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केंद्रीय बजट 2026-27: विकेंद्रीकरण के जरिए गांवों का कायाकल्प
संस्थाएं, निवेश और समावेशन
प्रविष्टि तिथि:
13 FEB 2026 3:33PM by PIB Delhi
- निरंतर वित्तीय प्रतिबद्धता से ग्रामीण परिवर्तन को बल मिला है। ग्रामीण विकास का बजट 2016-17 में 87,765 करोड़ रुपए था जो 2026-27 में 2.73 लाख करोड़ रुपए हो गया। इसमें 10 साल में 211 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई।
- निर्धनता में उल्लेखनीय कमी आई है। अत्यधिक गरीबी 2022-23 में 5.3 प्रतिशत रही जो वैश्विक औसत से कम है। बहुआयामी गरीबी भी घट कर 11.28 प्रतिशत रह गई है।
- 90.09 लाख स्वयं सहायता समूहों की 10.05 करोड़ महिलाओं को संगठित कर और 9 लाख सामुदायिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से महिला नेतृत्व में स्थानीय स्तर पर बुनियादी सुविधाओं की सामूहिक डिलीवरी।
- ग्रामीण कनेक्टिविटी लगभग हर जगह पहुंच चुकी है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए बजट आवंटन 2016-17 में 12,581 करोड़ रुपए था जो 2026-27 में 19,000 करोड़ रुपए हो गया। इसमें एक दशक में 51 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
- आवासन सुरक्षा का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। पिछले 11 वर्षों में 3.70 करोड़ ग्रामीण आवास बनाए गए। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के लिए बजट आवंटन 2016-17 में 15,000 करोड़ रुपए था जो 266.1 प्रतिशत बढ़ कर 2026-27 में 54,916.70 करोड़ रुपए हो गया।
परिचय
हाल के वर्षों में ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास, सबका विश्वास’ के दृष्टिकोण के अंतर्गत समावेशी प्रगति के लिए भारत के प्रयासों के मापनीय नतीजे सामने आए हैं। ये नतीजे निर्धनता और सामाजिक-आर्थिक असमानता में लगातार कमी तथा बुनियादी सेवाओं तक पहुंच में सुधार में प्रतिबिंबित होते हैं। इस प्रक्रिया के केंद्र में ग्रामीण बदलाव है। भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। वह सामाजिक-आर्थिक प्रगति के लिए सार्वजनिक निवेश, स्थानीय संस्थाओं और प्रशासन के समुदाय आधारित ढांचे पर निर्भर करता है।

सार्वजनिक व्यय का विस्तार, अवसंरचना विकास, रोजगार के स्वरूपों में सुधार, डिजिटल प्रौद्योगिकी का अंगीकरण तथा स्थानीय प्रशासनों और सामुदायिक संस्थाओं की ज्यादा मजबूत भागीदारी भारत में ग्रामीण विकास को आकार दे रही है। यह प्रतिमानात्मक परिवर्तन समावेशी विकास की उस व्यापक समझ को प्रतिबिंबित करता है जिसमें कमजोर और हाशिये पर के समूहों के सशक्तीकरण का खास ध्यान रखते हुए न्यायसंगतता, गरिमा और समान अधिकारों पर बल दिया गया है।
केंद्रीय बजट में ग्रामीण विकास के लिए आवंटन में पिछले एक दशक में 211 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है। यह 2016-17 में 87,765 करोड़ रुपए था जेा 2026-27 में बढ़ कर 2,73,108 करोड़ रुपए हो गया। ये आंकड़े ग्रामीण अवसंरचना, आजीविकाओं और स्थानीय संस्थाओं की क्षमता को मजबूत करने के लिए निरंतर वित्तीय प्रतिबद्धता का संकेत हैं।
नीति में बदलावः कल्याण के वितरण से विकेंद्रित भागीदारी तक
इस बदलाव का एक अनिवार्य आयाम पूरी तरह सरकार की अगुवाई वाले विकास मॉडल से प्रगति की समुदाय आधारित और विकेंद्रित रणनीति की ओर लगातार बढ़ता झुकाव है। विकास कार्यक्रमों के योजना निर्माण, क्रियान्वय और निगरानी में स्थानीय शासनों और जमीनी स्तर की संस्थाओं की महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में मान्यता बढ़ रही है। इस परिवर्तन ने स्थानीय स्वरों को विकास की प्राथमिकताएं तय करने में समर्थ बनाया है। इससे विकास की प्रक्रिया ज्यादा सहभागी, संदर्भित और संवहनीय बनी है।
73वें संविधान संशोधन (1992) ने पंचायती राज संस्थाओं को जमीनी स्तर पर लोकतंत्र के वाहक के तौर पर संस्थागत रूप दिया है। इसने स्थानीय समुदायों को विकास कार्यक्रमों के योजना निर्माण, क्रियान्वयन और निगरानी में सीधी हिस्सेदारी के लिए समर्थ बनाया है। इस बुनियाद का उपयोग करते हुए विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण), हाल ही में बंद किए गए एमजीएनआरईजीएस, दीनदयाल अंत्योदय योजना- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसे प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रमों में पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और निचले स्तर के संगठनों के जरिए काम करने की सहभागी प्रणाली अंतर्निहित है।

यह नीतिगत विकास जन भागीदारी के सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है। यह लाभार्थी आधारित हिस्सेदारी से सरकार और समुदायों के बीच सक्रिय भागीदारी की ओर परिवर्तन को दिखाता है। इस भागीदारी को क्षमता निर्माण, प्रौद्योगिकी आधारित संलग्नता, सामुदायिक संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण तथा सहभागी योजना और बजट प्रक्रियाओं के जरिए मजबूत किया जा रहा है। वित्तीय विकेंद्रीकरण ने इस दृष्टिकोण को और मजबूत किया है। पंचायतों को प्रत्यक्ष वित्तीय हस्तांतरण 15वें वित्त आयोग (2021-26) के अंतर्गत लगभग 2.36 लाख करोड़ रुपए से बढ़ कर 16वें वित्त आयोग (2026-31) के तहत तकरीबन 4.35 लाख करोड़ रुपए हो गया जिससे स्थानीय वित्तीय स्वायत्तता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
भारत में सामाजिक सुरक्षा के विस्तार और निर्धनता में कमी के नतीजे

भारत ने सामाजिक क्षेत्र में लगातार सार्वजनिक निवेश की बदौलत सामाजिक सुरक्षा के विस्तार और गरीबी में कमी लाने में उल्लेखनीय प्रगति की है। सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों (पेयजल, घरों के विद्युतीकरण और ग्रामीण स्वच्छता समेत) का कवरेज 2016 में सिर्फ 22 प्रतिशत था जो 2025 में 64.3 प्रतिशत हो गया। इससे सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच के उल्लेखनीय विस्तार का पता चलता है। इस विस्तार को सामाजिक सेवाओं पर व्यय (एसएसई) में वित्त वर्ष 2022 से लगातार वृद्धि से मदद मिली है। वित्त वर्ष 2022 और 2026 के बीच एसएसई में वृद्धि 12 प्रतिशत की सालाना चक्रवृद्धि दर से हुई। शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च में क्रमशः 11 प्रतिशत और 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
बहु-आयामी संकेतकों के जरिए गरीबी का आकलन

नीति आयोग के बहु-आयामी निर्धनता सूचकांक (एमपीआई) के अनुसार गरीबी दर 2005-06 में 55.3 प्रतिशत से घट कर 2019-20 में 15.96 प्रतिशत और 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रह गई। तेंदुलकर समिति की कार्यपद्धति पर आधारित अनुमान से भी गरीबी में उल्लेखनीय कमी का संकेत मिलता है। वर्ष 2011-12 और 2023-24 के बीच गरीबी में तेजी से कमी आने का अनुमान है। इस दौरान सभी राज्यों में ग्रामीण और शहरी, दोनों ही क्षेत्रों में गरीबी में गिरावट दर्ज की गई। इन रुझानों से पता चलता है कि समाज कल्याण के लक्षित हस्तक्षेपों और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच के विस्तार के साथ लगातार आर्थिक प्रगति ने भारत में गरीबी को काफी हद तक घटाने में महत्वपूर्ण योगदान किया है। यह प्रगति कल्याण कार्यक्रमों और संदर्भित नीतिगत नवोन्मेषों के जरिए केंद्र और राज्य सरकारों के साझा प्रयासों को प्रतिबिंबित करती है।
बुनियादी सेवाओं के माध्यम से ग्रामीण आजीविका के स्तर का संवर्द्धन
भारत में लोक नीति का उद्देश्य समान अवसर का विस्तार, अत्यधिक निर्धनता को घटाना और असमानता में वृद्धि के जोखिम को खत्म करना है। सरकार के प्रयास किफायती आवासन, खाद्य और सामाजिक सुरक्षा, वित्तीय समावेशन, सबसे लिए बुनियादी सेवाओं और सस्ती स्वास्थ्यसेवा के विस्तार पर केंद्रित हैं। इन हस्तक्षेपों ने खास तौर से ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर में सुधार में केंद्रीय भूमिका निभाई है। इन हस्तक्षेपों के पैमाने और नतीजों का पता सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की संवहनीय विकास लक्ष्य राष्ट्रीय संकेतक फ्रेमवर्क प्रगति रिपोर्ट 2025 से चलता है। इस रिपोर्ट में अनेक विकास संकेतकों में उल्लेखनीय प्रगति की जानकारी दी गई है।
सुरक्षित पेयजल तक पहुंच

ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग हर व्यक्ति की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच हो चुकी है। हर घर जल के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2019 में शुरू किए गए जल जीवन मिशन (जेजेएम) के अंतर्गत परिवर्तनकारी प्रगति हुई है। जेजेएम की शुरुआत के समय सिर्फ 3.23 करोड़ (17 प्रतिशत) ग्रामीण परिवारों के पास नल का कनेक्शन था। नवंबर 2025 तक 12.50 करोड़ अतिरिक्त परिवारों को यह सुविधा उपलब्ध कराई गई। इससे नल के कनेक्शन वाले परिवारों की कुल संख्या लगभग 15.74 करोड़ हो गई। इस तरह उन्नत पेयजल स्रोतों का इस्तेमाल करने वाले परिवारों का अनुपात 2015-16 में 94.6 प्रतिशत से बढ़ कर 2024-25 में 99.6 प्रतिशत हो गया। वित्त वर्ष 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार स्वतंत्र आकलनों में इसके महत्वपूर्ण सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी लाभों की पहचान की गई है। इनमें महिलाओं के लिए समय की पर्याप्त बचत, आर्थिक गतिविधियों में उनकी हिस्सेदारी में इजाफा और पानी से होने वाले रोगों में कमी शामिल है। स्वच्छता और बिजली तक पहुंच में उल्लेखनीय सुधार से ये लाभ और मजबूत हुए हैं।
स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच

स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की शुरुआत 2014 में की गई। इसका उद्देश्य समूचे भारत को अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) बनाना था। वर्ष 2019-20 तक सभी जिले ओडीएफ घोषित किए जा चुके थे। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत 96 प्रतिशत से अधिक गांव 31 दिसंबर 2025 तक ओडीएफ प्लस दर्जा हासिल कर चुके थे। ओडीएफ प्लस गांव वैसे ग्राम हैं जो ठोस और तरल कचरा प्रबंधन सुनिश्चित करते हुए साफ दिखाई देने के साथ ही ओडीएफ का दर्जा बरकरार रखते हैं। देश में 9 फरवरी 2026 तक ओडीएफ प्लस गांवों की संख्या 5.68 लाख थी। इनमें से 5.29 लाख में ठोस और 5.46 लाख में तरल कचरा प्रबंधन की समुचित व्यवस्था मौजूद है। अब तक 2331 प्लास्टिक कचरा प्रबंधन इकाइयां, 2.70 लाख सामुदायिक स्वच्छता परिसर और 12.05 करोड़ घरेलू शौचालय निर्मित किए जा चुके हैं।
सभी घरों में बिजली की व्यवस्था
प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) की शुरुआत 2017 में की गई। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सभी इच्छुक परिवारों को और शहरी इलाकों में सभी इच्छुक गरीब परिवारों को बिजली का कनेक्शन मुहैया कराया जाना है। वर्ष 2017 में अनुमानतः 3 करोड़ घरों में बिजली का कनेक्शन नहीं था। इनमें से 2.86 करोड़ घरों को वित्त वर्ष 2021-22 तक बिजली का कनेक्शन उपलब्ध करा दिया गया। सभी राज्यों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जिन इच्छुक परिवारों की पहचान की गई थी उन सब को 31 मार्च 2019 तक बिजली का कनेक्शन मुहैया करा दिया गया था।
सुरक्षित और किफायती ग्रामीण आवास तक पहुँच का विस्तार

निम्न आय वाले परिवारों के बीच आवास उनकी गरिमा, सुरक्षा और आर्थिक हिस्सेदारी का एक ज़रूरी अंग है। अप्रैल 2016 से लागू, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण का मकसद 2029 तक सभी के लिए घर का लक्ष्य हासिल करना है, जिसके तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को बुनियादी सुविधाओं वाले पक्के घर दिए जाएंगे। कुल 4.95 करोड़ घरों के लक्ष्य के मुकाबले, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 4.14 करोड़ इकाइयाँ आवंटित की गई हैं, जिनमें से 3.86 करोड़ को मंजूरी दी जा चुकी है और अब तक 2.93 करोड़ घर पूरे हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, पिछली आवास योजनाओं की लंबित 76.98 लाख आवासीय इकाइयों को भी पूरा कर लिया गया है, जिससे पिछले 11 वर्षों में निर्मित ग्रामीण घरों की कुल संख्या बढ़कर 3.70 करोड़ हो गई है। ग्रामीण आवास पर नीतिगत बल को दर्शाते हुए, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के लिए बजटीय आवंटन वर्ष 2016-17 के 15,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 54,916.70 करोड़ रुपये हो गया है।
ग्रामीण सड़क कनेक्टिविटी के माध्यम से अंतिम छोर तक पहुँच सुनिश्चित करना
ग्रामीण विकास के लिए ग्रामीण सड़क कनेक्टिविटी एक आधारभूत स्तंभ है, जो स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, बाजार और रोजगार के अवसरों तक पहुंच को बढ़ाकर गरीबी कम करने में प्रत्यक्ष योगदान देता है। वर्ष 2000 में शुरू की गई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का उद्देश्य बिना कनेक्टिविटी वाली बस्तियों को हर मौसम के अनुकूल सड़क संपर्क प्रदान करना था। जनवरी 2026 के मध्य तक, 99.6 प्रतिशत से अधिक ऐसी बस्तियों को जोड़ा जा चुका है। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण-I के तहत, 6.25 लाख किलोमीटर में फैली कुल 1,63,665 सड़कों के साथ-साथ 7,210 पुलों का निर्माण कार्य पूरा किया जा चुका है।


वर्ष 2013 में शुरू की गई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई-II) का मुख्य ध्यान मौजूदा ग्रामीण सड़क नेटवर्क को मजबूत करने और उसे बेहतर बनाने पर था। जनवरी 2026 के मध्य तक, इस चरण के तहत 49,087 किलोमीटर लंबी कुल 6,612 सड़कों और 749 पुलों का निर्माण कार्य पूरा किया जा चुका है। इसके बाद, 2019 में स्वीकृत पीएमजीएसवाई-III का लक्ष्य 1.25 लाख किलोमीटर लंबे ऐसे महत्वपूर्ण ग्रामीण सड़कों को पक्का करना है, जो बस्तियों को कृषि बाजारों, शैक्षणिक संस्थानों और स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़ती हैं। पीएमजीएसवाई-III के तहत अब तक 1.02 लाख किलोमीटर से अधिक सड़कें और 1,734 पुल पूरे किए जा चुके हैं। ग्रामीण सड़क कनेक्टिविटी पर निरंतर नीतिगत बल को दर्शाते हुए, पीएमजीएसवाई के लिए बजटीय आवंटन वर्ष 2016-17 के 12,581 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 19,000 करोड़ रुपये हो गया है।
जनजातीय और कमजोर समुदायों के लिए सेवाओं तक पहुँच और समावेशन में सुधार
लक्षित अवसंरचना हस्तक्षेपों के माध्यम से जनजातीय और विशेष रूप से कमजोर समुदायों को निरंतर प्राथमिकता दी गई है। प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) जिसका मकसद विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की 28,700 बस्तियों में सरकारी योजनाओं का पूरा फ़ायदा पहुंचाना है, इसके तहत कुल 7,324 किलोमीटर लंबी 2,495 सड़कों और 164 पुलों को मंजूरी दी गई है और 15 जनवरी, 2026 तक इनमें से 263 सड़कें पूरी की जा चुकी हैं। इन प्रयासों के पूरक के रूप में, धरती आभा-जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीए-जेजीयूए) के तहत 63,000 से अधिक जनजातीय गाँवों में काम किया जा रहा है और यह अभियान पेयजल, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा तथा आजीविका के अवसरों तक पहुँच बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
प्राकृतिक संसाधनों के सामुदायिक प्रबंधन को मजबूत करने वाली पहलों के माध्यम से पर्यावरणीय स्थिरता और आजीविका से जुडी अवसंरचना को और बढ़ावा दिया गया है। 4,105 वन धन विकास केंद्रों की स्थापना से लगभग 12 लाख व्यक्ति लाभान्वित हुए हैं। साथ ही, वन अधिकार अधिनियम, 2006 के कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप 25 लाख से अधिक वन अधिकार पत्रों का वितरण किया गया है, जिससे भूमि और वन संसाधनों पर सामुदायिक नियंत्रण और मजबूत हुआ है।
ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटलीकरण और प्रौद्योगिकी-आधारित सेवा वितरण
ग्रामीण भारत में समावेशी और कुशल सेवा वितरण के लिए डिजिटलीकरण एक महत्वपूर्ण सहायक के रूप में उभरा है। प्रौद्योगिकी अपनाने के साथ प्रशासनिक सुधारों के एकीकरण ने ग्रामीण कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में पारदर्शिता, भागीदारी और जवाबदेही को बढ़ाया है, और साथ ही दूरदराज एवं वंचित क्षेत्रों में सार्वजनिक सेवाओं तक पहुँच का विस्तार किया है। आधार सीडिंग (आधार नंबर को बैंक खाते, मोबाइल नंबर, या सरकारी योजनाओं से जोड़ना) तेजी से बढ़ा है, आधार-आधारित भुगतान प्रणालियों को व्यापक रूप से अपनाया गया है, और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से वेतन का वितरण लगभग सार्वभौमिक हो गया है। परिसंपत्तियों की बड़े पैमाने पर जियो-टैगिंग के माध्यम से कार्यक्रम की निगरानी को मजबूत किया गया है, जिसमें व्यक्तिगत घरेलू स्तर पर सृजित होने वाली परिसंपत्तियों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है।

'स्वामित्व' योजना ग्रामीण संपत्ति अधिकारों को औपचारिक रूप देने, विवादों को कम करने और ऋण तथा सरकारी सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने के लिए ड्रोन-आधारित मानचित्रण का उपयोग करती है। दिसंबर 2025 तक, इसके तहत 3.28 लाख गाँवों में सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है और 1.82 लाख गाँवों में 2.76 करोड़ संपत्ति कार्ड तैयार किए गए हैं। इन प्रयासों में, 'नमो ड्रोन दीदी' पहल ड्रोन-आधारित कृषि और मानचित्रण सेवाओं के माध्यम से डिजिटल अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देती है, जिसके तहत 2023-24 में स्वयं सहायता समूहों की 'ड्रोन दीदियों' को 1,094 ड्रोन वितरित किए गए हैं।
डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (डीआईएलआरएमपी) के तहत भूमि शासन सुधारों ने डिजिटलीकरण को और आगे बढ़ाया है, जिसके परिणामस्वरूप 99.8 प्रतिशत ग्रामीण अधिकार अभिलेखों का डिजिटलीकरण हो चुका है। इसके साथ ही, 95.73 प्रतिशत उप-पंजीकरण कार्यालयों को कंप्यूटरीकृत कर दिया गया है। पारदर्शिता और भूमि संबंधी सेवाओं तक पहुँच को मजबूत करते हुए, 36.67 करोड़ भूमि खंडों को विशिष्ट भू-खंड पहचान संख्या (यूएलपीआईएन/भू-आधार) आवंटित की गई है।
समावेशी शासन और आजीविका को सक्षम बनाने वाले समुदाय-नेतृत्व वाले संस्थान
भारत का विकास अनुभव राज्य की क्षमता को एक मानवीय प्रणाली के रूप में रेखांकित करता है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल और आजीविका के क्षेत्रों में प्रभावी 'अंतिम व्यक्ति तक सेवा वितरण' के लिए सामुदायिक संस्थान, अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता और स्थानीय प्रशासक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। उनकी क्षमताओं को मजबूत करने से स्थानीय स्तर पर कार्रवाई करने, जवाबदेही और सार्वजनिक सेवा वितरण की समग्र प्रभावशीलता में वृद्धि होती है।
प्रभावी स्थानीय शासन के लिए युवाओं और पंचायतों को सशक्त बनाना
मॉडल युवा ग्राम सभा (एमवाईजीएस) स्कूलों में ग्राम सभा की कृत्रिम ग्राम सभा कार्रवाई के माध्यम से छात्रों को जमीनी स्तर के शासन से परिचित कराकर लोकतांत्रिक भागीदारी और नागरिक जागरूकता को बढ़ावा देती है। जवाहर नवोदय विद्यालयों और एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों जैसे संस्थानों के माध्यम से देश भर में लागू यह पहल, स्थानीय शासन में पारदर्शिता, समावेशिता और जवाबदेही को मजबूत करने के साथ-साथ नेतृत्व कौशल का निर्माण करती है।
इसके पूरक के रूप में, संशोधित राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान (आरजीएसए) नेतृत्व विकास, ई-गवर्नेंस और गहन संवैधानिक हस्तांतरण के माध्यम से पंचायती राज संस्थानों की संस्थागत क्षमता को बढ़ाकर विकेंद्रीकृत शासन को मजबूत करता है। वित्त वर्ष 2022-23 से 2025-26 के दौरान 5,911 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ कार्यान्वित, आरजीएसए का उद्देश्य स्थानीय शासन की दक्षता और भागीदारी की गुणवत्ता में सुधार करना है। केंद्रीय बजट 2026-27 में, आरजीएसए के लिए 1,142 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो जमीनी स्तर के संस्थानों को मजबूत करने पर निरंतर जोर को दर्शाता है।
ग्रामीण बदलाव के वाहक के रूप में महिला-नेतृत्व वाले संस्थान
दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) में महिला-नेतृत्व वाले संस्थानों को केंद्र में रखा गया है, ये संस्थान महिलाओं को ग्रामीण परिवर्तन के मुख्य चालक के रूप में स्थापित करते हैं। केंद्रीय बजट 2026-27 में इस कार्यक्रम के लिए 19,200 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। स्वयं सहायता समूहों और उनके महासंघों के माध्यम से, यह कार्यक्रम ग्रामीण परिवारों को बचत, ऋण उपलब्ध कराने और सामुदायिक सहयोग के लिए एक सामूहिक मंच प्रदान करता है। अब तक, 10.05 करोड़ महिलाओं को 90.09 लाख स्वयं सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जिससे वित्तीय समावेशन और सामूहिक आर्थिक कार्रवाई का विस्तार हुआ है।

वित्तीय मध्यस्थता से परे, यह कार्यक्रम सतत कृषि और पशुधन हस्तक्षेपों के माध्यम से महिला किसानों को सहायता प्रदान करता है, गैर-कृषि सूक्ष्म उद्यमों को बढ़ावा देता है और भूमिहीन महिलाओं के लिए स्थानीय संसाधनों पर आधारित आजीविका के अवसर सुलभ कराता है। 'पंचसूत्र' में निहित और 'दशसूत्र' संरचना के माध्यम से विस्तारित, स्वयं सहायता समूह अब स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा, स्थानीय शासन, अधिकारों तक पहुँच और स्थायी आजीविका जैसे क्षेत्रों में सामुदायिक विकास में तेजी से योगदान दे रहे हैं। यह विकास उन्हें समुदाय-नेतृत्व वाले ग्रामीण विकास और सामाजिक परिवर्तन के केंद्रीय संस्थानों के रूप में स्थापित करता है।
आजीविका और सेवा वितरण के लिए महिला-नेतृत्व वाला सामुदायिक संसाधन समूह
बैंक सखी, कृषि सखी, पशु सखी और उद्यम प्रोत्साहन सखी सहित सामुदायिक संसाधन व्यक्ति (सीआरपी) महिला-नेतृत्व वाले सामुदायिक संस्थानों के सुचारू कामकाज की सुविधा प्रदान करते हैं। ये कैडर महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता, नेतृत्व और आजीविका के परिणामों को मजबूत करते हैं; वर्तमान में, 1.49 लाख बैंक सखियाँ वित्तीय सेवाएँ प्रदान कर रही हैं, जबकि 9 लाख से अधिक सीआरपी जमीनी स्तर पर कृषि, बैंकिंग, बीमा, पोषण और संबद्ध गतिविधियों में सहयोग कर रही हैं। 6 से 8 वर्षों के जुड़ाव चक्र के दौरान, स्वयं सहायता समूह से परिवारों से खाद्य सुरक्षा और स्थिर आय की अपेक्षा की जाती है, जिससे स्थायी आजीविका सुधार में योगदान मिलता है।

इस काम को आगे बढ़ाते हुए, उद्यमिता राष्ट्रीय अभियान का लक्ष्य 50,000 सीआरपी को प्रशिक्षित करना और "हर घर उद्यम, हर गाँव समृद्ध" के दृष्टिकोण के तहत 50 लाख स्वयं सहायता समुह के सदस्यों को उद्यम विकास सहायता प्रदान करना है। इंडिया पोस्ट के सहयोग से डिजिटल उपकरणों और 'पॉइंट ऑफ सेल' उपकरणों से लैस महिला-नेतृत्व वाली 'बीसी' सखियों ने बैंकिंग और सामाजिक सुरक्षा सेवाओं तक पहुँच का और अधिक विस्तार किया है। डीएवाई-एनआरएलएम सीआरपी और आंगनवाड़ी, एएनएम तथा 'आशा' कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय ने सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार आधारित सामुदायिक भागीदारी को मजबूत किया है, जिससे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पद्धतियों और स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग में सुधार हुआ है।
समावेशी आजीविका योजना: अत्यंत निर्धन उन्नयन दृष्टिकोण
अप्रैल 2023 में शुरू की गई और डीएवाई-एनआरएलएम के तहत कार्यान्वित समावेशी आजीविका योजना में ग्रामीण महिलाओं के बीच स्थायी आजीविका को बढ़ावा देने के लिए अत्यंत निर्धन उन्नयन दृष्टिकोण को अपनाया गया। यह योजना आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, सामाजिक सशक्तिकरण और वित्तीय समावेशन के एकीकृत सहयोग के माध्यम से कार्य करती है। राज्य-स्तरीय प्रमुख योजना, जैसे कि बिहार की सतत जीविकोपार्जन योजना, परिसंपत्ति हस्तांतरण, कोचिंग, क्षमता निर्माण और समयबद्ध आजीविका सहायता के माध्यम से इस मॉडल की प्रभावशीलता को प्रदर्शित करते हैं। इसे सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुँच और समुदाय-आधारित एमआईएस के माध्यम से डेटा-संचालित निगरानी द्वारा और अधिक सुदृढ़ बनाया गया है।
खाद्य, पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के लिए समुदाय-नेतृत्व वाला दृष्टिकोण

स्वास्थ्य और पोषण के नतीजों में भारत का सुधार, राष्ट्रीय कार्यक्रमों के साथ-साथ समुदाय-नेतृत्व वाली वितरण प्रणालियों की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में उल्लेख किया गया है, भारत ने 1990 के बाद से वैश्विक औसत से बेहतर प्रदर्शन किया है, जिसमें मातृ मृत्यु दर में 86 प्रतिशत, पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में 78 प्रतिशत और नवजात बच्चों की मृत्यु दर में 70 प्रतिशत की गिरावट आई है। शिशु मृत्यु दर, जो 2013 में प्रति हजार जीवित बच्चों पर 40 थी, 2023 में घटकर 25 रह गई है, जो मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में निरंतर प्रगति को रेखांकित करती है।
जमीनी स्तर पर नतीजों को मजबूत करने के लिए, डीएवाई-एनआरएलएम ने कुपोषण, स्वच्छता और स्वास्थ्य जागरूकता से संबंधित चुनौतियों से निपटने के लिए भोजन, पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता हस्तक्षेपों को संस्थागत बनाया है। सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार पर विशेष जोर देने वाली राज्य-विशिष्ट रणनीतियों के माध्यम से कार्यान्वित इस योजना में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, आहार विविधता, खून की कमी, मासिक धर्म स्वच्छता, रोग निवारण, स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान दिया जाता है। इसके साथ ही, पोषण संबंधी आजीविका जैसे कि सब्जियां उगाना, मुर्गी पालन, जुगाली करने वाले छोटे पशुओं का पालन और डेयरी को बढ़ावा दिया जाता। वर्ष 2025 तक, 683 जिलों के 6,406 ब्लॉकों में खाद्य, पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता पर काम शुरू किया जा चूका है जिससे सामुदायिक भागीदारी मजबूत हुई है, पंचायत-स्तरीय पहलों और सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है, और अधिक समावेशी तथा सहभागी स्थानीय शासन के प्रति व्यवहार में बदलाव आया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल विकास, उद्यमिता और रोजगार
भारत का ग्रामीण श्रम बाज़ार एक अलग रोज़गार संरचना दिखाता है जो खेती और स्वरोज़गार पर ज़्यादा निर्भरता से बनी है। सावधिक श्रम बल सर्वेक्षण (अक्टूबर-दिसंबर 2025) के अनुसार, ग्रामीण रोजगार में कृषि श्रमिकों (58.5 प्रतिशत) और स्वरोजगार (63.2 प्रतिशत) का दबदबा है, जिसमें इन श्रेणियों में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक देखी गई है। यह ग्रामीण क्षेत्रों के अनुकूल आजीविका, कौशल और उद्यम के अवसरों को मजबूत करने के महत्व को बल देता है।
समावेशी ग्रामीण विकास के लिए कौशलीकरण के रास्ते
कौशल विकास ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादक रोजगार को बढ़ावा देने और आजीविका के अवसरों में विविधता लाने का एक ज़रूरी ज़रिया है। दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (डीडीयू-जेकेवाई) इस मकसद को पूरा करती है, जिसमें मांग के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाता है, जिससे रोजगार सुनिश्चित होता है। इसमें राष्ट्रीय कौशल विकास निगम के 'सेक्टर स्किल काउंसिल्स' द्वारा अनिवार्य तृतीय-पक्ष प्रमाणन के माध्यम से गुणवत्ता और उद्योग संबंधी प्रासंगिकता सुनिश्चित की जाती है। यह कार्यक्रम 15-35 वर्ष की आयु के गरीब ग्रामीण युवाओं के लिए है, जबकि महिलाओं और अन्य कमजोर समूहों, दिव्यांग व्यक्तियों, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह और ट्रांसजेंडर के लिए आयु सीमा 45 वर्ष तक रखी गई है।
27 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में लागू, डीडीयू-जेकेवाई 37 क्षेत्रों और 816 कार्यों को कवर करने वाले 2,369 प्रशिक्षण केंद्रों के माध्यम से संचालित होता है। अक्टूबर 2025 तक, 82,272 उम्मीदवारों को प्रशिक्षित किया गया और 37,035 को रोजगार दिया गया है। वहीं, योजना की शुरुआत से अब तक कुल 17.92 लाख युवाओं ने प्रशिक्षण प्राप्त किया है और 11.64 लाख युवाओं को सवैतनिक रोजगार प्राप्त हुआ है।

डीडीयू-जेकेवाई के पूरक के रूप में, ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान 33 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 616 जिलों में 629 संस्थानों के माध्यम से सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत कार्य करते हैं, जो स्थानीय रूप से प्रासंगिक कौशल और उद्यमिता प्रशिक्षण के माध्यम से सवैतनिक और स्वरोजगार दोनों को बढ़ावा देते हैं। अपनी स्थापना के बाद से, ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान ने लगभग 59 लाख ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया है, जिनमें से लगभग 43 लाख सवैतनिक या स्वरोजगार में स्थापित हो चुके हैं, जो ग्रामीण श्रम बाजार के परिणामों और उद्यम निर्माण को मजबूत करने में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है।
ग्रामीण भारत में महिलाओं के लिए उद्यमिता के रास्ते
महिला उद्यमिता को बढ़ावा देना ग्रामीण आय में वृद्धि करने के लिए और महिला श्रम बल की भागीदारी बढ़ाने के लिए अनिवार्य है।मैन्युफैक्चरिंग, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल सेवाओं और कृषि-प्रसंस्करण जैसे उभरते क्षेत्रों के साथ कौशल विकास पहलों को जोड़ना महिलाओं के लिए आर्थिक अवसरों को व्यापक बनाता है। 'बैक टू वर्क' (काम पर वापसी) और 'रिटर्नशिप प्रोग्राम' जैसे पूरक उपाय श्रम बल में उनकी पुन: प्रविष्टि को सुगम बनाते हैं। साथ ही, स्वयं सहायता समूहों को एमएसएमई परिवेश में एकीकृत करना महिलाओं को रोजमर्रा के कामों के साथ साथ औपचारिक और विकास-उन्मुख उद्यमों की ओर बढ़ने में सहायता प्रदान करता है।
ग्रामीण महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों के लिए 'शी-मार्ट्स'
लखपति दीदी कार्यक्रम की सफलता को आगे बढ़ाते हुए, केंद्रीय बजट 2026-27 में क्लस्टर-स्तरीय महासंघों के भीतर समुदाय-स्वामित्व वाले खुदरा बिक्री केंद्र के रूप में 'शी-मार्ट्स' स्थापित करने का प्रस्ताव है। संवर्धित और अभिनव वित्तपोषण द्वारा सहायता प्राप्त, इन पहलों का उद्देश्य महिलाओं की आजीविका को केवल 'ऋण-आधारित गतिविधियों' से हटाकर 'स्थायी उद्यम स्वामित्व' की ओर ले जाना है।
ग्रामीण भारत में रोजगार के अवसरों को बढ़ाना
विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025, भारत की ग्रामीण रोजगार नीति में एक महत्वपूर्ण सुधार का प्रतिनिधित्व करता है। वर्ष 2026-27 के बजट में 95,692.31 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ, यह अधिनियम जवाबदेही को मजबूत करके और रोजगार सृजन को अवसंरचना के विकास तथा जलवायु अनुकूलन के उद्देश्यों के साथ जोड़कर रोजगार गारंटी व्यवस्था को बेहतर बनाता है। यह अधिनियम 'मनरेगा' की तुलना में एक ठोस और उन्नति का प्रतीक है।
- यह कानून प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष 125 दिनों के अकुशल सवैतनिक रोजगार का कानूनी अधिकार प्रदान करता है।
- यह चार प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करता है: जल सुरक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचा, आजीविका और आपदा तैयारी।
- यह रोजगार में देरी के लिए मुआवजे के प्रावधानों, हक से वंचित करने वाली शर्तों को हटाने और सुदृढ़ जवाबदेही के माध्यम से अधिकार-आधारित सुरक्षा उपायों को बढ़ाता है।
निष्कर्ष
पिछले एक दशक में भारत के ग्रामीण विकास की यात्रा, बिखरे हुए कल्याणकारी प्रावधानों की बजाए एक एकीकृत, विकेंद्रीकृत और समुदाय-नेतृत्व वाले विकास प्रतिमान की ओर संरचनात्मक बदलाव का संकेत देती है। बजट आवंटन में महत्वपूर्ण वृद्धि और निरंतर सार्वजनिक निवेश ने ग्रामीण क्षेत्रों में आवास, कनेक्टिविटी, पेयजल, स्वच्छता, डिजिटल सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा तक पहुँच को व्यापक बनाया है। इसके साथ ही, आजीविका, कौशल निर्माण और उद्यमिता को भी समान रूप से सुदृढ़ किया गया है। इस परिवर्तन के केंद्र में पंचायती राज संस्थानों, स्वयं सहायता समूहों और सामुदायिक कैडरों जैसे स्थानीय संस्थानों का सशक्तिकरण रहा है। इन संस्थाओं ने ग्रामीण शासन को 'निष्क्रिय लाभार्थी मॉडल' से बदलकर 'जन भागीदारी' के सिद्धांत पर आधारित सक्रिय और सहभागी साझेदारी में पुनर्स्थापित किया है। प्रौद्योगिकी-सक्षम सेवा वितरण, महिलाओं के नेतृत्व वाली संस्थागत रूपरेखा और उन्नयन-आधारित आजीविका रणनीतियों ने विशेष रूप से कमजोर और हाशिए पर रहने वाली आबादी के बीच पारदर्शिता, समावेशन और लचीलेपन को और मजबूत किया है। सामूहिक रूप से, ये सुधार ग्रामीण भारत को केवल विकास प्रयासों के एक प्राप्तकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि समावेशी विकास, लोकतांत्रिक शासन और दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक स्थिरता के एक महत्वपूर्ण चालक के रूप में स्थापित करते हैं।
संदर्भ
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पीआईबी शोध
पीके/केसी/एसके
(रिलीज़ आईडी: 2227898)
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