शिक्षा मंत्रालय
एचएनएलयू रायपुर में रामसर कन्वेंशन के 50 वर्ष पूरे; कोपरा जलाशय बना छत्तीसगढ़ का पहला रामसर स्थल
प्रविष्टि तिथि:
04 FEB 2026 4:25PM by PIB Raipur
हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू), रायपुर द्वारा विश्व आर्द्रभूमि दिवस के अवसर पर “रामसर कन्वेंशन के 50 वर्ष: वैश्विक एवं भारतीय परिप्रेक्ष्य में आर्द्रभूमि संरक्षण” विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में कोपरा जलाशय को छत्तीसगढ़ के प्रथम रामसर स्थल के रूप में मान्यता मिलने के अवसर को भी चिह्नित करता है।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रोफेसर (डॉ.) वी. सी. विवेकानंदन, कुलपति, हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर ने वर्ष 1971 में अंगीकृत रामसर कन्वेंशन की निरंतर प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विश्व आर्द्रभूमि दिवस का आयोजन और कोपरा जलाशय को रामसर स्थल का दर्जा मिलना केवल किसी अंतरराष्ट्रीय संधि या वैश्विक सूची में नाम दर्ज होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस विचार की पुनः पुष्टि है कि आर्द्रभूमियाँ प्रकृति, मानव समाज और हमारे साझा भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
मुख्य भाषण डॉ. रितेश कुमार, निदेशक, वेटलैंड्स इंटरनेशनल – दक्षिण एशिया द्वारा दिया गया। उन्होंने रामसर ढांचे के अंतर्गत भारत की चार दशकों की यात्रा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हुए रामसर स्थलों के विस्तार और नियामक ढांचे के विकास में हुई प्रगति को रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने शासन, पारिस्थितिकी और संस्थागत स्तर पर विद्यमान चुनौतियों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। डॉ. कुमार ने आर्द्रभूमियों पर अवैज्ञानिक कंक्रीटीकरण और तथाकथित सौंदर्यीकरण परियोजनाओं के दुष्प्रभावों पर चिंता व्यक्त करते हुए आर्द्रभूमियों के लिए एक राष्ट्रीय मिशन, अनुसंधान और नीति के बेहतर समन्वय, सुदृढ़ वित्तपोषण, क्षमता निर्माण तथा शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में आर्द्रभूमि शिक्षा को मुख्यधारा में शामिल किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।
आर्द्रभूमि संरक्षण के विधिक और शासनगत पहलुओं पर अपने विचार रखते हुए श्री प्रतीक वर्मा, विधिक सलाहकार, छत्तीसगढ़ राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने रामसर कन्वेंशन को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण विधि का एक आधारभूत दस्तावेज बताया। उन्होंने भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण को सुदृढ़ करने में न्यायालयों की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया तथा विश्व आर्द्रभूमि दिवस को जन-जागरूकता बढ़ाने और इन संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण हेतु राजनीतिक एवं संस्थागत इच्छाशक्ति को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया।
इस कार्यक्रम की परिकल्पना और आयोजन डॉ. देबमिता मंडल, प्रमुख, सेंटर फॉर लॉ एंड साइंसेज़, हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय द्वारा किया गया, जिसमें डॉ. राणा नवनीत रॉय, प्रमुख, सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉज़ का सहयोग रहा। कार्यशाला का आयोजन वेटलैंड्स इंटरनेशनल – दक्षिण एशिया, छत्तीसगढ़ राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण तथा छत्तीसगढ़ राज्य जैव विविधता बोर्ड के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम का संचालन हिमांशी ठाकुर, विधि स्नातकोत्तर छात्रा, हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय द्वारा किया गया।
कार्यशाला में विश्वविद्यालय के संकाय सदस्यों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों सहित देश के विभिन्न भागों से 80 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का समापन इस सामूहिक आह्वान के साथ हुआ कि रामसर कन्वेंशन की भावना को स्वस्थ आर्द्रभूमियों, सुदृढ़ समुदायों, जागरूक नागरिकों और सतत विकास जैसे ठोस एवं मापनीय परिणामों में परिवर्तित किया जाए तथा छत्तीसगढ़ को भारत की आर्द्रभूमि संरक्षण यात्रा में एक उभरते हुए योगदानकर्ता के रूप में स्थापित किया जाए।
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आरडीजे
(रिलीज़ आईडी: 2223145)
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