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पवित्र अवशेषों से लेकर गणतंत्र दिवस तक: वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन के प्रतिनिधियों ने भारत की आध्यात्मिक आत्मा एवं राष्ट्रीय संकल्प का अनुभव प्राप्त किया

प्रविष्टि तिथि: 27 JAN 2026 6:52PM by PIB Delhi

वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में लगभग 250 विदेशी भिक्षुओं एवं वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन (जीबीएस) के प्रतिनिधियों का किला राय पिथोरा सांस्कृतिक परिसर का दौरा शामिल था, जहां उन्होंने भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को श्रद्धांजलि अर्पित की और प्रार्थना की। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन 03 जनवरी, 2026 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया था। इस अवसर पर विदेशों एवं भारत से आए प्रतिनिधियों ने प्रदर्शनी को बहुत उत्सुक्तापूर्वक दो घंटे से अधिक समय तक अवलोकन किया और पिपरवाह अवशेषों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं इसकी जानकारी प्राप्त कर मंत्रमुग्ध हुए। उन्हें जानकारी प्राप्त हुई कि किस प्रकार से भारत ने 1898 में देश से बाहर ले गए बुद्ध के अवशेषों को वापस लाने के लिए की कोशिश की और उन्हें वापस लाकर उसी अवशेष के अन्य हिस्सों के साथ मिलाया। उन्होंने भारत द्वारा न केवल अपनी प्राचीन विरासत को संरक्षित करने की बल्कि उन्हें स्वदेश वापस लाने के प्रयासों की भी सराहना की।

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अधिकांश प्रतिनिधि अवशेष संग्रहालय के दौरे से बहुत प्रभावित हुए तथा उन्होंने आशीर्वाद प्राप्त किया जबकि कुछ प्रतिनिधियों ने तो शांत एवं सुकून भरे माहौल में पवित्र अवशेषों के सामने मंत्रोच्चारण भी किया। संघ के एक वरिष्ठ सदस्य ने कहा, “हमने शाक्यमुनि के अवशेषों से आशीर्वाद प्राप्त करने एवं समृद्ध संग्रह देखने का दुर्लभ अवसर प्राप्त किया जिससे हम खुद को अत्यंत सौभाग्यशाली महसूस कर रहे हैं।” एक अन्य सदस्य ने कहा, “यह जीबीएस का एक आध्यात्मिक पहलू था जिसकी हमने कभी अपेक्षा नहीं की थी लेकिन यह हमें प्राप्त हुआ।” जीबीएस के आयोजकों ने इस कार्यक्रम को प्रतिभागियों के लिए एक अप्रत्याशित घटना के रूप में आगंतुकों से छिपा कर रखा था जिसका उद्देश्य शैक्षणिक एवं दार्शनिक पहलुओं को एक आध्यात्मिक अनुभव के साथ मिश्रित करना था।

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वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन की गतिविधियों का एक अन्य पहलू 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस परेड का साक्षी बनने लिए विभिन्न देशों के लगभग 60 भिक्षुओं का आगमन रहा। रक्षा उपकरणों एवं सैनिकों के प्रदर्शन के बीच भिक्षुओं की उपस्थिति ने इस आयोजन को सभी दर्शकों के लिए एक गंभीर क्षण का निर्माण किया।

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जहां एक ओर भारत ने विश्व के सामने अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया वहीं दूसरी ओर श्रद्धेय भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों की उपस्थिति ने शांति एवं करुणा का प्रतीक बनकर एक गहरा संदेश दिया कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान धम्म के मार्ग में निहित है, जिसका प्रधानमंत्री मोदी प्रायः अक्सर उल्लेख करते हैं।

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एक वरिष्ठ भिक्षु ने कहा कि यह एक रोमांचकारी अनुभव था। परेड समाप्त होने और समूह के मंच से निकलते ही, वियतनाम की तीन भिक्षुणियों ने अनुरोध किया कि क्या वे वहीं रुक सकती हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बैठक क्षेत्र से गुजर रहे थे और वे उनका अभिवादन करना चाहती थीं। हालांकि समूह के बाकी सदस्य चले गए थे लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के कर्मचारियों ने उनका स्वागत किया। बाद में उन्होंने प्रधानमंत्री को इतने करीब से देखकर अपनी खुशी व्यक्त की। इस खास पल की यादों को संजोने के लिए उन्होंने कई तस्वीरें भी ली ताकि वापस लौटने पर वे दूसरों के साथ अपने अनुभवों को साझा कर सकें। बाद में एक भिक्षुणी ने कहा, "यह मेरे लिए आजीवन प्राप्त होने वाला एक अनुभव था।"

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इन दोनों कार्यक्रमों ने मिलकर भारत की पहचान के दोहरे स्वरूप को उजागर किया: एक ऐसा देश जो आध्यात्मिक ज्ञान एवं सांस्कृतिक विरासत में निहित है और साथ ही साथ अपनी लोकतांत्रिक शक्ति एवं संप्रभुता में प्रबल है।

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पीके/केसी/एके/एसएस


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