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स्वदेशी रसायन और दवा निर्माण को बढ़ावा

प्रविष्टि तिथि: 02 DEC 2025 10:17PM by PIB Delhi

घरेलू रसायन विनिर्माण को मजबूत करने के लिए मेक इन इंडिया पहल के अंतर्गत रसायन एवं पेट्रोरसायन विभाग द्वारा निम्नलिखित कदम उठाए जा रहे हैं:

(i) पेट्रोलियम, रसायन एवं पेट्रोरसायन निवेश क्षेत्र (पीसीपीआईआर): भारत सरकार ने पेट्रोलियम, रसायन एवं पेट्रोरसायन निवेश क्षेत्रों (पीसीपीआईआर) में निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन के लिए पीसीपीआईआर नीति अधिसूचित की है। पीसीपीआईआर बड़े पैमाने पर एकीकृत और पर्यावरण अनुकूल तरीके से रसायन एवं पेट्रोरसायन क्षेत्रों को बढ़ावा देते हैं। पीसीपीआईआर की संकल्पना एक क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण के साथ की गई है जिसमें व्यवसाय स्थापित करने के लिए अनुकूल प्रतिस्पर्धी वातावरण प्रदान करने हेतु साझा अवसंरचना और सहायक सेवाएं शामिल हैं।

(ii) प्लास्टिक पार्क योजना: रसायन और पेट्रोरसायन विभाग (डीसीपीसी) पेट्रोरसायन की नई योजना के तहत प्लास्टिक पार्कों की स्थापना के लिए योजना को कार्यान्वित करता है। यह योजना अपेक्षित अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे और सक्षम सामान्य सुविधाओं के साथ जरूरत-आधारित प्लास्टिक पार्कों की स्थापना को बढ़ावा देती है। इसका उद्देश्य इस क्षेत्र में निवेश, उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार पैदा करने के लिए डाउनस्ट्रीम प्लास्टिक प्रसंस्करण उद्योग की क्षमताओं को समेकित और समन्वित करना है। इस योजना के अंतर्गत, भारत सरकार प्रति परियोजना 40 करोड़ रुपए की सीमा के अधीन परियोजना लागत के 50 प्रतिशत तक अनुदान, वित्त पोषण प्रदान करती है। योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार, अब तक नौ प्लास्टिक पार्क स्वीकृत किए गए हैं और ये कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं।

(iii) उत्कृष्टता केंद्र: नए अणुओं और प्रौद्योगिकियों को विकसित करने के लिए रासायनिक और पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में अनुसंधान और विकास प्रयासों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, पेट्रोकेमिकल्स की नई योजना में उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने की एक उप-योजना शामिल है। इसका उद्देश्य मौजूदा प्रौद्योगिकी में सुधार और पॉलिमर, रसायन और प्लास्टिक के नए अनुप्रयोगों के विकास को बढ़ावा देने के लिए शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों को अनुदान सहायता प्रदान करना है। योजना का जोर मौजूदा विनिर्माण प्रक्रियाओं के आधुनिकीकरण और उन्नयन के साथ-साथ उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार पर है। इस योजना के अंतर्गत, केंद्र सरकार कुल परियोजना लागत के 50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जो 5 करोड़ रुपए की ऊपरी सीमा के अधीन है। अब तक इस योजना के तहत 18 उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं।

बल्क ड्रग पार्कों को बढ़ावा देने की योजना के तहत, जिसका कुल बजटीय परिव्यय 3,000 करोड़ रुपए है, तीन पार्क स्वीकृत किए गए हैं और आंध्र प्रदेश, गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश में उनकी संबंधित राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों के माध्यम से विकास के विभिन्न चरणों में हैं। इन पार्कों की कुल परियोजना लागत 6,300 करोड़ रुपए से अधिक है जिसमें साझा बुनियादी ढांचा सुविधाओं के निर्माण के लिए प्रत्येक को 1,000 करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता शामिल है। ये पार्क बल्क ड्रग या सक्रिय फार्मास्युटिकल घटक (एपीआई) निर्माताओं को रियायती दर पर भूमि और बिजली, पानी, अपशिष्ट उपचार संयंत्र, भाप, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, गोदाम की सुविधाएं प्रदान करेंगे। संबंधित राज्यों की राज्य कार्यान्वयन एजेंसियों ने स्थायी पूंजी निवेश पर पूंजीगत सब्सिडी, ब्याज सब्सिडी, राज्य माल और सेवा कर प्रतिपूर्ति, स्टांप शुल्क और पंजीकरण शुल्क में छूट आदि के रूप में राजकोषीय प्रोत्साहन की पेशकश की है। इसके अलावा, इस योजना में पार्कों में भूमि आवंटन के लिए आवेदकों को बल्क ड्रग्स के लिए पीएलआई योजना में प्राथमिकता वाले उत्पाद के विनिर्माण के लिए इकाइयां स्थापित करने के लिए भूमि आवंटन में प्राथमिकता प्रदान की गई है।

इसके अलावा, चिकित्सा उपकरण पार्कों को बढ़ावा देने की योजना के अंतर्गत, ग्रेटर नोएडा (उत्तर प्रदेश), उज्जैन (मध्य प्रदेश) और कांचीपुरम (तमिलनाडु) में तीन पार्क स्वीकृत किए गए हैं और विकसित किए जा रहे हैं। इसका कुल परिव्यय 300 करोड़ रुपए है। इन तीनों पार्कों में साझा बुनियादी ढांचा सुविधाओं के विकास के लिए दो किस्तों में 180 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं। तीनों चिकित्सा उपकरण पार्कों में साझा सुविधाओं के लिए सिविल कार्य निर्माण के अंतिम चरण में है। सितंबर 2025 तक, 194 चिकित्सा उपकरण निर्माताओं को स्वीकृत चिकित्सा उपकरण पार्कों में 298.58 एकड़ क्षेत्र में भूमि आवंटित की जा चुकी है और 34 इकाइयों का निर्माण कार्य शुरू हो चुका है।

एपीआई के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने, आयात निर्भरता को कम करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम और इसमें हुई प्रगति इस प्रकार है:

(i) भारत में महत्वपूर्ण प्रमुख प्रारंभिक सामग्री (केएसएम)/औषधि मध्यवर्ती (डीआई) और सक्रिय फार्मास्युटिकल घटक (एपीआई) के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना (जिसे थोक दवाओं के लिए पीएलआई योजना के रूप में भी जाना जाता है): इस योजना का कुल बजटीय परिव्यय 6,940 करोड़ रुपए है और इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण दवाओं को बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले महत्वपूर्ण एपीआई की आपूर्ति में व्यवधान को टालना है। सितंबर 2025 तक, 26 केएसएम/डीआई/एपीआई के लिए उत्पादन क्षमता बनाई गई है जिन्हें पहले मुख्य रूप से आयात किया जाता था। सितंबर 2025 तक, छह साल की अवधि में 4,329.95 करोड़ रुपए की निवेश प्रतिबद्धता के मुकाबले, साढ़े तीन साल में 4,763.34 करोड़ रुपए का निवेश किया जा चुका है। इसके अलावा, इस योजना के परिणामस्वरूप सितंबर 2025 तक 2,315.44 करोड़ रुपए की कुल बिक्री दर्ज की गई है जिसमें 508.12 करोड़ रुपए का निर्यात शामिल है। इसके परिणामस्वरूप 1,807.32 करोड़ रुपये के आयात से बचा जा सका है।

(ii) फार्मास्यूटिकल्स के लिए पीएलआई योजना: इस योजना का कुल बजटीय परिव्यय 15,000 करोड़ रुपए है जिसका उद्देश्य फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में निवेश और उत्पादन बढ़ाकर भारत की विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाना और फार्मास्युटिकल क्षेत्र में उच्च मूल्य वाली वस्तुओं के लिए उत्पाद विविधीकरण में योगदान देना है। इसके अलावा उच्च मूल्य वाली दवाओं जैसे बायोफार्मास्युटिकल्स, जटिल जेनेरिक दवाएं, पेटेंट प्राप्त दवाएं या पेटेंट समाप्ति के करीब दवाएं, ऑटो-इम्यून दवाएं, कैंसर-रोधी दवाएं आदि के उत्पादन को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य भी इसमें रखा गया है। साथ ही बल्क ड्रग्स के लिए पीएलआई योजना के तहत अधिसूचित एपीआई/डीआई/केएसएम के अलावा अन्य का भी उत्पादन करना है। इसके कारण योग्य उत्पादों में निवेश और उत्पादन को बढ़ा है। सितंबर 2025 तक यानी योजना के संचालन के साढ़े तीन वर्षों में, 26,123 करोड़ रुपए मूल्य की एपीआई और मध्यवर्ती दवाओं की घरेलू बिक्री हुई है।

केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने आज राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।  

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पीके/केसी/बीयू/एम


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