फाइनेंस कमीशन

15वें वित्‍त आयोग के अध्‍यक्ष श्री एन.के. सिंह ने ‘इंडियन फिस्‍कल फेडरलिज्‍म’ नामक पुस्‍तक के विमोचन अवसर पर संबोधित किया

प्रविष्टि तिथि: 28 MAR 2019 7:29PM by PIB Delhi

15वें वित्‍त आयोग के अध्‍यक्ष श्री एन.के. सिंह ने आरबीआई के पूर्व गवर्नर एवं 14वें वित्‍त आयोग के अध्‍यक्ष डॉ. वाई वी रेड्डी और तेलंगाना सरकार के सलाहकार (वित्‍त) डॉ. जी आर रेड्डी द्वारा लिखित पुस्‍तक इंडियन फिस्कल फेडरलिज्‍मके विमोचन अवसर पर भाषण दिया जिनकी मुख्‍य बातें निम्‍नलिखित हैं –

मैं इस बात पर इनसे सहमत हूं कि राजकोषीय संघवाद एक गतिशील प्रक्रिया है जो निरंतर प्रगति पर है।

(पेज-12) यह बात रेखांकित करना उचित है कि वित्‍त आयोग, जैसा कि संविधान में परिकल्‍पना की गई है, अपने निरंतर कामकाज को कभी भी बाधित नहीं करता है। केवल हर 5 वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले आयोग का पुनर्गठन करना पड़ता है। अब मध्‍यमकालिक संशोधनों को सुनिश्चित करने की आवश्‍यकता है, जैसा कि ग्रांट्स कमीशन के ऑस्‍ट्रेलियाई मॉडल में देखा जाता है। इस मॉडल के तहत उपलब्‍ध नवीनतम आंकड़ों के आधार पर हर वर्ष स्‍टेट रिलेटिविटीज में संशोधन किया जाता है। यदि अर्थव्‍यवस्‍था के वृहद मापदंड या पैरामीटर कुछ और संकेत देते हों तो क्‍या कोई भी राहत देने से पहले राज्‍यों पर वित्‍त आयोग का कहर 5 वर्षों तक क्‍यों जारी रहना चाहिए? आखिरकार, वित्‍त आयोग के सभी पंचाट या सिफारिशें यथार्थपरक अनुमानों पर आधारित होती हैं, जो महत्‍वपूर्ण मापदंडों जैसे कि राजस्‍व अनुमान, राज्‍य की जीडीपी वृद्धि दर, जायज व्‍यय वृद्धि इत्‍यादि की दृष्टि से स्‍वीकार्य वृहद – आर्थिक मॉडल है। दरअसल, अनेक राज्‍यों के अपने दौरों के दौरान हमने यह पाया कि कुछ राज्‍यों में राजस्‍व अनुमान यथार्थपरक नहीं थे, व्‍यय को कम करके दिखाया गया जो स्‍वीकार्य नहीं था और राज्‍यों के जीडीपी संबंधी आंकड़े बिल्‍कुल दोषपूर्ण नजर आये। अत: यदि धनराशि के अंतरण में किसी न किसी तरह की खामी नजर आती है तो वैसी स्‍थिति में राज्‍यों अथवा केन्‍द्र के मामले में आवश्‍यक मध्‍यमकालिक संशोधन करने की क्‍या व्‍यवस्‍था है। क्‍या इस तरह के संशोधन करने के लिए 5 साल का इंतजार करना चाहिए अथवा बीच में ही इसकी व्‍यवस्‍था की जानी चाहिए।  

(पेज-13) केन्‍द्र स्‍तर पर गवर्नेंस और केन्‍द्र-राज्‍य संबंधों में योजना आयोग की भूमिका को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई थी। इस आशय का अंदेशा व्‍यक्‍त किया गया था कि यह एक अतिरिक्‍त संवैधानिक प्राधिकरण होगा। कुछ लोगों का यह मानना था कि वित्‍त आयोग से इतर किसी भी तरह के वित्‍तीय हस्‍तांतरण की परिकल्‍पना संविधान में नहीं की गई थी।'  

दरअसल, इस पुस्‍तक के 14वें पेज के चौथे पैराग्राफ की अंतिम पंक्ति में यह लिखा हुआ है, ‘चौथे वित्‍त आयोग से ही आयोग के गठन का मार्ग प्रशस्‍त करने वाले राष्‍ट्रपति आदेश के विचारार्थ विषयों (टीओआर) में वित्‍त आयोग द्वारा राज्‍य की योजना संबंधी आवश्‍यकताओं पर विचार किये जाने की जरूरत को समाप्‍त कर दिया गया और इस तरह से योजना आयोग धन अंतरण या हस्‍तांतरण का एक महत्‍वपूर्ण समानांतर चैनल बन गया।' विगत वर्षों में अनेक वित्‍त आयोगों ने योजना आवश्‍यकताओं पर विचार किये जाने से स्‍वयं को अलग रखे जाने के कारण अपनी संवैधानिक भूमिका को सीमित किये जाने पर अफसोस प्रकट किया है। अब जबकि योजना आयोग का वजूद ही समाप्‍त हो गया है, इसलिए इस तरह का अफसोस व्‍यक्‍त नहीं किया जा सकता। राज्‍यों की योजना संबंधी आवश्‍यकताओं को लेकर वित्‍त आयोग पर लगायी गई पाबंदी अब बरकरार नहीं है। यह स्थिति विशेषकर इसलिए है क्‍योंकि इस पुस्‍तक के लेखकों द्वारा पृष्‍ठ 16 पर लिखे गये शब्‍दों के मुताबिक अब नीति आयोग को स्‍वयं ही सलाहकार से कहीं अधिक भूमिका प्राप्‍त है। नीति आयोग की भूमिका में बदलाव लाते हुए नीति निर्माता इस बात का ख्‍याल रखेंगे कि किसी भी तरह से योजना आयोग वर्जन 2.0 न बनने दिया जाए क्‍योंकि नीति आयोग को संसाधन आवंटन अधिकार न देने का निर्णय सोच - समझकर लिया गया था।  क्‍या किसी को अन्‍य समानांतर वित्‍तीय हस्‍तांतरण व्‍यवस्‍था का सृजन करने पर ध्‍यान नहीं देना चाहिए।

 

मौलिक गलती

संविधान के अनुच्‍छेद 246 पर आधारित संविधान की सातवीं अनुसूची में स्‍पष्‍ट रूप से केन्‍द्रीय सूची, समवर्ती सूची और राज्‍य सूची के लिए विभिन्‍न विषयों का निर्धारण किया गया है, जिसमें यह अपवाद है कि इनमें से प्रत्‍येक दूसरे की क्षेत्राधिकार सीमाओं का सम्‍मान करेगा। इस पुस्‍तक के लेखकों ने पृष्‍ठ 22 पर हकदारी-आधारित केन्द्रीय विधानों का युग के नाम से एक रोचक खंड पेश किया है। इस संबंध में महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005, बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के उदाहरण दिये गये हैं। इस तरह के एकल हकदारी वाले विधान किस तरह से संविधान की सातवीं अनुसूची से मेल नहीं खाते हैं और तय सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं?  ऐसा क्‍यों है कि किसी भी राज्‍य ने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किये जाने का विरोध नहीं किया?  लेखकों ने पृष्‍ठ 76 के पेज 2 पर यह बात भी बिल्‍कुल सही ढंग से रेखांकित की है कि विगत वर्षों के दौरान समवर्ती सूची और राज्‍यों से जुड़े विषयों पर केन्‍द्र के व्‍यय का संभवत: इस आधार पर विस्‍तार किया गया है कि इस तरह के व्‍यय से राष्‍ट्रीय प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकेगा।’ 

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आर.के.मीणा/एएम/आरआरएस/एस-813

 


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