जनजातीय कार्य मंत्रालय
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वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर तीसरा क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन श्रीनगर में आयोजित हुआ


सात राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने लंबित दावों, वन अधिकारों की मान्यता, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों और आजीविका संबंधी योजनाओं के समन्वय की समीक्षा की; समयबद्ध कार्य योजनाओं पर जोर दिया गया

प्रविष्टि तिथि: 23 OCT 2026 8:43PM by PIB Delhi

भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) ने आज जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (एफआरए) के कार्यान्वयन पर तीसरे क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन का आयोजन किया। महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गोवा, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ अधिकारियों ने कार्यान्वयन की प्रगति की समीक्षा की, चुनौतियों पर चर्चा की और प्राथमिकता वाली कार्रवाइयों की पहचान की। इस सम्मेलन के साथ क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलनों की श्रृंखला संपन्न हुई। इससे पहले, पहला सम्मेलन 10 सितंबर, 2026 को बेंगलुरु में और दूसरा सम्मेलन 9 अक्टूबर, 2026 को कोलकाता में आयोजित किया गया था।

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जम्मू और कश्मीर सरकार के जनजातीय कार्य विभाग के निदेशक श्री मोहम्मद मुमताज अली ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने क्षेत्र के दुर्गम इलाके, बिखरी हुई बस्तियों और मौसमी चरवाहा गतिविधियों पर प्रकाश डाला, तथा स्थानीय रूप से उपयुक्त प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया।

जम्मू-कश्मीर सरकार में जनजातीय कार्य, जल शक्ति तथा वन, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण मंत्री, माननीय श्री जावेद अहमद राणा ने इस बात पर जोर दिया कि वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) वन-आश्रित समुदायों की गरिमा, आजीविका और भविष्य की रक्षा करता है। उन्होंने दावों का पारदर्शी एवं समयबद्ध निपटान सुनिश्चित करने, विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने और ग्राम सभाओं की भागीदारी बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वन अधिकारों की मान्यता, वन संरक्षण और सतत विकास को साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए।

अपने मुख्य संबोधन में, जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री अनंत प्रकाश पांडे ने बताया कि 31 अगस्त, 2026 तक देशभर में लगभग 54 लाख दावे प्राप्त हुए थे, जिनमें से 43.56 लाख (80.64 प्रतिशत) दावों का निपटारा किया जा चुका था। लगभग 238 लाख एकड़ भूमि पर 25.42 लाख अधिकार-पत्र वितरित किए गए थे, जबकि 10.45 लाख दावे लंबित थे और 18.13 लाख दावे खारिज किए जा चुके थे। उन्होंने जोर दिया कि प्रत्येक खारिज किए गए दावे के लिए तर्कसंगत आदेश होना चाहिए और इसकी सूचना दावेदार को दी जानी चाहिए। साथ ही, अपील करने के वैधानिक अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। उन्होंने राज्यों से लंबित दावों के शीघ्र निपटान और खारिज किए गए मामलों की समीक्षा के लिए जिला-वार कार्ययोजनाएं तैयार करने का आग्रह किया, विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा और हिमाचल प्रदेश में इस दिशा में तेजी लाने पर जोर दिया गया।

सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों (सीएफआरआर) पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने इनके सतत प्रबंधन तथा सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं का वन विभाग की कार्ययोजनाओं के साथ समन्वय करने का आह्वान किया। यह कार्य जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 27 जुलाई, 2026 को जारी संयुक्त संचार के माध्यम से संभव बनाया गया है। मान्यता प्राप्त अधिकारों को राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने से पीएम-किसान तथा कृषि, मत्स्य पालन और आजीविका संबंधी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में सुविधा हो सकती है। उन्होंने राज्यों से विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के आवास अधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया में तेजी लाने का भी आग्रह किया। उन्होंने बताया कि देश के कुल 75 विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में से अब तक सिर्फ 11 के आवास अधिकारों को मान्यता दी गई है। अन्य प्राथमिकताओं में राज्य स्तरीय निगरानी समितियों की तिमाही बैठकें आयोजित करना, मासिक प्रगति रिपोर्ट नियमित रूप से प्रस्तुत करना, एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस के माध्यम से राज्य के वन अधिकार अधिनियम संबंधी अभिलेखों को राष्ट्रीय एफआरए पोर्टल के साथ एकीकृत करना तथा जागरूकता और क्षमता निर्माण के लिए आईगॉ(iGOT) पर उपलब्ध निःशुल्क एफआरए पाठ्यक्रमों का उपयोग करना शामिल था।

जनजातीय कार्य मंत्रालय की निदेशक(एफआरए) श्रीमती समिधा सिंह ने वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत मानचित्रण के लिए जनजातीय अनुसंधान संस्थानों को सहायता योजना के तहत प्रत्येक राज्य को 25 लाख रुपये की वित्तीय सहायता तथा डीए-जेजीयूए के अंतर्गत प्रत्येक सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजना के लिए 15 लाख रुपये और तकनीकी सहायता हेतु 1 लाख रुपये की सहायता का विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने 5 जनवरी, 2026 को जारी मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के तहत विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के आवास अधिकारों के लिए उपलब्ध सहायता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने राज्यों से आंकड़ों में विसंगतियों को दूर करने, ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने, जागरूकता बढ़ाने, दावों के निपटारे के बाद सहायता उपलब्ध कराने तथा सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने और लागू करने में सुविधा प्रदान करने का आग्रह किया।

राज्य-वार प्रगति

महाराष्ट्र: राज्य ने 3,90,397 व्यक्तिगत और 10,740 सामुदायिक दावों के मुकाबले 2,03,510 व्यक्तिगत और 8,821 सामुदायिक पट्टे वितरित किए हैं; सामुदायिक वन अधिकार लगभग 13.87 लाख एकड़ क्षेत्र को कवर करते हैं, जिसके तहत 7,518 सीएफआर समितियों का गठन किया गया है और 1,875 प्रबंधन योजनाएं तैयार की गई हैं। 10 जुलाई 2026 के एक सरकारी प्रस्ताव में व्यक्तिगत वन अधिकार धारकों के लिए अलग से 'गांव फॉर्म 7-ई' और '12-ई' प्रदान किए गए हैं, जो फसल ऋण, किसान क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) की सुविधा प्रदान करते हैं; जलगांव, ठाणे और नासिक की सफलता की कहानियों ने कृषि आय और जल सुरक्षा में हुए सुधारों पर प्रकाश डाला।

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गढ़चिरौली, महाराष्ट्र: जिले में 5.56 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को कवर करते हुए कुल 34,813 अधिकार-पत्र वितरित किए गए हैं, जिनमें 33,361 व्यक्तिगत और 1,452 सामुदायिक अधिकार-पत्र शामिल हैं। इनमें से 5.16 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सामुदायिक वन संसाधन(सीएफआर) अधिकारों के अंतर्गत आता है। जिले में 1,138 सीएफआर ग्राम सभाओं के लिए 1,442 सीएफआर समितियों का गठन किया गया है और 391 प्रबंधन योजनाओं को मंजूरी दी गई है। जिले में 32,601 व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर) अधिकार-पत्रों को 7/12 राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया गया है। इसके अतिरिक्त, 99.6 प्रतिशत प्रकरण फाइलों को स्कैन किया गया है और गोंडवाना विश्वविद्यालय के सहयोग से परियोजना एकल के माध्यम से ग्राम सभाओं के 3,630 प्रतिनिधियों को प्रशिक्षित किया गया है। हैदराबाद स्थित आईएसबी द्वारा किए गए मानचित्रण में गैर-काष्ठ वन उपज (एनटीएफपी) की वार्षिक संभावित आर्थिक क्षमता 98 करोड़ रुपये आंकी गई है। प्रस्तावों में सीएफआर के लिए एक समर्पित बजट का प्रावधान, समितियों के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना, गैर-काष्ठ वन उपज की बिक्री के लिए एक ऑनलाइन मंच विकसित करना तथा वन विभाग की कार्ययोजनाओं का सीएफआर प्रबंधन योजनाओं के साथ समन्वय करना शामिल है।

गुजरात: राज्य में 1,83,055 व्यक्तिगत और 6,274 सामुदायिक दावों के मुकाबले 1,00,747 व्यक्तिगत तथा 3,879 सामुदायिक अधिकार-पत्र वितरित किए गए हैं। सामुदायिक वन संसाधन अधिकार लगभग 10.18 लाख एकड़ क्षेत्र में फैले हैं। जीईईआर फाउंडेशन के सहयोग से उपग्रह आधारित सत्यापन तथा राज्य द्वारा प्रायोजित वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) प्रकोष्ठों के माध्यम से दाहोद, साबरकांठा, पंचमहल, महीसागर और छोटा उदयपुर जिलों में लंबित मामलों के निपटान की दिशा में कार्य किया जा रहा है। राज्य में चिह्नित विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में कोटवालिया, कोलघा, कठोड़ी, सिद्दी और पाधर शामिल हैं। राज्य जनजातीय कार्य मंत्रालय को आवास अधिकार कार्ययोजना प्रस्तुत करेगा। 

जम्मू-कश्मीर: प्राप्त 48,287 दावों में से जिला स्तरीय समितियों(डीएलसी) द्वारा 6,191 दावों को मंजूरी दी गई है और लगभग 3,960 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हुए 6,178 अधिकार-पत्र वितरित किए गए हैं। इनमें मुख्य रूप से सामुदायिक अधिकार शामिल हैं। केंद्र शासित प्रदेश में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय निगरानी समिति (SLMC) गठित है तथा सभी 20 जिलों में जिला स्तरीय समितियां(डीएलसी) कार्यरत हैं। 30 जुलाई, 2026 को जारी एक परिपत्र में निर्देश दिया गया है कि पात्र अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी परिवारों को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी होने से पहले बेदखल न किया जाए। केंद्र शासित प्रदेश ने जिला विकास परिषदों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उप-मंडल स्तरीय समितियों और जिला स्तरीय समितियों के गैर-सरकारी सदस्यों की निरंतरता, ग्राम सभा के लिए आवश्यक कोरम, साक्ष्य के रूप में उपग्रह चित्रों के उपयोग, खारिज किए गए दावों की समीक्षा के लिए एकमुश्त अवसर तथा जागरूकता और क्षमता निर्माण के लिए धनराशि उपलब्ध कराने के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा।

हिमाचल प्रदेश: मार्च 2026 तक राज्य में 6,546 व्यक्तिगत और 791 सामुदायिक दावों के मुकाबले 1,144 व्यक्तिगत तथा 166 सामुदायिक अधिकार-पत्र प्रदान किए गए थे। सामुदायिक अधिकार 27,624 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हैं, जो मुख्य रूप से चंबा और किन्नौर जिलों में स्थित हैं। सामुदायिक अधिकार-पत्रों को राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने के निर्देश अप्रैल 2022 में तथा व्यक्तिगत अधिकार-पत्रों के लिए ऐसे निर्देश फरवरी 2026 में जारी किए गए थे। राज्य ने अप्रैल 2025 में वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) कैलेंडर शुरू किया, कार्यशालाएं आयोजित कीं और राज्य स्तरीय निगरानी समिति (एसएलएमसी) की तीन बैठकें कीं। मई 2026 में हुए पंचायत चुनावों के बाद समितियों के पुनर्गठन के पश्चात जिला स्तरीय समितियों और उप-मंडल स्तरीय समितियों की महीने में कम-से-कम तीन बार बैठकें आयोजित करने की योजना है।

उत्तर प्रदेश: राज्य में 92,972 व्यक्तिगत और 1,194 सामुदायिक दावों के मुकाबले 22,537 व्यक्तिगत तथा 893 सामुदायिक अधिकार-पत्र वितरित किए गए हैं। इनमें से 14,339 अधिकार-पत्रों को अभिलेखों में दर्ज किया जा चुका है। यह विशेष रूप से सोनभद्र और चंदौली में खारिज किए गए दावों की समीक्षा कर रहा है, इसने शेष जिलों में रिकॉर्ड प्रविष्टि/दर्ज करने की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 30 जनवरी 2027 की समयसीमा तय की है, और बिजनौर में बुक्सा (Buxa) पीवीटीजी की पहचान की है तथा इसके अतिरिक्त, बिजनौर जिले में बुक्सा पीवीटीजी की पहचान की गई है।

गोवा: राज्य में 9,983 व्यक्तिगत और 401 सामुदायिक दावों के मुकाबले 3,908 व्यक्तिगत तथा 29 सामुदायिक अधिकार-पत्र वितरित किए गए हैं। राज्य ने 25 मई, 2026 को अपना वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) एटलस शुरू किया। सर्वेक्षण और सीमांकन के लिए एक निजी एजेंसी को नियुक्त किया गया है। छह तालुकों में संयुक्त मामलातदारों के अधीन विशेष समितियों का गठन किया गया है तथा वन अधिकार समितियों (एफआरसी) के सदस्यों को स्थल पर सत्यापन करने के लिए भत्ता प्रदान किया गया है। अधिकार-पत्रों के वितरण के बाद राजस्व अभिलेखों को स्वतः अद्यतन किया जाता है। जिला स्तरीय समितियों (डीएलसी) की बैठकें प्रत्येक पखवाड़े और उप-मंडल स्तरीय समितियों (एसडीएलसी) की बैठकें साप्ताहिक रूप से आयोजित की जाती हैं।

राजस्थान: 30 सितंबर, 2026 तक राज्य में 1,21,707 व्यक्तिगत और 5,433 सामुदायिक दावों के मुकाबले 49,383 व्यक्तिगत तथा 2,531 सामुदायिक अधिकार-पत्र वितरित किए जा चुके थे। इनमें से 40,045 अधिकार-पत्रों को राजस्व एवं वन अभिलेखों में दर्ज किया जा चुका है, जबकि 11,869 अधिकार-पत्रों को अभिलेखों में दर्ज करने की प्रक्रिया अभी लंबित है।

आगे की कार्ययोजना

जनजातीय कार्य मंत्रालय(एमओटीए) ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आह्वान किया कि वे जिला-वार कार्ययोजनाएं तैयार करें, जिनमें प्रत्येक लंबित दावे में देरी के चरण और कारण तथा इसके लिए जिम्मेदार प्राधिकारी की पहचान की जाए। खारिज किए गए दावों की लिखित कारणों सहित समीक्षा की जाए और याचिका दायर करने के अधिकार को सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, समन्वित मासिक प्रगति रिपोर्ट नियमित रूप से प्रस्तुत की जाए तथा 24 जून, 2026 की परामर्शिका के अनुरूप मान्यता प्राप्त अधिकारों का डिजिटलीकरण और उन्हें राजस्व एवं वन अभिलेखों में दर्ज करने का कार्य पूरा किया जाए। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश से विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों(पीवीटीजी) के लिए समूह-वार आवास अधिकार संबंधी कार्ययोजनाएं तैयार करने, आजीविका एवं कल्याणकारी योजनाओं के साथ समन्वय को सुदृढ़ बनाने तथा क्षमता निर्माण की कार्ययोजनाएं तैयार करने के लिए भी कहा गया। इसके अतिरिक्त, मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य स्तरीय निगरानी समितियों(एसएलएमसी) के माध्यम से प्रत्येक तिमाही में प्रगति की समीक्षा करने पर विशेष जोर दिया गया।

सम्मेलन का समापन जनजातीय कार्य मंत्रालय(एमओटीए) के संयुक्त सचिव के समापन संबोधन के साथ हुआ, इसके बाद जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के जनजातीय अनुसंधान संस्थान के उप-निदेशक ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

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पीके/केसी/आरटी/पीकेपी/


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