संस्कृति मंत्रालय
मानव संग्रहालय में “माह का प्रादर्श “जात-“अनुष्ठानिक कार्यो में उपयोग किया जाने वाला एक विशाल तांबे का पात्र” प्रदर्शनी का शुभारंभ।
प्रविष्टि तिथि:
09 SEP 2025 5:43PM by PIB Bhopal
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल में प्रतिमाह आयोजित होने वाले “माह का प्रादर्श” (Exhibit of the Month) कार्यक्रम के अंतर्गत इस माह के प्रादर्श का उद्घाटन वीथी संकुल के अंतरंग प्रदर्शनी परिसर में किया गया। इस अवसर पर मूल रूप से उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर निवासी श्री निपामाचा सिंह (वरिष्ठ पहलवान, पूर्व सैनिक, विशिष्ट कुश्ती कोच एवं मार्शल आर्टिस्ट) मुख्य अतिथि रहे। श्री निपामाचा सिंह ने 3 ईएमई आर्मी सेंटर, बैरागढ़, भोपाल में अपने सेवाकाल के दौरान अनेक सैनिकों को कुश्ती एवं मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण प्रदान किया है। उन्होंने इस प्रदर्शन को संग्रहालय द्वारा अरुणाचल के समृद्ध संस्कृति को दर्शाने वाला एक अच्छा प्रयास बताया ।
इस कार्यक्रम में संग्रहालय के निदेशक प्रो. डा. अमिताभ पांडे सहित संग्रहालय के प्रमुख अधिकारी डा सोमा किरो, डा एस के पांडे, पी आर ओ हेमंत बहादुर सिंह परिहार, राजेंद्र झरिया, राजीव जैन, डा मोहन लाल, डा मोहम्मद रेहान , डा अनुराधा पंडा , डा शिखा तहेंगुरिया आदि सहित कई कर्मचारी, संग्रहालय विज्ञान के विद्यार्थी एवं बड़ी संख्या में दर्शकों ने भाग लिया।
इस अवसर पर संग्रहालय के निदेशक डॉ अमिताभ पांडे ने कहा कि “माह का प्रादर्श केवल एक वस्तु का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह भारत की विविध सांस्कृतिक धरोहर और उसमें निहित मानवीय अनुभवों को समझने का माध्यम है।

इस बार संग्रहालय द्वारा प्रदर्शित “माह का प्रादर्श” जात, जो एक विशाल तांबे का पात्र है, का संयोजन संग्रहालय के मानव विज्ञानी अधिकारी श्री एन. सकमाचा सिंह (सहायक कीपर ) द्वारा किया गया । इस प्रादर्श को वर्ष 2005 में शेरदुकपेन समुदाय के थोंग्रे गाँव, पश्चिम कामेंग, अरुणाचल प्रदेश से श्री सकमाचा सिंह द्वारा ही संग्रहित किया गया था। श्री सकमाचा सिंह द्वारा इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए बताया,यह धातु पात्र शेरदुकपेन जनजाति एवं अन्य पड़ोसी समुदायों के आर्थिक, सामाजिक, अनुष्ठानिक और अंतर्सांस्कृतिक महत्व का द्योतक है। पड़ोसी मिजी जनजाति इस पात्र को ‘सिजांग’ के नाम से जानती है। मिजी समाज में यह वस्तु न केवल सामाजिक प्रतिष्ठा और धन का प्रतीक है, बल्कि इसे वधू मूल्य के रूप में भी दिया जाता है। विशेष अवसरों पर इसका अनुष्ठानिक प्रयोग होता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मिजी जनजाति अपने किसी अत्यंत सम्मानित समुदाय सदस्य की मृत्यु पर इस पात्र को ताबूत के रूप में उपयोग करती है।
शेरदुकपेन अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग ज़िले में रूपा, कालाकटंग और भालुकपोंग क्षेत्र में मुख्य रूप से निवास करने वाला एक प्रमुख जनजातीय समुदाय है।

इस अवसर पर संग्रहालय के जन संपर्क अधिकारी हेमंत बहादुर सिंह परिहार ने कहा कि “इस प्रकार के अनूठे प्रादर्श समाजों की पारंपरिक जीवनशैली, उनके सामाजिक-धार्मिक दृष्टिकोण और अंतरसांस्कृतिक संबंधों को गहराई से समझने में मदद करते हैं।” “माह का प्रादर्श” श्रृंखला के अंतर्गत प्रस्तुत यह तांबे का पात्र केवल एक धातु की वस्तु न होकर शेरदुकपेन एवं पड़ोसी समुदायों की सामाजिक संरचना, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय इस प्रकार के अनूठे प्रादर्शों के माध्यम से देश की विविध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित और प्रस्तुत करता रहा है।
(रिलीज़ आईडी: 2165363)
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