्टि तिथि: 25 MAR 2026 6:15PM by PIB Delhi

श्री दिग्विजय सिंह, संसद सदस्य, राज्य सभा  की अध्यक्षता में विभाग-संबंधित शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने 25 मार्च, 2026 को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की अनुदान मांगों (2026-27) संबंधी 377वां प्रतिवेदन राज्य सभा में प्रस्तुत किया। उक्त प्रतिवेदन 25 मार्च, 2026 को लोक सभा के पटल पर भी रखा गया। संसदीय समिति ने 19 फरवरी, 2026 को आयोजित अपनी बैठक में मंत्रालय की अनुदान मांगों के विभिन्न पहलुओं की संवीक्षा की थी । समिति ने इस विषय पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के सचिव; सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास  संस्थान(एसपीएनआईडब्ल्यूसीडी) पूर्व में  राष्ट्रीय  जन सहयोग  एवं बाल विकास संस्थान(एनआईपीसीसीडी); केंद्रीय दत्तक-ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (सीएआरए); और  राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग(एनसीपीसीआर); तथा राष्ट्रीय महिला आयोग(एनसीडब्ल्यू) के अध्यक्षों/प्रतिनिधियों  के साथ तीन घंटे ग्यारह मिनट से अधिक समय तक चली बैठक में विस्तृत चर्चा की। समिति ने अनुदान मांगों 2026-27 के संबंध में गहन जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रश्नावलियों के माध्यम से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से भी परामर्श किया ताकि अनुदान मांगों 2026-27 और मंत्रालय द्वारा संचालित योजनाओं के बारे में गहन जानकारी प्राप्त की जा सके । समिति द्वारा इस प्रतिवेदन में की गई समुक्तियां/सिफारिशें इस प्रेस विज्ञप्ति के साथ संलग्न हैं।

2.       समिति ने 23 मार्च, 2026 को  आयोजित अपनी बैठक में इस प्रतिवेदन पर विचार किया था और उसे स्वीकार किया था।

4.       प्रतिवेदन निम्नलिखित लिंक पर भी उपलब्ध है:- https://sansad.in/rs/hi/committees/16?departmentally-related-standing-committees

 

समिति की समुक्तियाँ/सिफारिशें
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की अनुदान मांगें (2026-27) का समग्र आकलन

1. समिति समुक्ति करती है कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग के लिए ₹36 करोड़ का आबंटन अत्यंत अपर्याप्त है। राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण एवं सुरक्षा के लिए अधिदिष्ट एक राष्ट्रीय शीर्ष वैधानिक निकाय है, जिसे अपने निर्धारित दायित्वों का प्रभावी रूप से निर्वहन करने तथा विशेष रूप से कमजोर वर्गों की महिलाओं के सशक्तीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए वित्तीय रूप से सुदृढ किया जाना आवश्यक है। समिति की सिफारिश है कि राष्ट्रीय महिला आयोग का बजट पर्याप्त रूप से वृद्धि की जानी चाहिए, जैसा कि बैठक के दौरान भी समिति द्वारा रेखांकित किया गया था, ताकि आयोग अपने अधिदेश का प्रभावी ढंग से निर्वहन कर सके।

 (पैरा 2.11)

 

2. समिति नोट करती है कि मंत्रालय की प्रमुख योजनाओं के लिए निधियों के आबंटन में कमी आई है, जो महिलाओं तथा बच्चों के विकास, सुरक्षा तथा सशक्तीकरण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। मंत्रालय का यह तर्क कि राज्य समय पर निधियों का आहरण नहीं कर रहे हैं, स्वीकार्य नहीं है। समिति का मत है कि मंत्रालय को यह परीक्षण करना चाहिए कि क्या एकल नोडल अभिकरण स्वयं ही राज्यों को समय पर निधि प्रवाह को प्रतिबंधित कर रहा है। यदि ऐसा है, तो निधि निर्गम मानकों को सरल बनाया जाना चाहिए ताकि निधियों के प्रवाह में व्यवधान न उत्पन्न हो। समिति यह भी सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय राज्यों द्वारा निधियों के आहरण की धीमी गति के कारणों की पहचान करे तथा सुधारात्मक उपायों के साथ आए, ताकि निधियों का राज्यों द्वारा प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो और योजनाओं के क्रियान्वयन में कोई बाधा न रहे।

(पैरा 2.15)

मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0

3.       समिति समुक्ति करती है कि मिशन सक्षम आंगनवाड़ी के लिए निधियों के आबंटन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो बच्चों के कल्याण के लिए कार्य करने की सरकार की प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करती है।

(पैरा 3.5)

 

4.       समिति पोषण ट्रैकर की स्थापना की प्रशंसा करती है, परंतु इस तथ्य को लेकर चिंतित है कि नेटवर्क संपर्क की समस्याएं हो सकती हैं तथा अनुप्रयोग का संचालन करने वाले कार्यकर्ता साक्षर न हों। समिति आंगनवाड़ियों में परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता के संबंध में भी नोट करती है तथा यह मत व्यक्त करती है कि गुणवत्ता की कड़ाई से निगरानी की जानी चाहिए। समिति का मत है कि आंगनवाड़ियों में परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भारत सरकार तथा राज्य सरकारों का नैतिक दायित्व होना चाहिए। समिति का यह भी मत है कि मंत्रालय को आंगनवाड़ी केंद्रों के संचालन के लिए निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व कार्यक्रमों का उपयोग करना चाहिए।

(पैरा 3.12)

 

5.       मंत्रालय ने अपने प्रस्तुतीकरण में समिति को सूचित किया कि पोषण गुणवत्ता के लिए विस्तृत दिशानिर्देश मंत्रालय द्वारा जारी किए गए हैं। जिला स्तरीय समितियां गठित की गई हैं जो प्रयोगशालाओं में भोजन की गुणवत्ता की निगरानी करती हैं। तथापि, गुणवत्ता राज्य से राज्य में भिन्न होती है। समिति सिफ़ारिश करती है कि प्रति इकाई लागत मानकों का पुनरीक्षण किया जाना चाहिए, क्योंकि ये देश भर में एकसमान गुणवत्ता तथा पोषक भोजन उपलब्ध कराने के लिए अत्यंत निम्न हैं।

(पैरा 3.13)

 

6.       समिति नोट करती है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तथा आंगनवाड़ी सहायिकाओं की सामान्य शिकायत मानदेय में वृद्धि तथा उनकी नियुक्तियों को स्थायी दर्जा प्रदान करने से संबंधित है। समिति का मत है कि उचित पारिश्रमिक का भुगतान कार्यकर्ताओं का वैध अधिकार है तथा इस संबंध में संशोधन दीर्घ समय से लंबित है और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तथा आंगनवाड़ी सहायिकाओं को दिया जाने वाला मानदेय अत्यंत अल्प है। आंगनवाड़ियों के कार्यक्षेत्र के विस्तार को दृष्टिगत रखते हुए, समिति सिफ़ारिश करती है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तथा आंगनवाड़ी सहायिकाओं के मानदेय में प्रोत्साहन राशि सहित यथाशीघ्र वृद्धि की जानी चाहिए। समिति यह भी सिफ़ारिश करती है कि वे राज्य जो पहले से ही टॉप-अप भुगतान कर रहे हैं, उन्हें समतुल्य केन्द्रीय प्रोत्साहन प्राप्त करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

(पैरा 3.18)

 

7.       बाल विकास परियोजना अधिकारी सक्षम आंगनवाड़ी योजना में एक महत्त्वपूर्ण कार्यकर्ता है। चूंकि बाल विकास परियोजना अधिकारी सीधे आंगनवाड़ी केंद्रों के साथ कार्य करता है, इसलिए वह राज्य प्राधिकरणों तथा आंगनवाड़ी केंद्रों के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। बाल विकास परियोजना अधिकारी जमीनी वास्तविकताओं से भी भलीभांति अवगत होता है तथा योजना की प्रभावशीलता का आकलन कर सकता है। समिति नोट करती है कि बाल विकास परियोजना अधिकारियों की स्वीकृत संख्या का पुनरीक्षण वर्ष 2008-09 से, अर्थात् 17 वर्षों की अवधि से, नहीं किया गया है, जब 7,075 परियोजनाएं स्वीकृत की गई थीं। फरवरी-मार्च 2025 में आयोजित वार्षिक कार्यक्रम क्रियान्वयन योजना बैठकों के अनुसार, देश भर में स्वीकृत 7,075 बाल विकास परियोजना अधिकारी पदों में से 2,348 पद (33.18 प्रतिशत) रिक्त हैं, जिससे क्षेत्र स्तर पर कार्यक्रम की देखरेख प्रभावित होती है। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि सरकार वर्तमान कार्यक्रम आवश्यकताओं के आलोक में बाल विकास परियोजना अधिकारियों की स्वीकृत संख्या का शीघ्र पुनरीक्षण करे तथा रिक्तियों को भरे। इसके अतिरिक्त, समिति यह भी सिफारिश करती है कि मंत्रालय राज्यवार रिक्तियों का मानचित्रण करे और उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्यों के लिए भर्ती सहायता को प्राथमिकता दे। साथ ही, कार्यक्रम में बाधा से बचने के लिए राज्यों को कैडर पुनर्गठन या संविदात्मक नियुक्तियों में लचीलापन प्रदान किया जा सकता है।

 (पैरा 3.20)

 

8.       इसके अतिरिक्त, समिति यह भी सिफारिश करती है कि मंत्रालय राज्यवार रिक्तियों का मानचित्रण करे और उच्च प्रदर्शन करने वाले राज्यों के लिए भर्ती सहायता को प्राथमिकता दे। साथ ही, कार्यक्रम में बाधा से बचने के लिए राज्यों को कैडर पुनर्गठन या संविदात्मक नियुक्तियों में लचीलापन प्रदान किया जा सकता है।

(पैरा 3.21)

 

 

9.       समिति नोट करती है कि आंगनवाड़ियों के लिए लागत मानकों के पुनरीक्षण के संबंध में वित्त मंत्री द्वारा किया गया एक विशिष्ट बजटीय आश्वासन मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित नहीं किया गया है। समिति सिफ़ारिश करती है कि सरकार आंगनवाड़ी लागत मानकों के पुनरीक्षण, विशेषतः अनुपूरक पोषण के लिए, को त्वरित करे तथा यह सुनिश्चित करे कि इसका कार्यान्वयन 16वें वित्त आयोग चक्र के प्रारंभ होने से पूर्व कर लिया जाए।

(पैरा 3.23)

 

10.    समिति नोट करती है कि 100 करोड़ रुपये की कमी हुई है, अर्थात् 2025-2026 के बजट प्राक्कलन में 125 करोड़ रुपये से घटकर 2025-2026 के संशोधित प्राक्कलन में 25 करोड़ रुपये रह गया है, जो लगभग 80 प्रतिशत है। समिति नोट करती है कि तीन वर्षों में, अर्थात् मई 2023 से जनवरी 2026 तक, केवल 132 शुद्ध आंगनवाड़ी-सह-क्रेच केंद्र जोड़े गए हैं (2,688 स्वतंत्र क्रेच से बढ़कर 2,820 आंगनवाड़ी-सह-क्रेच केंद्र)। तदनुसार, 15वें वित्त आयोग चक्र के लिए 17,000 आंगनवाड़ी-सह-क्रेच केंद्रों के लक्ष्य के विरुद्ध प्रगति अत्यंत धीमी है। समिति सिफारिश करती है कि आंगनवाड़ी-सह-क्रेच केंद्र कार्यक्रम में तीव्रता लाने हेतु कार्यवाही को शीघ्रता प्रदान की जाए। इसके अतिरिक्त, जिन राज्यों में आंगनवाड़ी-सह-क्रेच केंद्रों की संख्या शून्य है, वह दर्शाता है कि वहाँ क्रियान्वयन संबंधी समस्याओं का निवारण किया जाना आवश्यक है, ताकि योजना को प्रभावी बनाया जा सके।

(पैरा 3.30)

 

11.     समिति आगे सिफारिश करती है कि शून्य कवरेज वाले राज्यों, जिनमें तमिलनाडु भी शामिल है, के लिए एक विशेष त्वरित अनुमोदन व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु में अनौपचारिक क्षेत्रों में महिलाओं की उच्च कार्यबल भागीदारी को ध्यान में रखते हुए, पालना केंद्रों को औद्योगिक क्षेत्रों, शहरी झुग्गियों, मत्स्य समूहों और वस्त्र केंद्रों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

 (पैरा 3.31)

 

12.    समिति पूरक पोषण के लागत मानकों के पुनरीक्षण के लिए बढ़े हुए आबंटन की सराहना करती है। मिशन का प्राथमिक उद्देश्य संवेदनशील आयु वर्ग के बच्चों की पोषण आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। अतः यह अत्यंत आवश्यक है कि आंगनवाड़ी केंद्रों (एडब्ल्यूसी) में लाभार्थियों को गुणवत्तापूर्ण पोषण उपलब्ध कराया जाए। समिति सिफ़ारिश करती है कि लागत मानकों का समय-समय पर पुनरीक्षण किया जाए, ताकि बच्चों को प्रदान किए जाने वाले भोजन में पोषण की किसी भी प्रकार की कमी न रहे।

(पैरा 3.34)

 

13.    समिति नोट करती है कि सक्षम आंगनवाड़ी तथा पोषण 2.0 पर्याप्त जनशक्ति के अभाव में कार्य कर रहा है, परिणामस्वरूप यदि आंगनवाड़ी केंद्रों में दैनिक गतिविधियों के संचालन हेतु पर्याप्त जनशक्ति उपलब्ध नहीं होगी, तो मिशन के उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकेगी। समिति सिफ़ारिश करती है कि वर्षों के दौरान लाभार्थियों की संख्या में वृद्धि के साथ यह आवश्यक हो जाता है कि आवश्यक जनशक्ति की नियुक्ति यथाशीघ्र की जाए, ताकि लाभार्थी उनके कल्याण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सेवाओं से वंचित न रहें। साथ ही, इस विषय में प्रगति को समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाए, क्योंकि यह सूचित किया गया है कि राज्यों को इस संबंध में नियमित रूप से निर्देश जारी किए गए हैं।

(पैरा 3.37)

 

14.    समिति यह भी नोट करती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनवाड़ी केंद्रों के निर्माण हेतु मनरेगा से निधियों की उपलब्धता चिंता का विषय है। चूंकि मनरेगा को दिसंबर 2025 में वीबीआरएएम-जी द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, अतः वित्तपोषण पैटर्न का पुनरीक्षण करना अत्यावश्यक है, क्योंकि नए अधिनियम के अंतर्गत वित्तपोषण पैटर्न में परिवर्तन हुआ है। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय मिशन के लिए संशोधित वित्तपोषण पैटर्न निर्धारित करने हेतु आवश्यक कदम उठाए तथा जब तक इस विषय का समाधान नहीं हो जाता, मिशन के सुचारु संचालन के लिए निधियों की मांग करे।

(पैरा 3.38)

 

15.   राज्य स्तरों पर निगरानी के सुदृढ़ीकरण के संबंध में, समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय मिशन की सतत निगरानी हेतु राज्यों के साथ इस विषय को प्राथमिकता के आधार पर उठाए। जहां तक शहरी क्षेत्रों में आंगनवाड़ी केंद्रों के निर्माण का संबंध है, समिति सिफ़ारिश करती है कि चूंकि आंगनवाड़ी केंद्र सह-स्थान पर आधारित हैं, मंत्रालय को आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थापना के लिए विद्यालयों के साथ समन्वय करना चाहिए अथवा तैयार निर्मित संरचनाओं के अधिग्रहण के विकल्प का अन्वेषण करना चाहिए, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में भूमि का अधिग्रहण चुनौतीपूर्ण हो सकता है। समिति सिफारिश करती है कि स्कूलों, सामुदायिक भवनों और सार्वजनिक इमारतों में एडब्ल्यूसी के सह-स्थान को संशोधित केंद्रीय दिशानिर्देशों के माध्यम से औपचारिक रूप से समर्थन दिया जाए। इसके अतिरिक्त, महानगरों के लिए शहरी-विशिष्ट लागत मानदंड लागू किए जाने चाहिए।

 (पैरा 3.39)

16. समिति नोट करती है कि संघ बजट 2026-27 ने देखभाल अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने का प्रयास किया है। समिति नोट करती है कि आंगनवाड़ी कार्यक्रम के माध्यम से मंत्रालय 2.6 मिलियन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को समर्थन प्रदान करता है, जो पहले से ही देखभाल कार्य में प्रशिक्षित एवं कुशल हैं। मंत्रालय को इन क्षमताओं का लाभ उठाने तथा देखभाल अर्थव्यवस्था के प्रमुख संस्थानों के क्षमता निर्माण एवं संसाधन उपलब्ध कराने में निवेश करने हेतु कदम उठाने चाहिए।

(पैरा 3.40)

 

17. समिति नोट करती है कि आंगनवाड़ी मंचों, किशोरी बालिका कार्यक्रमों और सामुदायिक पहुँच के माध्यम से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय उन बालिकाओं तक पहुँचता है जो शिक्षा से कार्य की प्रक्रिया में आगे बढ़ने से पहले के चरण में होती हैं। इससे मंत्रालय को किशोरी बालिकाओं में प्रारंभिक आकांक्षाएँ विकसित करने, डिजिटल जागरूकता बढ़ाने और रोजगार के लिए तैयार करने का अवसर मिलता है। समिति सिफ़ारिश करती है कि आंगनवाड़ी व्यवस्था में किशोरी बालिकाओं को रोजगार के विविध अवसरों से परिचित कराया जाए, जिनमें डिजिटल कार्य, देखभाल क्षेत्र में उद्यमिता और समुदाय-आधारित सेवा भूमिकाएँ शामिल हैं। कम लागत पर डिजिटल साक्षरता, अंग्रेज़ी और संचार कौशल का विकास, महिलाओं के लिए उपलब्ध कार्य क्षेत्रों की जानकारी, तथा औपचारिक कौशल विकास कार्यक्रमों से जोड़ने जैसी पहलें इस प्रकार की योजना के अंतर्गत लाई जा सकती हैं।

(पैरा 3.41)

मिशन शक्ति

18.    समिति समुक्ति करती है कि एकल केंद्र व्यवहारतः व्यापक एकल सुविधा केंद्रों के स्थान पर अल्पकालिक आवास गृह के रूप में परिवर्तित हो गए हैं। यह मूल परिकल्पना कि पीड़िता को अपनी पीड़ा 50 विभिन्न व्यक्तियों को नहीं बतानी पड़े, साकार नहीं हो रही है। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि एकल केंद्रों में पुलिस सहायता तथा विधिक सहायता केंद्र के भीतर ही उपलब्ध कराई जानी चाहिए, न कि पीड़िताओं को पृथक् रूप से पुलिस थानों में जाने की आवश्यकता हो। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को किसी तृतीय पक्ष के माध्यम से योजना के        समिति एकल सहायता केंद्रों के कर्मचारियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम की सिफारिश करती है। समिति ने यह नोट किया कि पूर्वोत्तर के एक छोटे जिले और उत्तर प्रदेश के एक बड़े जिले में कार्यरत लोगों की संख्या समान है। समिति सिफारिश करती है कि कर्मचारियों का आवंटन जिलों में उनके द्वारा संभाले जा रहे मामलों की औसत संख्या के अनुसार किया जाना चाहिए।

 (पैरा 4.7)

 

19.    समिति नोट करती है कि 1,025 एकल केंद्रों में से 896 वर्तमान में प्रचालित हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि आघात से गुजर रही तथा त्वरित देखभाल की आवश्यकता वाली महिलाओं के हित में एकल केंद्रों का प्रचालन शीघ्र किया जाए। एकल केंद्रों से बाहर आने के पश्चात् महिलाओं के लिए एक व्यापक पुनर्वास योजना तैयार की जानी चाहिए तथा किसी प्रकार का निगरानी तंत्र भी विकसित किया जाना चाहिए, ताकि महिलाएं सामान्य जीवन व्यतीत कर सकें।

(पैरा 4.8)

 

20.    समिति मंत्रालय को निम्नलिखित सिफारिशें करती है:-


•    प्रत्येक राज्य के उच्च जनसंख्या वाले जिलों में एकल सहायता केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए।
•     महानगरीय क्षेत्रों में हिंसा की रिपोर्टिंग और मामलों की संख्या अधिक होने के कारण शहरी-विशिष्ट एकल सहायता केंद्रों के लिए वित्तपोषण मानदंड प्रदान किए जाएं।
•    एकल सहायता केंद्रों की सेवाओं को राज्य के महिला पुलिस थानों और सामाजिक कल्याण छात्रावासों के साथ एकीकृत किया जाए।

 (पैरा 4.9)

 

21. समिति समुक्ति करती है कि किसी योजना के केंद्र-राज्य वित्तपोषण पैटर्न के मामलों में कुछ राज्य कभी-कभी अपने अंशदान का भुगतान करने में असमर्थ होते हैं। अतः राज्यों को प्रतिकूल स्थिति में रखने के बजाय, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय वर्तमान वित्तपोषण पैटर्न की समीक्षा करे और योजना के कार्यान्वयन को सुव्यवस्थित करने के लिए आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन करे।  

(पैरा 4.10)

 

22.     समिति अनुशंसा करती है कि केंद्र को निधि प्रवाह मानदंडों (एकल नोडल एजेंसी तंत्र) को सरल बनाना चाहिए और जहाँ कार्यान्वयन क्षमता उपलब्ध हो, वहाँ राज्य-विशिष्ट लचीलापन प्रदान करना चाहिए।

(पैरा 4.11)

 

 

23.    मिति यह नोट करती है कि प्रवासी महिलाएं विशेष रूप से यौन हिंसा और उत्पीड़न के जोखिम में रहती हैं। उनकी भौतिक उपस्थिति और प्रशिक्षित कार्मिकों को देखते हुए, समिति का अवलोकन है कि एकल सहायता केंद्र उन महिलाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने का एक रणनीतिक अवसर प्रदान करते हैं जो रोजगार के लिए स्वतंत्र रूप से प्रवास करती हैं और अपने गंतव्य शहरों में सुरक्षित, अल्पकालिक आवास तथा परामर्श तक पहुंच से वंचित होती हैं। इस संदर्भ में, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय एकल सहायता केंद्रों के भीतर एक संरचित प्रवासन सहायता कार्य प्रारंभ करने पर विचार करे, जिसके अंतर्गत सत्यापित रोजगार, कौशल प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप या साक्षात्कार के लिए प्रवास करने वाली महिलाओं को अल्प अवधि (10-15 दिन) के लिए अस्थायी आवास प्रदान किया जा सके। आवास के साथ-साथ, एकल सहायता केंद्र शहर की जानकारी, सुरक्षित छात्रावासों और किराये के विकल्पों के बारे में जानकारी, सुरक्षा हेल्पलाइन से संपर्क, तथा स्थानीय रोजगार और कौशल विकास संस्थानों से संदर्भ सेवाएं भी प्रदान कर सकते हैं। इस प्रकार एकल सहायता केंद्रों को सुदृढ़ करने से उन्हें केवल संकट-प्रतिक्रिया संस्था से आगे बढ़ाकर एक निवारक और सक्षम मंच में परिवर्तित किया जा सकेगा, जो प्रथम पीढ़ी की महिला कामगारों के सुरक्षित प्रवासन और निरंतर कार्यबल भागीदारी को सीधे समर्थन प्रदान करेगा।

(पैरा 4.12)

24.     महिला हेल्पलाइन 181 की प्रभावशीलता के संबंध में, समिति समुक्ति करती है कि यह हेल्पलाइन एक जमीनी सहायता प्रतिक्रिया तंत्र के स्थान पर मात्र एक कॉल केंद्र बनकर रह गई है। समिति सिफ़ारिश करती है कि हेल्पलाइन को जमीनी सहायता दलों के साथ, स्थल पर बचाव क्षमताओं, परिवहन तथा परामर्शदाताओं सहित, जोड़ा जाना चाहिए। किसी भी जमीनी सहायता के बिना, संकटग्रस्त महिलाओं का बचाव नहीं किया जा सकता है।

(पैरा 4.14)

 

 

25. समिति नोट करती है कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना का वर्तमान केंद्र बिंदु कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम और बालिका शिक्षा के समर्थन पर है। समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय इस अभियान के दायरे का विस्तार करते हुए महिलाओं को कार्यबल में प्रोत्साहित करने की दिशा में भी विचार करे। समिति नोट करती है कि विद्यमान संस्थागत एवं संचार संरचना का उपयोग करते हुए एक नए अभियान को स्थापित किया जा सकता है, जो शिक्षा से रोजगार (नौकरियाँ और उद्यमिता) की ओर विमर्श का विस्तार करे। समिति आगे निम्नलिखित सिफ़ारिश करती है:-

i. एक राष्ट्रीय आदर्श व्यक्तित्व कार्यक्रम, जिसमें विद्युत वाहन विनिर्माण में शॉप फ्लोर तकनीशियन, निर्माण पर्यवेक्षक, लॉजिस्टिक्स परिचालक जैसे गैर-पारंपरिक भूमिकाओं में कार्यरत महिलाओं को प्रदर्शित किया जाए, ताकि सामाजिक धारणाओं में परिवर्तन लाया जा सके।

ii. लैंगिक चैंपियन पुरस्कारों की शुरुआत, जिससे उन निगमों को मान्यता दी जा सके जो प्रवेश स्तर, मध्य स्तर और नेतृत्व स्तरों पर महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हैं।

iii. श्रम मंत्रालय तथा निजी नियोक्ताओं के साथ साझेदारी में क्षेत्रीय विचार-विमर्श आयोजित किए जाएँ, जिनमें महिलाओं के लिए भर्ती, स्थायित्व, कार्यस्थल सुरक्षा और कैरियर प्रगति से संबंधित श्रेष्ठ प्रथाओं को साझा किया जा सके।

iv. श्रम मंत्रालय तथा कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के साथ मिलकर सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा लैंगिक-विभेदित प्रकटीकरणों के व्यवस्थित उपयोग को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि कार्यबल में भागीदारी के अंतराल की पहचान कर सुधारात्मक कार्यवाही को तीव्र किया जा सके।

(पैरा 4.18)

26. समिति प्रथम पीढ़ी की महिला श्रमिकों, प्रवासी महिलाओं तथा अविवाहित महिलाओं के लिए सुरक्षित आवास के महत्त्व की पुनः पुष्टि करती है। समिति माननीय वित्त मंत्री द्वारा अपने बजट भाषण में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित शिक्षा में महिलाओं के लिए लगभग 800 छात्रावासों के निर्माण हेतु 10,000 करोड़ रुपये के बजट की घोषणा का स्वागत करती है। तथापि, समिति यह अतिरिक्त सिफ़ारिश करती है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय संबंधित हितधारकों (जिसमें शिक्षा मंत्रालय भी सम्मिलित है) के साथ मिलकर एक जिला एक छात्रावास योजना का विस्तार कार्यरत महिलाओं (तथा महिला शिक्षुओं) को सम्मिलित करने हेतु करे, जिससे महिलाओं के लिए शिक्षा से रोजगार के अंतराल को पाटने में सहायता मिल सके। मंत्रालय को अपने प्रयास उच्च प्रवासन तथा रोजगार वाले जिलों में, तथा औद्योगिक पार्कों, अस्पतालों, सेवा समूहों, विश्वविद्यालय नगरों, जिला मुख्यालयों और डिजिटल कार्य केंद्रों के निकट छात्रावास क्षमता के संवर्धन पर केंद्रित करने चाहिए।

(पैरा 4.27)

27.  समिति का मत है कि संविदात्मक प्रकार की संलग्नता तथा सामाजिक सुरक्षा का अभाव एक प्रमुख चिंता का विषय है, जो कुशल कर्मियों को इन महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों से जुड़ने से निरुत्साहित करता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सखी निवास, शक्ति सदन तथा पालना योजना के अंतर्गत संलग्न कर्मियों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान करने के प्रावधानों पर विचार किया जाए, ताकि योजना के अंतर्गत उनके कार्य परिस्थितियों को सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 4.36)

28.    प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना को वर्ष 2025-26 में 2,185 करोड़ रुपये का सर्वाधिक बजट प्राक्कलन प्राप्त हुआ। समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश में सभी पात्र प्रथम बार गर्भवती महिलाएं तथा धात्री माताएं बिना किसी प्रक्रियात्मक विलंब के समय पर प्रत्यक्ष लाभ अंतरण का लाभ प्राप्त करें। इसके अतिरिक्त, मंत्रालय को राज्यवार तथा केंद्र शासित प्रदेशवार लंबित, अस्वीकृत तथा वापस की गई आवेदनों का अनुश्रवण करना चाहिए तथा तिमाही आधार पर शिकायत निवारण संबंधी आंकड़े प्रकाशित करने चाहिए, ताकि प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना के अंतर्गत सार्वभौमिक मातृत्व सहायता सुनिश्चित करने हेतु कवरेज का विस्तार किया जा सके।

(पैरा 4.37)

29.    समिति नोट करती है कि प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना वर्तमान में मातृत्व के दौरान आय हानि को मान्यता देती है और उसकी क्षतिपूर्ति करती है, परंतु मातृ समर्थन को बाद में कार्यबल में निरंतरता से जोड़ने का अवसर भी उपलब्ध है। मातृत्व समर्थन केवल सुरक्षित प्रसव तक सीमित न रहकर दीर्घकालिक आर्थिक बहिर्गमन को रोकने में भी सहायक होना चाहिए। महिलाओं की स्वास्थ्य देखभाल से संबंधित अधिकांश योजनाएं गर्भवती महिलाओं और किशोरियों पर केंद्रित हैं, ताकि उन्हें स्वस्थ भविष्य के लिए तैयार किया जा सके, जबकि मध्यम आयु की महिलाओं पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। समिति सिफ़ारिश करती है कि प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के लाभार्थियों को प्रसवोत्तर सहायता, शिशु देखभाल विकल्पों, डिजिटल कौशल विकास अवसरों, स्थानीय रोजगार जानकारी, स्वयं सहायता समूह आधारित उद्यमिता तथा कौशल विकास पहलों से संदर्भन, और कार्य पर पुनः वापसी परामर्श से सक्रिय रूप से जोड़ा जाए। यह विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र की उन महिलाओं के लिए उपयोगी होगा, जो प्रायः प्रसव के पश्चात स्थायी रूप से कार्य से बाहर हो जाती हैं। शहरी बाल देखभाल अवसंरचना पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। महिलाओं की स्वास्थ्य प्रणाली ने प्रायः महिलाओं को एक संकीर्ण, प्रजनन-केंद्रित दृष्टिकोण से देखा है। प्रजनन, मातृ, नवजात, शिशु और किशोर स्वास्थ्य (आरएमएनसीएच+ए) कार्यक्रमों ने वास्तविक प्रगति हासिल की है; हालांकि, यह दृष्टिकोण महिलाओं के स्वास्थ्य को केवल प्रजनन तक सीमित कर देता है। मानसिक स्वास्थ्य, व्यावसायिक स्वास्थ्य, असंक्रामक रोग और आयु-संबंधी स्थितियां अभी भी पर्याप्त प्राथमिकता प्राप्त नहीं कर पाई हैं।

 

(पैरा 4.38)

30. समिति नोट करती है कि महिला सशक्तीकरण हेतु जिला केंद्र का उपयोग जिला-स्तरीय अभिसरण योजनाओं के समर्थन के लिए किया जा सकता है, जिनमें यह मानचित्रित किया जाए कि शिशु देखभाल, गतिशीलता, आवास, सुरक्षा अथवा सूचना संबंधी कमियों के कारण महिलाएँ कहाँ कार्य से बाहर हो रही हैं, और तत्पश्चात विद्यमान योजनाओं का उसी अनुरूप समन्वय किया जाए।

 

(पैरा 4.43)

 

31.    समिति निर्भया निधि के अंतर्गत आबंटन तथा वास्तविक निर्गम के बीच सतत अंतर पर चिंता व्यक्त करती है। यह नोट किया गया है कि स्थापना से अब तक 8,212.85 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए गए हैं, परंतु केवल 6,581.84 करोड़ रुपये ही निर्गत किए गए हैं। समिति समुक्ति करती है कि संशोधित प्राक्कलन 2025-26 में 500.00 करोड़ रुपये के बजट प्राक्कलन से घटाकर 278.00 करोड़ रुपये किया जाना एकल नोडल अभिकरण स्पर्श दिशानिर्देशों के अनुपालन न होने तथा राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा बिल प्रस्तुत करने में विलंब के कारण हुआ। समिति सिफ़ारिश करती है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय राज्यों को एकल नोडल अभिकरण स्पर्श मॉड्यूल में संक्रमण हेतु सक्रिय रूप से सहायता प्रदान करे ताकि तकनीकी अवरोधों को समाप्त किया जा सके। इसके अतिरिक्त, निर्भया निधि के प्रबंधन तथा वितरण के प्रति विशेष संवेदनशीलता आवश्यक है तथा मंत्रालय को अनुपालन सहायता प्रकोष्ठका संस्थानीकरण करना चाहिए, जिससे राज्य अभिकरणों को अनुवर्ती किस्तों के निर्गम हेतु दस्तावेजी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता मिल सके, और इस प्रकार यह सुनिश्चित किया जा सके कि सुरक्षा परियोजनाएं निधियों के अभाव से प्रभावित न हों।

(पैरा 4.53)

32. समिति 1,951.11 करोड़ रुपये के केंद्रीय परिव्यय के साथ 8 प्रमुख शहरों में कार्यान्वित सुरक्षित शहर परियोजनाओं का संज्ञान लेती है। तथापि, भौतिक प्रगति प्रतिवेदन इंगित करते हैं कि दिल्ली में गन शॉट डिटेक्शन प्रणाली तथा हैदराबाद में फोरेंसिक प्रयोगशालाएं जैसे महत्त्वपूर्ण घटक प्रगति परअथवा आंशिक रूप से प्रचालितस्थिति में हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि निर्भया निधि पर सशक्त समिति इन 8 शहरों का नगर-विशिष्ट तिमाही लेखा परीक्षण करे ताकि स्थल-विशिष्ट बाधाओं, जैसे भूमि की पहचान अथवा क्रय में विलंब, की पहचान की जा सके। गृह मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के समन्वय से, प्रौद्योगिकी-प्रधान घटकों विशेषतः कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित वीडियो विश्लेषण तथा मुख पहचान के पूर्ण होने के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित करे, ताकि सड़कों पर अपराधों के विरुद्ध अपेक्षित निवारक प्रभाव सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 4.54)

 

मिशन वात्सल्य

33.    समिति यह भी चाहती है कि उसे वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान 1550 करोड़ रुपये के आबंटित बजट से कार्यान्वित की जाने वाली योजना के घटकों के विवरण से अवगत कराया जाए।

(पैरा 5.7)

 

34.    समिति समुक्ति करती है कि डिजिटलीकरण के बावजूद कार्मिकों की कमी और प्रक्रियागत अंतरालों के कारण दत्तक ग्रहण की समय-सीमाएँ लंबी बनी हुई हैं। यह स्पष्ट है कि मंत्रालय प्रशासनिक अवरोधों के समाधान के बिना डिजिटल प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भर है। समिति नोट करती है कि अनाथ, परित्यक्त और समर्पित बच्चों की अनिवार्य पहचान राज्यों में समान रूप से नहीं हो रही है और इससे बाल संरक्षण की योजना निर्माण प्रक्रिया वास्तव में कमजोर होती है।

(पैरा 5.8)

 

35.    समिति अंतर-राज्यीय बाल प्रत्यावर्तन के मुद्दे को लेकर भी चिंतित है। कुछ राज्य शून्य बाल प्रत्यावर्तन मामलों की रिपोर्ट करते हैं जबकि अन्य राज्य बड़ी संख्या में ऐसे मामलों की रिपोर्ट करते हैं, जो राज्यों के बीच रिपोर्टिंग में असंतुलन को दर्शाता है। मंत्रालय को शून्य रिपोर्टिंग को प्रशासनिक चिंता के रूप में लेना चाहिए और सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। समिति इस बात को लेकर भी चिंतित है कि बिना पंजीकरण वाले चाइल्डकेयर संस्थान और अनाथालय अभी भी संचालित हो रहे हैं, जिससे किशोर न्याय ढांचा कमजोर होता है। समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय चाइल्डकेयर संस्थानों का एक व्यापक राष्ट्रीय ऑडिट पूरा करे ताकि वैधानिक मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 5.9)

 

36.    समिति सिफारिश करती है कि एमडब्ल्यूसीडी सभी राज्यों में एक व्यापक अध्ययन तत्काल कराए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सीसीआई में जनशक्ति के लिए निर्धारित एक समान लागत मानदंड संबंधित राज्यों द्वारा अधिसूचित न्यूनतम वेतन के अनुरूप हैं या नहीं। जहाँ भी कमी पाई जाए, वहाँ मंत्रालय को आवश्यक संशोधन करना चाहिए ताकि बाल देखभाल संस्थानों में कार्यरत कर्मियों को कम से कम न्यूनतम वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 5.11)

स्वायत्तशासी एवं सांविधिक निकाय

 

सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास संस्थान (एसपीएनआईडब्ल्यूसीडी)

 

37.    समिति नोट करती है कि बजट प्राक्कलन 2025-26 90.00 करोड़ रुपये था, जिसे संशोधित प्राक्कलन 2025-26 में बढ़ाकर 103.00 करोड़ रुपये कर दिया गया। 31.01.2026 की स्थिति के अनुसार वास्तविक व्यय केवल 91.94 करोड़ रुपये है, जो संशोधित प्राक्कलन 2025-26 का 89.26 प्रतिशत है। आगे, मंत्रालय ने बजट प्राक्कलन 2026-27 के लिए वित्त मंत्रालय को 202.50 करोड़ रुपये का प्रक्षेपण किया था, तथापि बजट प्राक्कलन 2026-27 के रूप में 110 करोड़ रुपये का आबंटन किया गया है। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय, यदि आवश्यक हो, तो संशोधित प्राक्कलन 2026-27 के चरण में वित्त मंत्रालय से अतिरिक्त निधियों की मांग करे, ताकि एसपीएनआईडब्ल्यूसीडी को अपने अधिदेश के क्रियान्वयन में किसी वित्तीय बाधा का सामना न करना पड़े।

(पैरा 6.7)

38.  समिति नोट करती है कि 1 जनवरी, 2026 की स्थिति के अनुसार एसपीएनआईडब्ल्यूसीडी में रिक्तियों की दर उच्च है, जहाँ 286 स्वीकृत पदों में से 125 पद (लगभग 43.7%) रिक्त हैं। समूह के 38 संकाय पदों की रिक्तता तथा लिपिकीय कर्मियों (एलडीसी) के लिए प्रतीक्षा सूची पर निर्भरता, संस्थान की शैक्षणिक एवं अनुसंधान उत्कृष्टता को प्रभावित कर सकती है। समिति मंत्रालय को सिफारिश करती है कि संघ लोक सेवा आयोग के प्रतिभा सेतु पोर्टल के माध्यम से वर्तमान में प्रक्रियाधीन 22 संकाय पदों की नियुक्तियों को त्वरित किया जाए। इसके अतिरिक्त, संस्थान को संविदात्मक व्यवस्थाओं से आगे बढ़ते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मुख्य शैक्षणिक एवं अनुसंधान प्रभागों में स्थायी, विशेषज्ञ संवर्गों की नियुक्ति की जाए, ताकि तीनों समेकित मिशनों के अंतर्गत प्रशिक्षण की गुणवत्ता बनाए रखी जा सके।

(पैरा 6.13)

39. समिति का मत है कि संस्थान वर्तमान में महिला एवं बाल विकास के क्षेत्र में केवल आठ अनुसंधान अध्ययन कर रहा है। अतः समिति सिफारिश करती है कि एसपीएनआईडब्ल्यूसीडी अपने अनुसंधान पोर्टफोलियो का विस्तार करते हुए मिशन शक्ति तथा मिशन वात्सल्य जैसी पुनर्संरचित योजनाओं के प्रभाव आकलन को सम्मिलित करे। अनुसंधान विशेष रूप से विलयित योजनाओं के पहुंच तथा परिणामपर केंद्रित होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, संस्थान को एक आँकड़ा-आधारित विचार मंच के रूप में कार्य करना चाहिए, जो मंत्रालय को डिजिटल उपकरणों में अत्यधिक इंटरफेसअथवा पूर्व अनुप्रयोगों में अनुभव किए गए आँकड़ा ह्रासजैसी कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों के समाधान हेतु अनुभवजन्य साक्ष्य प्रदान करे।

(पैरा 6.14)

 

40. समिति नोट करती है कि एसपीएनआईडब्ल्यूसीडी को हाल ही में राष्ट्रीय बाल निधि के अंतर्गत असिस्टपरियोजना सौंप दी गई है, जो राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सद्भाव प्रतिष्ठान के समापन के पश्चात् दी गई है। समिति का मत है कि संस्थान को आतंकवादी हिंसा अथवा वामपंथी उग्रवाद विद्रोह से प्रभावित बच्चों के लिए समर्पित ₹4.00 करोड़ की छात्रवृत्ति निधि के लिए एक डिजिटल अनुश्रवण तंत्र विकसित करना चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि योजना का गृह मंत्रालय से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में संक्रमण इन संवेदनशील लाभार्थियों के लिए किसी भी प्रकार के वितरण विलंब का कारण न बने।

(पैरा 6.15)

 

41. समिति नोट करती है कि पूर्ववर्ती केंद्रीय सामाजिक कल्याण बोर्ड के 12 अधिकारियों का अनुसंधान सहायक पदों के विरुद्ध समायोजन किया गया है, जबकि शेष 43 अधिकारियों के लिए प्रस्ताव विचाराधीन है। समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय प्रशासनिक अनिश्चितता को समाप्त करने हेतु शेष 43 अधिकारियों के समायोजन को शीघ्रता से पूर्ण करे। इसके अतिरिक्त, संस्थान को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पदोन्नति तथा परिवर्तित आश्वस्त कैरियर प्रगति के प्रयोजनों के लिए अवधि में कमीकी गणना नियमों के अनुसार की जाए, ताकि सीएसडब्ल्यूबी संवर्ग के एकीकरण से संस्थान में ठहराव की स्थिति उत्पन्न न हो।

(पैरा 6.17)

 

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर)

 

42.    समिति समुक्ति करती है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के लिए बजट प्राक्कलन 2026-27 में संशोधित प्राक्कलन 2025-26 की तुलना में 6.11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि बजट प्राक्कलन 2026-27 के लिए वित्त मंत्रालय को किए गए प्रक्षेपण की तुलना में 3.16 प्रतिशत की कमी हुई है। समिति का मत है कि देश में मुद्रास्फीति की प्रवृत्तियों को दृष्टिगत रखते हुए, आबंटन में कम से कम 8 प्रतिशत से 10 प्रतिशत तक की वृद्धि की जानी चाहिए थी, ताकि मुद्रास्फीति का समायोजन किया जा सके तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा व्यय के वर्तमान मानकों को बनाए रखा जा सके और बाल अधिकारों के संरक्षण हेतु वास्तविक आबंटन तथा व्यय में कमी से बचा जा सके। अतः समिति का मत है कि वर्तमान आबंटनों में संशोधित प्राक्कलन चरण में वृद्धि की जानी चाहिए, ताकि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अंतर्गत कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में निधियों की कमी के कारण बाधा उत्पन्न न हो।

(पैरा 6.24)

 

43.    समिति नोट करती है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग में 36 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से केवल 2 पद स्थायी कार्मिकों द्वारा भरे गए हैं तथा 34 पद रिक्त हैं। समिति नोट करती है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग में एक भी पद स्थायी अधिकारियों द्वारा भरा नहीं गया है। इस महत्त्वपूर्ण वैधानिक निकाय का, जिसे देश भर में बाल अधिकारों के संरक्षण का दायित्व सौंपा गया है, पूर्णतः प्रतिनियुक्ति तथा संविदात्मक आधार पर संचालित होना संस्थागत निरंतरता, जवाबदेही तथा प्रभावशीलता के संदर्भ में चिंता का विषय है। समिति सिफ़ारिश करती है कि सरकार राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पदों पर नियमित भर्ती की प्रक्रिया प्रारंभ करे।

(पैरा 6.27)

 

44.    राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को बजट प्राक्कलन 2026-27 में 28.44 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं, जो बजट प्राक्कलन 2025-26 में 25 करोड़ रुपये थे, जो 12.10 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। समिति का मत है कि 28.44 करोड़ रुपये का आबंटित राशि अधिदिष्ट दायित्वों के निर्वहन के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती है। समिति सिफ़ारिश करती है कि अतिरिक्त जनशक्ति, क्षेत्रीय पहुँच तंत्र तथा बाल अधिकार उल्लंघनों के लिए एक समर्पित शिकायत निवारण मंच की आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु संशोधित प्राक्कलन चरण में बजट आबंटन में वृद्धि की जानी चाहिए।

(पैरा 6.28)

 

45.    समिति समुक्ति करती है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अंतर्गत कई प्रमुख पद, जिनमें वरिष्ठ परामर्शदाता (विधिक) तथा परामर्शदाता (किशोर न्याय) जैसे तकनीकी पद सम्मिलित हैं, वर्तमान में संविदात्मक आधार पर भरे जा रहे हैं। समिति का मत है कि रजिस्ट्रार तथा प्रस्तुतीकरण अधिकारी जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक पदों में निरंतर रिक्तियां आयोग को अपने वैधानिक अधिदेश का निर्वहन करने में सहायक नहीं हो सकती हैं। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग सभी स्वीकृत पदों को प्रतिनियुक्ति अथवा संविदात्मक व्यवस्थाओं पर निर्भर रहने के स्थान पर स्थायी अथवा नियमित अधिकारियों से भरने के लिए आवश्यक कदम उठाएं। यह संस्थागत स्मृति, जवाबदेही तथा बाल अधिकारों के प्रभावी संरक्षण तथा प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

(पैरा 6.29)

 

46. बाल अधिकारों का क्रियान्वयन राज्य सरकारों तथा स्थानीय प्राधिकरणों की कार्यवाहियों पर अत्यधिक निर्भर करता है। समिति कई राज्य आयोगों में निरंतर रिक्तियों तथा व्यापक नीतिगत विषयों पर निर्णय लेने की आवश्यक स्वतंत्रता के अभाव संबंधी प्रतिवेदनों से चिंतित है। समिति सिफ़ारिश करती है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग राज्य आयोगों की कार्यात्मक स्थिति, विशेषतः उनकी रिक्तियों के स्तर तथा बजटीय स्थिति के संबंध में, अनुश्रवण हेतु एक तिमाही समीक्षा तंत्र का संस्थानीकरण करे। आयोग यह सुनिश्चित करने हेतु निर्देश जारी करे कि किशोर न्याय अधिनियम तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम का सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में एकरूपता से क्रियान्वयन हो।

(पैरा 6.30)

 

47.    समिति बालकों के पुनर्स्थापन तथा शिकायत निवारण हेतु घर (घर लौटें और पुनर्मिलन करें) तथा ई-बालनिदान जैसे पोर्टलों के विकास की सराहना करती है। तथापि, समिति समुक्ति करती है कि समन्वय संबंधी समस्याएं तथा संसाधनों की सीमाएं अभी भी इन डिजिटल साधनों की व्यापक पहुँच में बाधा उत्पन्न करती हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग अपने विभिन्न पोर्टलों, अर्थात् निर्बाध निरीक्षण हेतु निगरानी अनुप्रयोग, घर तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अनुश्रवण को एक एकीकृत राष्ट्रीय डैशबोर्ड में समाहित करे, जो सभी जिला स्तरीय बाल कल्याण समितियों के लिए सुलभ हो। यह एकीकरण प्रत्येक बालक की पुनर्वास योजना के वास्तविक समय अनुश्रवण को सुगम बनाए, ताकि कोई भी बालक आवश्यक अवधि से अधिक संस्थागत देखभाल में न रहे।

(पैरा 6.31)

 

48.    समिति नोट करती है कि सीमित जन जागरूकता के कारण राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को दूरस्थ क्षेत्रों में वंचित तथा संवेदनशील समुदायों तक पहुँचने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग टियर-II तथा टियर-III क्षेत्रों में लक्षित जागरूकता अभियान प्रारंभ करे, जिसमें बाल श्रम, तस्करी तथा शिक्षा का अधिकार पर विशेष ध्यान दिया जाए।

(पैरा 6.32)

 

49.    समिति समुक्ति करती है कि राष्ट्रीय महिला आयोग तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की सिफ़ारिशएं बाध्यकारी स्वरूप की नहीं हैं, जिससे बाल अधिकारों के प्रभावी प्रवर्तन की उसकी क्षमता सीमित होती है तथा प्रायः संबंधित प्राधिकरणों द्वारा अनुपालन का अभाव देखा जाता है। समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय विधायी संशोधनों के माध्यम से राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की विधिक शक्तियों को सुदृढ़ करने की व्यवहार्यता का परीक्षण करे। इसमें अधिकार उल्लंघन के विशिष्ट मामलों में बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार तथा अनुपालन न करने वाले अभिकरणों पर जुर्माना अधिरोपित करने की शक्ति सम्मिलित की जानी चाहिए, ताकि आयोग का पर्यवेक्षण मात्र सिफ़ारिशत्मक न रहकर सुधारात्मक स्वरूप का हो।

(पैरा 6.33)

 

केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (कारा)

50.    समिति नोट करती है कि मिशन वात्सल्य पोर्टल पर मास्टर प्रशिक्षकों का तकनीकी प्रशिक्षण 5 स्थानों, अर्थात् दिल्ली, बेंगलुरु, गुवाहाटी, भोपाल तथा लखनऊ में, बाल संरक्षण प्रणाली में कार्यरत विभिन्न हितधारकों के लिए आयोजित किया गया है। समिति सिफ़ारिश करती है कि केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरणसभी जिला बाल संरक्षण इकाइयों तथा बाल कल्याण समितियों के लिए तिमाही आभासी पुनश्चर्या पाठ्यक्रम अनिवार्य करे, ताकि उन्हें 2022 विनियमों में नवीनतम संशोधनों के संबंध में अद्यतन रखा जा सके।

(पैरा 6.48)

 

51.    "चिकित्सीय पारदर्शिता" सुनिश्चित करने के उद्देश्य से समिति सिफ़ारिश करती है कि कारा, स्वास्थ्य मंत्रालय के समन्वय में, मुख्य चिकित्सा अधिकारियों के लिए प्रत्येक बालक, जिसमें जटिल दिव्यांगता वाले बालक भी सम्मिलित हैं, हेतु मानकीकृत चिकित्सीय परीक्षण प्रतिवेदन तैयार करने के संबंध में विशेष प्रशिक्षण आयोजित करे। इसके अतिरिक्त, अनिवार्य चिकित्सीय परीक्षण प्रतिवेदन (अनुसूची III – भाग ङ) को, बालक के पूर्ण चिकित्सीय इतिहास तथा उपचार आवश्यकताओं सहित, अंतिम स्वीकृति से पूर्व संभावित दत्तक अभिभावकों के साथ साझा किया जाना चाहिए, ताकि संभावित दत्तक अभिभावक सूचित दत्तक निर्णय ले सकें।

(पैरा 6.49)

 

52.    समिति कारिंग्स पोर्टल के मिशन वात्सल्य पोर्टल में एकीकरण की सराहना करती है, जिससे दत्तक ग्रहण पूल का विस्तार हुआ है। समिति सिफ़ारिश करती है कि हितधारकों के लिए "स्व-अधिगम वीडियो" विकसित किए जाएं, ताकि बच्चों के आधार नामांकन के दौरान प्रक्रियात्मक त्रुटियों को कम किया जा सके।

(पैरा 6.50)

 

53.    समिति नोट करती है कि दत्तक ग्रहण जागरूकता माह 2025 के दौरान विषय "विशेष आवश्यकताओं वाले बालकों के गैर-संस्थागत पुनर्वास को प्रोत्साहन" पर केंद्रित था। समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय इस गति को बहुभाषीय मीडिया अभियानों तथा क्षेत्रीय परामर्श बैठकों, जैसे जयपुर तथा गुवाहाटी में आयोजित बैठकों, के माध्यम से बनाए रखे।

(पैरा 6.51)

 

54.    समिति का मत है कि प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना में लाभार्थियों के लिए "अनुश्रवण तथा खोज" सुविधा उपलब्ध है। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि कारिंग्स पोर्टल पर संभावित दत्तक अभिभावकों के लिए इसी प्रकार का उच्च-पारदर्शिता डैशबोर्ड विकसित किया जाए, जिससे अभिभावक विभिन्न श्रेणियों में प्रतीक्षा सूची में अपनी वास्तविक समय स्थिति देख सकें, जिससे चिंता तथा प्रशासनिक पूछताछ में कमी आए।

(पैरा 6.52)

 

55.    समिति नोट करती है कि विनियम 14 के अंतर्गत दत्तक ग्रहण पश्चात् अनुश्रवण दो वर्षों के लिए अनिवार्य है। समिति सिफ़ारिश करती है कि केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरणअनिवार्य दो-वर्षीय अनुश्रवण अवधि के दौरान पेशेवर परामर्श प्रदान करे तथा परिवारों को जिला सेवाओं से जोड़े, ताकि दत्तक ग्रहण में व्यवधान को रोका जा सके। केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरणसभी विशिष्ट दत्तक ग्रहण अभिकरणों द्वारा क्रियान्वयन हेतु एक मानकीकृत "दत्तक ग्रहण पश्चात् परामर्श मॉड्यूल" विकसित करे, जिससे विशेषतः अधिक आयु के बालकों के लिए दत्तक ग्रहण के "विघटन अथवा समाप्ति" के जोखिम को कम किया जा सके।ए ताकि गोद लेने में "रुकावट या खत्म होने" का खतरा कम हो सके, खासकर बड़े बच्चों के लिए।

(पैरा 6.53)

 

56. समिति नोट करती है कि केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरणके बजट आबंटनों में भिन्नता पाई गई, जो वर्ष 2025-26 में बजट प्राक्कलन ₹14.49 करोड़ से बढ़कर संशोधित प्राक्कलन ₹28.23 करोड़ हो गई, तत्पश्चात् बजट प्राक्कलन 2026-27 में पुनः घटाकर ₹15.34 करोड़ कर दी गई। वर्ष 2025-26 के बजट प्राक्कलन तथा संशोधित प्राक्कलन में यह भिन्नता भवन नवीनीकरण हेतु एकमुश्त देयता के कारण थी। समिति सिफ़ारिश करती है कि केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरणके परिचालन व्ययों के लिए एक अधिक स्थिर तथा यथार्थपरक आधार प्रदान किया जाए, ताकि मूल दत्तक ग्रहण गतिविधियां अवसंरचना व्ययों के कारण प्रभावित न हों।

(पैरा 6.55)

 

57.    समिति समुक्ति करती है कि बजट प्राक्कलन 2026-27 में संशोधित प्राक्कलन 2025-26 की तुलना में 45.66 प्रतिशत की कमी है, जबकि बजट प्राक्कलन 2026-27 में केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरणके लिए वित्त मंत्रालय को किए गए प्रक्षेपणों की तुलना में 6.74 प्रतिशत की कमी पाई गई है। समिति सिफ़ारिश करती है कि मध्य-वर्षीय समीक्षा की जाए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह कमी कारिंग्स पोर्टल के प्रौद्योगिकीय उन्नयन अथवा दत्तक ग्रहण पूल के विस्तार में बाधा उत्पन्न न करे।

(पैरा 6.56)

 

58.    समिति नोट करती है कि केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण स्थायी कर्मचारियों की कमी के साथ कार्य करता रहा है। 1 जनवरी, 2026 की स्थिति के अनुसार 37 स्वीकृत पदों में से 13 पद (लगभग 35 प्रतिशत) रिक्त हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय कारा के लिए भर्ती प्रक्रिया की समग्र समीक्षा प्रारंभ करे, ताकि स्थायी नियुक्तियों को प्रोत्साहन दिया जा सके। इसके अतिरिक्त, पाँच वर्षों से अधिक अवधि तक केवल प्रतिनियुक्ति आधारित नियुक्तियों पर निर्भर रहना बाल दत्तक ग्रहण जैसे संवेदनशील क्षेत्र में प्रशासनिक स्थिरता को प्रभावित करता है। पहचाने गए 13 रिक्त पदों को यथाशीघ्र भरा जाना चाहिए, ताकि कारा द्वारा संचालित विभिन्न गतिविधियों को सुगम बनाया जा सके।

(पैरा 6.60)

 

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू)

59.    समिति राष्ट्रीय महिला आयोग के लिए बजटीय आबंटनों में उतार-चढ़ाव के संबंध में नोट करती है, अर्थात् वर्ष 2025-26 के लिए ₹28.00 करोड़ का बजट प्राक्कलन, जिसे संशोधित प्राक्कलन चरण में मामूली रूप से बढ़ाकर ₹38.41 करोड़ कर दिया गया। इसके अतिरिक्त, समिति समुक्ति करती है कि वर्ष 2026-27 के लिए बजट प्राक्कलन ₹36.00 करोड़ निर्धारित किया गया है, जो वर्ष 2025-26 के बजट प्राक्कलन से अधिक है, परंतु वर्ष 2025-26 के संशोधित प्राक्कलन ₹38.41 करोड़ से कम है। समिति का मत है कि वर्ष 2026-27 के लिए बजट प्राक्कलन (अर्थात् ₹36 करोड़) राष्ट्रीय महिला आयोग जैसे शीर्ष निकाय के लिए अपने अधिदेश का प्रभावी निर्वहन करने हेतु पर्याप्त नहीं है। समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय मध्यावधि समीक्षा करे, ताकि आयोग की "जन सुनवाई" तथा "महाजन सुनवाई" निधियों की कमी के कारण सीमित न हों तथा यह भी सिफ़ारिश करती है कि संशोधित प्राक्कलन चरण में अतिरिक्त आबंटन किया जाए, जिससे आयोग जिला स्तर पर विधिक सहायता शिविरों, शिकायत निवारण तथा जागरूकता कार्यक्रमों का विस्तार कर सके।

(पैरा 6.65)

 

60.    समिति सिफ़ारिश करती है कि राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) अपनी डिजिटल प्रणाली को और सुदृढ करे, ताकि शिकायतों में वृद्धिके कारण होने वाले व्यय को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया जा सके। आयोग को स्वप्रेरणा से मामले तथा जन सुनवाईके माध्यम से प्राप्त शिकायतों के लिए एंड-टू-एंड इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग प्रणाली लागू करनी चाहिए, जिससे शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण को सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 6.69)

 

61.    समिति का मत है कि राष्ट्रीय महिला आयोग को सवित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास संस्थान के साथ सहयोग कर लैंगिक आधारित हिंसा मामलों के प्रबंधन तथा विधायी प्रारूपण पर अपने कार्मिकों के लिए विशेषीकृत प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित करने चाहिए, ताकि प्रशिक्षित जनशक्ति का एक सुदृढ़ पूल विकसित किया जा सके।

(पैरा 6.70)

 

62.    समिति समुक्ति करती है कि 1 जनवरी, 2026 की स्थिति के अनुसार राष्ट्रीय महिला आयोग में 64 स्वीकृत पदों में से 33 पद (55 प्रतिशत से अधिक) रिक्त हैं। अतः समिति सिफ़ारिश करती है कि मंत्रालय तथा आयोग इन रिक्तियों को यथाशीघ्र भरने हेतु त्वरित भर्ती अभियान प्रारंभ करें।

(पैरा 6.75)

 

63.    समिति उपर्युक्त तालिका-XXXVII से नोट करती है कि आयोग के सदस्यों के 5 पदों में से 2 पद रिक्त हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि इन सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को शीघ्र पूर्ण किया जाए, ताकि आयोग एक पूर्ण वैधानिक प्राधिकरण के रूप में कार्य कर सके।

(पैरा 6.76)

 

64.    समिति नियमित पदों में निरंतर रिक्तियों के कारण "अंतरिम व्यवस्था" के रूप में संविदात्मक कार्मिकों की संलग्नता को नोट करती है। समिति सिफ़ारिश करती है कि आयोग संस्थागत स्मृति तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु स्थायी कैडर आधारित प्रणाली की ओर अग्रसर हो।

(पैरा 6.77)

 

65. समिति नोट करती है कि लैंगिक बजट ढाँचा योजनाओं का आकलन कल्याण वितरण संकेतकों के आधार पर करता है। तथापि, समिति समुक्ति करती है कि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के लैंगिक बजट निर्धारण तथा मीडिया अभिवर्धन संबंधी कार्यों का उपयोग इस हेतु किया जा सकता है कि यह अधिक स्पष्ट प्रतिवेदन सुनिश्चित किया जाए कि योजनाएँ महिलाओं को कार्य में प्रवेश करने तथा उसमें बने रहने में किस सीमा तक सक्षम बना रही हैं। समिति मंत्रालय को प्रोत्साहित करती है कि वह सरल रोजगार-संबद्ध संकेतकों को सम्मिलित करे, जैसे कार्यरत माताओं द्वारा शिशु देखभाल केंद्रों का उपयोग, नियोजित महिलाओं द्वारा छात्रावासों का अधिभोग, अथवा कौशल विकास एवं आजीविका से आगे जोड़े गए लाभार्थियों का अनुपात।

(पैरा 6.78)

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आरकेके


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