राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत ने अपने 33वें स्थापना दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में 'जीवन के अमृत के रूप में जल: जल के अधिकार से मानव गरिमा को बढ़ावा' विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया
एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने तुरंत कार्रवाई की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को बचाकर रखना हमारी वर्तमान पीढ़ी की नैतिक जिम्मेदारी है
सम्मेलन में जल सुरक्षा, संरक्षण और इसके सतत प्रबंधन से जुड़े मानव अधिकारों के विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श किया गया
प्रविष्टि तिथि:
12 OCT 2026 7:12PM by PIB Delhi
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत ने अपने 33वें स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर आज नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 'जीवन के अमृत के रूप में जल: जल के अधिकार से मानव गरिमा को बढ़ावा' विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में सरकारी संस्थाओं, विकास संगठनों और अन्य हितधारकों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और सुरक्षित पेयजल तक पहुँच, जल संसाधनों के सतत प्रबंधन, जल निकायों के पुनरुद्धार, सामुदायिक भागीदारी तथा जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत तंत्र को मजबूत करने से जुड़े मानव अधिकार के विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श किया।

'जल संरक्षण, स्थिरता और सामुदायिक भागीदारी' विषय पर आयोजित पहले सत्र को संबोधित करते हुए जल शक्ति मंत्रालय के राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के कार्यकारी निदेशक (परियोजनाएं) श्री बृजेंद्र स्वरूप ने जोर देकर कहा कि पर्याप्त, सुरक्षित और किफायती जल तक बिना किसी भेदभाव के पहुंच मानव गरिमा का मूल आधार है। नमामि गंगे कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए उन्होंने एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन दृष्टिकोण और 'निर्मल धारा' (प्रदूषण मुक्त प्रवाह), 'अविरल धारा' (निरंतर प्रवाह) को सुनिश्चित करने के साथ-साथ गंगा के भूगर्भीय और पारिस्थितिक संतुलन की सुरक्षा के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि लगभग 43,326 करोड़ रुपये की स्वीकृत लागत वाली 527 परियोजनाओं से लैस यह कार्यक्रम प्रदूषण नियंत्रण, पर्यावरण संतुलन की बहाली, जैव विविधता संरक्षण, सामुदायिक भागीदारी, अनुसंधान और आजीविका संवर्धन पर केंद्रित है।
उन्होंने व्यापक अपशिष्ट जल प्रबंधन, पारिस्थितिक प्रवाह को बनाए रखने, बाढ़ के मैदानों की सुरक्षा, आर्द्रभूमि के पुनरुद्धार और जैव विविधता संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। गंगा के कई हिस्सों में पानी की गुणवत्ता में हुए सुधार का जिक्र करते हुए उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि पुनरुद्धार के प्रयासों की सफलता का मूल्यांकन केवल खर्च हुई राशि या पूरी हो चुकी परियोजनाओं की संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि पानी की गुणवत्ता, जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र के कामकाज जैसे पर्यावरणीय परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने जल निकायों की वैज्ञानिक मैपिंग, जलग्रहण क्षेत्र आधारित योजना, संस्थागत तालमेल और सामुदायिक भागीदारी पर जोर देते हुए कहा कि बहाली से पहले संरक्षण का होना आवश्यक है।

नीति आयोग के कार्यक्रम निदेशक श्री युगल किशोर जोशी ने भारत में जल सुरक्षा की चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी वाले भारत के पास ताजे जल के वैश्विक संसाधनों का मात्र 4 प्रतिशत हिस्सा ही उपलब्ध है। देश में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता घटकर लगभग 1,300 से 1,400 घन मीटर रह गई है, जो पानी की कमी की सीमा (1,700 क्यूबिक मीटर) से भी कम है। उन्होंने जल संचयन की पारंपरिक पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों के साथ जोड़ने, ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने, जल बजट तैयार करने और जल स्रोतों पर अतिक्रमण की समस्या से निपटने पर विशेष बल दिया।
लगभग 800 गाँवों को कवर करने वाली एक सामुदायिक-नेतृत्व वाली पहल का उदाहरण देते हुए, जिसमें लगभग 3 लाख रुपये प्रति जल निकाय की लागत से 731 गाँवों में जल निकायों का पुनरुद्धार पूरा किया गया था, उन्होंने सामुदायिक श्रम (श्रमदान) और निकाली गई गाद के उपयोगी इस्तेमाल के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने मजबूत स्थानीय संस्थाओं, बेहतर निगरानी और सफल संरक्षण पहलों को बड़े पैमाने पर लागू करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
एस एम सहगल फाउंडेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी और ट्रस्टी सुश्री अंजलि मखीजा ने जल और कृषि संबंधी चुनौतियों से निपटने में समुदायों, सरकार, विकास संगठनों, शिक्षण संस्थानों और अन्य हितधारकों के बीच आपसी सहयोग के महत्व पर बल दिया। उन्होंने ग्राउंडवाटर रिचार्ज, सतही जल के अतिरिक्त भंडारण, स्कूलों में वर्षा जल संचयन, जल की गुणवत्ता और जलवायु-अनुकूल एवं जल-कुशल कृषि पहलों—जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई तथा लेजर लैंड लेवलिंग—पर फाउंडेशन द्वारा किए जा रहे कार्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की।
उन्होंने प्राथमिकताओं की पहचान करने, संसाधनों में योगदान देने और जल संरचनाओं के रखरखाव में महिला समूहों तथा ग्राम विकास समितियों की भूमिका पर जोर दिया। स्थानीय और जिला प्रशासन के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने जीआईएस मैपिंग, मृदा-नमी एवं जल-गुणवत्ता की निगरानी और तीसरे पक्ष के मूल्यांकन के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक विशेषज्ञता के साथ जोड़ने की वकालत की। इसके साथ ही, उन्होंने सस्ती और सुलभ तकनीक, जल एवं कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व व धर्मार्थ (फिलैंथ्रॉपिक) निवेश को बढ़ावा देने और एक वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किए गए वाटर-क्रेडिट सिस्टम को विकसित करने का आह्वान भी किया।
तरुण भारत संघ के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि जल के अपने अधिकार हैं और नदियों का निर्मल (शुद्ध) तथा अविरल (बिना रुकावट के बहती हुई) बने रहना बेहद जरूरी है, ताकि मानव के जल के अधिकार के साथ-साथ नदियों के पारिस्थितिक संतुलन की भी रक्षा की जा सके। भारत की प्राकृतिक संपदा और उसमें आई गिरावट पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने सामुदायिक भागीदारी, जल संरक्षण के पारंपरिक तरीकों और पर्यावरण सुधार के माध्यम से 23 नदियों को पुनर्जीवित करने के अपने अनुभवों को साझा किया।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जल का अधिकार, नदियों और उनके प्राकृतिक इकोसिस्टम की रक्षा करने की जिम्मेदारी के साथ जुड़ा होना चाहिए। ज्ञान और जनजागरूकता को जमीनी स्तर पर सार्थक पर्यावरणीय कार्यों में बदलने की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, नदियों के पुनरुद्धार और आने वाली पीढ़ियों के लिए इकोलॉजिकल संतुलन को बनाए रखने के लिए पारंपरिक ज्ञान और समझ का सहारा लेने का आह्वान किया।

'पेयजल सेवाओं और स्थानीय शासन को मजबूत करना' विषय पर आयोजित दूसरे सत्र को संबोधित करते हुए जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग के सचिव श्री अशोक के. के. मीणा ने जोर देकर कहा कि सुरक्षित पेयजल मानव गरिमा, जनस्वास्थ्य और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन के अधिकार का एक अभिन्न अंग है।
वर्ष 2019 में शुरू किए गए जल जीवन मिशन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि तय लक्ष्य के अनुसार लगभग 82 प्रतिशत नल-जल कनेक्शन का बुनियादी ढांचा तैयार किया जा चुका है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि देश के लगभग 25 प्रतिशत ब्लॉक भूजल के लिहाज से गंभीर, अर्ध-गंभीर या अत्यधिक दोहन वाली श्रेणियों में आते हैं। इसके साथ ही, उन्होंने बताया कि जहाँ धरातलीय जल (सतही जल) पर आधारित योजनाओं का दायरा 15 प्रतिशत से बढ़कर 48 प्रतिशत हो गया है, वहीं भूजल पर निर्भर योजनाओं की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत से घटकर 52 प्रतिशत रह गई है।
उन्होंने ग्राम स्तर पर जल बजट तैयार करने, जल स्रोतों को सतत बनाने, डिजिटल निगरानी तथा ग्राम पंचायतों और ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों को अधिक सशक्त बनाने का आह्वान किया। जल-गुणवत्ता की निगरानी पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि लगभग 24 लाख महिलाओं को फ़ील्ड-टेस्टिंग किट के उपयोग और सुधारात्मक कदमों के लिए डेटा अपलोड करने का प्रशिक्षण दिया गया है। उन्होंने अंतर-विभागीय तालमेल पर जोर दिया और 'जल जीवन मिशन 2.0' के तहत दिसंबर 2028 तक बुनियादी ढाँचे को पूरा करने का उल्लेख किया, जिससे सुरक्षित, विश्वसनीय और सतत पेयजल सेवाएं सुनिश्चित की जा सकें।

प्रख्यात समाजसेवी, किसान और भूजल संरक्षणविद् श्री उमाशंकर पांडे ने सभी हितधारकों के सामूहिक प्रयासों से जल संरक्षण के अत्यधिक महत्व पर बल दिया। उन्होंने जल के व्यवसायीकरण और इसकी बर्बादी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सुरक्षित पेयजल तक पहुँच सुनिश्चित करना सरकार और समाज की साझी जिम्मेदारी है। उन्होंने जल साक्षरता, सामुदायिक भागीदारी और जल प्रबंधन की पारंपरिक पद्धतियों को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। जंगल की आग बुझाने की कोशिश करने वाली एक छोटी सी चिड़िया का उदाहरण देते हुए उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर किए जाने वाले योगदान के महत्व को रेखांकित किया। जागरूकता फैलाने पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि नए भारत का निर्माण व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी के साथ ही शुरू होना चाहिए। उन्होंने अपने चर्चित नारे "खेत में मेड़, मेड़ पर पेड़" को दोहराते हुए जल संरक्षण के एक सतत उपाय के रूप में खेतों की मेड़ों पर वृक्षारोपण की वकालत की।
वाटर एड इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री आनंद शेखर ने जल को एक मौलिक मानव अधिकार के रूप में रेखांकित करने के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत के इस प्रयास की सराहना की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नल से जल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हर घरेलू नल के पीछे एक सतत और सुरक्षित जल स्रोत का होना अनिवार्य है। वर्ष 2014 में भारत में स्वच्छता का दायरा 20 प्रतिशत से भी कम होने का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि सुदृढ़ राजनीतिक नेतृत्व, सार्वजनिक निवेश और जन-भागीदारी के बल पर महज पांच वर्षों के भीतर खुले में शौच की प्रथा को समाप्त किया गया और सभी ग्रामीण परिवारों तक सतत स्वच्छता सेवाएं पहुंचाई गईं।
उन्होंने बताया कि अब लगभग 86 प्रतिशत घरों में कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन के माध्यम से पेयजल सेवाओं की पहुँच हो गई है। उन्होंने ग्राम पंचायतों को उपलब्ध कराए गए लगभग 8.0 लाख करोड़ रुपये के आवंटन से मिले अवसर पर भी प्रकाश डाला, जिसमें से 50 प्रतिशत राशि विशेष रूप से जल और स्वच्छता के लिए निर्धारित की गई है, जिससे देश की लगभग 2.5 लाख ग्राम पंचायतें अपनी सेवा वितरण प्रणाली को और मजबूत करने में सक्षम हुई हैं। जल जीवन मिशन के तहत जल स्रोतों की स्थिरता पर जोर देते हुए उन्होंने राजनीतिक और प्रशासनिक स्वामित्व, पर्याप्त सार्वजनिक वित्तपोषण, अंतर-मंत्रालयी समन्वय, बहु-हितधारक साझेदारियों और बड़े पैमाने पर सामुदायिक एकजुटता की वकालत की। उन्होंने रेखांकित किया कि लक्ष्य केवल बुनियादी ढांचा खड़ा करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विश्वसनीय, गुणवत्तापूर्ण और सतत पेयजल सेवाओं के माध्यम से 'हर किसी के लिए और हमेशा के लिए पानी' सुनिश्चित करना होना चाहिए।
समापन सत्र में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया और जीवन के भरण-पोषण तथा पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में 'पंचभूत' यानी प्रकृति के पांच तत्वों के महत्व पर प्रकाश डाला। जल के गुणों और विशेषताओं पर विचार करते हुए उन्होंने पैनल के सदस्यों द्वारा वकालत किए गए जल संरक्षण के सहयोगात्मक दृष्टिकोण की सराहना की और सामूहिक प्रयासों तथा हितधारकों की भागीदारी पर जोर दिया। उन्होंने समाज में श्रद्धा और आचरण के बीच के विरोधाभास को रेखांकित करते हुए कहा कि समाज अक्सर उन चीज़ों की रक्षा करने में विफल रहता है जिनकी वह पूजा या आदर करता है—उदाहरण के तौर पर उन्होंने महिलाओं और जल का उल्लेख किया। उन्होंने इस अंतर को पाटने के लिए जिम्मेदार आचरण और निरंतर संरक्षण प्रयासों का आह्वान किया।

अध्यक्ष महोदय ने इस बात पर जोर दिया कि संरक्षण के प्रयास बिना किसी देरी के तुरंत शुरू होने चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि वर्तमान पीढ़ी को अपने पूर्वजों के प्रयासों और बलिदानों का लाभ मिला है, इसलिए उसका यह कर्तव्य है कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करे। उन्होंने व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयासों के सम्मिलित प्रभाव को रेखांकित करते हुए इस बात पर बल दिया कि संरक्षण पहलों के परिणाम सामने आने में भले ही दशकों लग जाएं, लेकिन इसके लिए एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। उन्होंने वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए जल संसाधनों की सुरक्षा हेतु समय पर, निरंतर और सहयोगात्मक कार्रवाई का आह्वान किया।
एनएचआरसी के महासचिव श्री पीयूष गोयल ने दोनों विषयगत सत्रों की चर्चाओं का सार प्रस्तुत किया। उन्होंने ग्राम पंचायतों, ग्राम स्तरीय जल एवं स्वच्छता समितियों, महिला समूहों और नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) को शामिल करते हुए विकेंद्रीकृत और सामुदायिक-नेतृत्व वाले शासन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन तथा गंभीर भूजल संकट से निपटने की तात्कालिकता पर जोर दिया। उन्होंने रेखांकित किया कि यद्यपि जमीनी स्तर पर अभी भी व्यापक कार्य किया जाना बाकी है, लेकिन सरकारी एजेंसियों, नागरिक समाज और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर समन्वय एक सकारात्मक और सतत राह बनाने में मदद करेगा।

एनएचआरसी, भारत के संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, भारत के मुख्य न्यायाधीश के प्रति निमंत्रण स्वीकार करने और अपने विचार साझा करने के लिए गहरा आभार व्यक्त किया।

उन्होंने मार्गदर्शन और नेतृत्व के लिए एनएचआरसी के अध्यक्ष एवं सदस्यों का तथा बहुमूल्य योगदान के लिए विभिन्न मंत्रालयों, सरकारी विभागों, नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों और अन्य प्रतिभागियों का भी धन्यवाद व्यक्त किया। उन्होंने सम्मेलन के आयोजन में शामिल सभी लोगों के प्रयासों की सराहना की और मानव अधिकारों के प्रचार-प्रसार व संरक्षण के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता को दोहराया।
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(रिलीज़ आईडी: 2322525)
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