विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय
सीएसआईआर–एनआईएससीपीआर ने “परंपरागत चिकित्सा: प्रलेखन, प्रमाणीकरण और संप्रेषण” विषय पर राष्ट्रीय क्षमता विकास कार्यशाला का आयोजन किया
प्रविष्टि तिथि:
07 MAR 2026 5:04PM by PIB Delhi
सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (एनआईएससीपीआर) ने आईसीएमआर–राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान (एनआईटीएम) के सहयोग से 06 मार्च 2026 को बेलगावी स्थित राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान (एनआईटीएम) में राष्ट्रीय पहल स्वास्तिक (वैज्ञानिक रूप से सत्यापित सामाजिक पारंपरिक ज्ञान) के अंतर्गत “ट्रेडिशनल मेडिसिन: डॉक्यूमेंटेशन, वैलिडेशन एंड कम्युनिकेशन” (पारंपरिक चिकित्सा: प्रलेखन, प्रमाणीकरण और संप्रेषण) विषय पर राष्ट्रीय क्षमता विकास कार्यशाला का आयोजन किया। 60 से अधिक प्रतिभागियों ने बेलगावी तथा उसके आसपास स्थित 10 विभिन्न संस्थानों से पंजीकरण कराया और कार्यशाला में सक्रिय रूप से भाग लिया।
डॉ. पद्मा गुरमेट, पद्म श्री तथा निदेशक, राष्ट्रीय सोवा रिग्पा संस्थान (एनआईएसआर); प्रो. रंजना अग्रवाल, उत्कृष्ट वैज्ञानिक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) तथा पूर्व निदेशक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर–एनआईएससीपीआर); डॉ. सुबर्णा रॉय, निदेशक, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान (आईसीएमआर–एनआईटीएम); तथा डॉ. गीता वाणी रायसम, निदेशक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर–एनआईएससीपीआर), ने उद्घाटन समारोह की शोभा बढ़ाई। डॉ. गीता वाणी रायसम ने इस आयोजन में ऑनलाइन सहभागिता की।


कार्यक्रम का आरंभ भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान (आईसीएमआर–एनआईटीएम) के वैज्ञानिक ‘एफ’ डॉ. हर्ष हेगड़े के स्वागत भाषण से हुआ। इसके पश्चात डॉ. सुबर्णा रॉय द्वारा परिचयात्मक वक्तव्य प्रस्तुत किया गया। उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा में हो रहे अनुसंधान को विभिन्न मंचों के माध्यम से समाज तक प्रभावी रूप से संप्रेषित करने के महत्व पर बल दिया तथा यह भी आग्रह किया कि अपने करिअर के किसी भी चरण में कार्यरत शोधकर्ताओं को विज्ञान संचार की बारीकियों से सुसज्जित होना चाहिए।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. पद्मा गुरमेट ने सोवा रिग्पा पर एक विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया तथा राष्ट्रीय सोवा रिग्पा संस्थान (एनआईएसआर) की स्थापना के सफ़र पर विस्तार से चर्चा की। अपने वक्तव्य में उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों, विशेषकर सोवा-रिग्पा के महत्व, आयुर्वेद के साथ इसकी अंतर्संबद्धता तथा पारंपरिक औषधीय ज्ञान के प्रलेखन, प्रमाणीकरण और संप्रेषण की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे समकालीन चिकित्सा प्रणाली में इसकी बेहतर दृश्यता और एकीकरण सुनिश्चित किया जा सके।
प्रो. रंजना अग्रवाल ने एक दिलचस्प मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने भारतीय पारंपरिक ज्ञान प्रणाली का एक समग्र अवलोकन प्रदान किया। वेदों और पंचकोश की अवधारणा पर विस्तार से विचार करते हुए तथा भारत की विभिन्न पारंपरिक ज्ञान परंपराओं और पद्धतियों से अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने ऐसे ज्ञान के प्रमाणीकरण, आधुनिक विज्ञान के साथ उसके अभिसरण तथा उसे समाज तक प्रभावी रूप से संप्रेषित करने के महत्व पर बल दिया। उद्घाटन सत्र का समापन वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर–एनआईएससीपीआर) की प्रधान वैज्ञानिक एवं समन्वयक, स्वास्तिक, डॉ. चारु लता द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।



कार्यशाला का प्रथम तकनीकी सत्र “इंडिया’ज़ ट्रेडिशनल मेडिसिन हेरिटेज: फ्रॉम प्रोटेक्शन टू परपिचुएशन” (भारत की पारंपरिक चिकित्सा विरासत: संरक्षण से संवर्धन तक) विषय पर केंद्रित था, जिसमें भारत की समृद्ध और विविध पारंपरिक चिकित्सा विरासत तथा वर्तमान समय में उसकी निरंतरता पर विचार किया गया। इसका आरंभ प्रो. पुलोक मुखर्जी के पूर्णाधिवेशन व्याख्यान से हुआ। उन्होंने पारंपरिक चिकित्सा के अनुवाद, तंत्र-आधारित नृऔषधिविज्ञान तथा सतत् जैव संसाधनों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं को महत्व देने, विनियामक दिशा-निर्देशों और नैतिक विचारों को ध्यान में रखते हुए नृऔषधिविज्ञान-आधारित उत्पादों के विकास तथा चिरस्थायी जैव संसाधनों के उपयोग पर बल दिया।
वैद्य पवनकुमार रमेश गोदटवार, विश्व स्वास्थ्य संगठन केंद्र, नई दिल्ली ने विश्व-स्तर पर समग्र स्वास्थ्य के संबंध में डब्ल्यूएचओ के दृष्टिकोण पर एक अत्यंत विचारोत्तेजक पूर्णाधिवेशन व्याख्यान दिया। उन्होंने वैश्विक स्तर पर विशाल जनसंख्या के लिए सुलभ और सतत् स्वास्थ्य सुनिश्चित करने हेतु पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा आरंभ की गई अनुसंधान प्राथमिकता निर्धारण प्रक्रियाओं पर प्रकाश डाला।


द्वितीय तकनीकी सत्र में डॉ. चारु लता ने भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों पर एक विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने राष्ट्रीय पहल स्वास्तिक के अंतर्गत अपनाई जाने वाली व्यवस्थित प्रक्रिया का भी उल्लेख किया, जिसमें पारंपरिक पद्धतियों की पहचान और प्रमाणीकरण से लेकर उनके प्रलेखन तथा सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से उन्हें जनसामान्य तक संप्रेषित करने तक की प्रक्रिया सम्मिलित है। उन्होंने यह भी कहा कि जो शिक्षाविद् और शोधकर्ता पारंपरिक ज्ञान को सत्यापित वैज्ञानिक आंकड़ों के साथ जोड़ने में सक्षम होते हैं, वे विज्ञान का प्रभावी संप्रेषण कर सकते हैं।
इसके पश्चात डॉ. परमानंद बर्मन, वरिष्ठ वैज्ञानिक, सीएसआईआर–एनआईएससीपीआर द्वारा पारंपरिक ज्ञान संप्रेषण पर एक संवादपूर्ण व्यवहारिक प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया गया। उन्होंने विज्ञान संचार के मूलभूत सिद्धांतों को स्पष्ट किया तथा इसके विभिन्न रूपों पर चर्चा की, जो व्यापक जनसमूह के लिए वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल रूप में प्रस्तुत करने में सहायक होते हैं। सत्र के दौरान प्रतिभागियों को लोकप्रिय लेखन, संप्रेषण सामग्री डिज़ाइन करने तथा आकर्षक इन्फोग्राफिक्स और लघु वीडियो तैयार करने के संबंध में व्यवहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया। कार्यशाला के दौरान सीएसआईआर–एनआईएससीपीआर की टीम द्वारा प्रदर्शित एक आकर्षक प्रदर्शनी के माध्यम से स्वास्तिक को भी प्रस्तुत किया गया। कार्यशाला का समापन प्रतिभागियों से प्राप्त एक संवादपूर्ण फीडबैक के साथ हुआ।

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(रिलीज़ आईडी: 2236423)
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