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सीएसआईआर- एनआईएससीपीआर ने सीडीटीके-2026 पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का सफलतापूर्वक समापन किया; यह 'इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज' (आईजेटीके) के 25 वर्ष पूरे होने का प्रतीक


सीडीटीके शोधकर्ताओं और पारंपरिक ज्ञान रखने वालों के बीच अनुभवात्मक शिक्षा और ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है

पद्म श्री से सम्मानित, बीज संरक्षणकर्ता श्रीमती राहीबाई सोमा पोपेरे का विशेष व्याख्यान

प्रविष्टि तिथि: 03 NOV 2026 9:57PM by PIB Delhi

'पारंपरिक ज्ञान के संचार और प्रसार' (सीडीटीके) पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का अंतिम दिन विशेष वैज्ञानिक सत्र के साथ शुरू हुआ। सत्र का शीर्षक था: "पारंपरिक ज्ञान के क्षेत्र में विद्वतापूर्ण संचार की चुनौतियां और अवसर: इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज (आईजेटीके) के 25 वर्ष का उत्सव"। सत्र की शुरुआत विशेष वीडियो के साथ हुई, जिसमें आईजेटीके की शुरुआत, इसकी प्रगति और 25 वर्ष की यात्रा के प्रमुख पड़ावों को दिखाया गया। इस वीडियो प्रस्तुति के बाद, सीएसआईआर- एनआईएससीपीआर की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने आधिकारिक तौर पर आईजेटीके के 25वीं वर्षगांठ के अंक का लोकार्पण किया।

गणमान्य व्यक्तियों ने आईजेटीके के 25वीं वर्षगांठ पर अंक का लोकार्पण किया

सत्र का पहला मुख्य संबोधन (ऑनलाइन) यूनिवर्सिटी ऑफ द वेस्ट इंडीज, मोना में एथनोबॉटनी (नृ-वनस्पति विज्ञान) की प्रोफेसर डॉ. इना वंडेब्रोक ने दिया। इस संबोधन में, उन्होंने जमैका के कैरेबियाई घने जंगलों (जो जैव विविधता के हॉटस्पॉट हैं) में स्थानीय समुदायों के साथ काम करने के अनुभव साझा किए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि समुदायों का मजबूत सहयोगी बनना कितना आवश्यक है। सत्र के अध्यक्ष और मुख्य वक्ता, जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पुलोक मुखर्जी (जो आईजेटीके के कार्यकारी संपादक भी हैं) ने 'ओमिक्स इंटीग्रेशन' के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान को वैश्विक साक्ष्यों में बदलने पर जोर दिया। उन्होंने 'लोक स्वास्थ्य परंपरा' और इसके स्थायी प्रभाव पर बल दिया। आईजेटीके के मुख्य संपादक डॉ. एच. आर. नागेंद्र ने जर्नल के विकास और वैज्ञानिक अनुक्रमण में हासिल किए गए मील के पत्थरों की जानकारी दी। जर्नल के पूर्व संपादकों - डॉ. एन. आर. मनकड, डॉ. टी. के. मुखर्जी और डॉ. के. पी. सिंह - ने आईजेटीके की शुरुआत, इसकी 25 वर्ष की विद्वतापूर्ण यात्रा और संपादकीय विरासत को याद किया।  सीएसआईआर- एनआईएससीपीआर  की डॉ. चारु वर्मा ने वैश्विक स्तर पर पहुंच सुनिश्चित करने के लिए डिजिटलीकरण पर जोर दिया, जबकि आईसीएआर- आईएआरआई के डॉ. आर. एन. पडारिया ने सामुदायिक स्वामित्व और ऐसी भागीदारी वाली रूपरेखाओं पर बल दिया, जिनसे पारंपरिक ज्ञान रखने वालों को लाभ मिल सके।

पांचवें वैज्ञानिक सत्र का शीर्षक “पारंपरिक ज्ञान को लोकप्रिय बनाने में चुनौतियां और अवसर” था, इसकी अध्यक्षता विज्ञान भारती, केरलम के महासचिव श्री पी. ए. विवेकानंद पाई ने की। उन्होंने गणित के क्षेत्र में भारत के मौलिक योगदानों की जानकारी दी—विशेष रूप से 'केरल स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स' और कैलकुलस पर माधव के कार्यों का उल्लेख किया। इसके साथ ही, उन्होंने 'पंचमहाभूत' और 'पंचीकरण' जैसी मूलभूत वैज्ञानिक अवधारणाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने औपनिवेशिक और मानव-केंद्रित सोच से बाहर निकलने और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं तथा स्थिरता को मजबूत करने के लिए स्वदेशी तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने पर बल दिया।

कोलकाता स्थित साइंस सिटी के निदेशक डॉ. प्रमोद ग्रोवर ने विज्ञान संचार में 'नेशनल काउंसिल ऑफ साइंस म्यूजियम' (एनसीएसएम) की भूमिका पर बल दिया, जो इंटरैक्टिव प्रदर्शनियों और शिक्षकों के प्रशिक्षण के माध्यम से काम करती है। उन्होंने एनसीएसएम और स्वास्तिक (SVASTIK) के बीच सहयोग स्थापित करने का सुझाव दिया, ताकि 'पारंपरिक ज्ञान केंद्र' बनाया जा सके। इसका उद्देश्य ग्रामीण समुदायों तक विज्ञान की पहुंच बढ़ाना और आम जनता की समझ को बेहतर बनाना है। बेंगलुरु स्थित 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज' के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वी. वी. बिनॉय ने विज्ञान संचार के संदर्भ-आधारित और सहभागी मॉडलों पर बात की। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान रखने वालों के साथ सक्रिय जुड़ाव की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विज्ञान की कक्षाओं में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने और एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) जैसे आधुनिक क्षेत्रों में भारत के ऐतिहासिक वैज्ञानिक योगदानों की खोज करने का सुझाव दिया।

सम्मेलन के अंतिम वैज्ञानिक सत्र का शीर्षक “सतत नवाचार और विकास: सामाजिक शोधकर्ताओं और पारंपरिक ज्ञान धारकों से अनुभवात्मक सीख” था, इसकी अध्यक्षता गांधीनगर स्थित 'नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन' के निदेशक डॉ. अरविंद सी. रानाडे ने की। इस अवसर पर संबोधन में उन्होंने सतत नवाचार के तीन मुख्य स्तंभ बताए: पर्यावरणीय स्थिरता, आर्थिक व्यवहार्यता, और पारंपरिक ज्ञान धारकों के साथ लाभ का उचित बंटवारा। 'योजक' (YOJAK) के संस्थापक और अध्यक्ष डॉ. गजानन डांगे ने बताया कि कैसे भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां जैव विविधता और नस्ल संरक्षण, टिकाऊ कृषि, तथा स्थानीय पारिस्थितिक प्रथाओं के प्रति समग्र दृष्टिकोण को बढ़ावा देती हैं। जोरहाट, असम के पारंपरिक हर्बल विशेषज्ञ श्री कृष्ण नाथ ने असम में पारंपरिक उपचार पद्धतियों की समृद्ध विरासत के बारे में बात की। उन्होंने औषधीय पौधों और उपचारों से जुड़े उस स्वदेशी ज्ञान का जिक्र किया, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।

पद्म श्री से सम्मानित किसान और बीज संरक्षक, श्रीमती राहीबाई सोमा पोपेरे का विशेष संबोधन

 

महाराष्ट्र की किसान और बीज संरक्षक, पद्म श्री श्रीमती राहीबाई सोमा पोपेरे ने पारंपरिक बीजों के संरक्षण और खेती के पारंपरिक तरीकों को पुनर्जीवित करने की अपनी प्रेरणादायक यात्रा साझा की। उन्होंने स्थानीय बीजों को बचाने, मिट्टी के स्वास्थ्य को बहाल करने और रसायन-मुक्त खेती की ओर बढ़ने के महत्व पर बल दिया। पारंपरिक ज्ञान के मूल्य पर बल देते हुए, उन्होंने प्रकृति-आधारित खेती की ओर लौटने का आह्वान किया, ताकि हर घर तक बिना जहर वाली सब्जियां और सुरक्षित, पौष्टिक भोजन पहुंच सके। इससे स्वस्थ और अधिक टिकाऊ भविष्य का मार्ग प्रशस्त होगा। दो दिवसीय इस सम्मेलन में देश-विदेश के प्रतिभागियों द्वारा 40 मौखिक और 60 पोस्टर प्रस्तुतियां दी गईं।

समापन सत्र में सीडीटीके-2026 के अध्यक्ष डॉ. नरेश कुमार ने स्वागत भाषण दिया। सीएसआईआर- एनआईएससीपीआर  की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने समापन वक्तव्य देते हुए पारंपरिक ज्ञान के क्षेत्र में नैतिक जुड़ाव, समुदाय को संवेदनशील बनाने, दस्तावेजीकरण और लाभ-साझाकरण (बेनिफिट-शेयरिंग) के महत्व पर बल दिया। आईआईटी बॉम्बे के पूर्व वरिष्ठ प्रोफेसर, प्रो. बी. एन. जगताप ने भारतीय ज्ञान प्रणालियों को औपचारिक रूप देने, भारत के मौलिक वैज्ञानिक योगदानों को प्रदर्शित करने और विभिन्न प्रकार के साक्ष्यों को शामिल करने के महत्व पर बल दिया। गणमान्य व्यक्तियों ने 'बेस्ट पोस्टर प्रेजेंटेशन' पुरस्कार भी प्रदान किए। सीडीटीके-2026 की आयोजन सचिव डॉ. चारु लता ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस सम्मेलन ने पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन में वैज्ञानिक सत्यापन, नैतिक प्रसार और सामुदायिक भागीदारी के महत्व पर फिर से बल दिया।

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पीके/केसी/आरटी/पीके


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