रक्षा मंत्रालय
रक्षा मंत्री और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ने कोलकाता से वर्चुअल माध्यम से जीआरएसई और वाईआईएल की पांच विस्तार परियोजनाओं के लिए भूमि पूजन किया
लगभग 3,500 करोड़ रुपये की लागत वाली ये परियोजनाएं देश की जहाज निर्माण, जहाज मरम्मत, धातुकर्म और उत्पादन क्षमताओं को मजबूत करेंगी जिससे 'आत्मनिर्भर भारत', 'मेक इन इंडिया' और 'मेक फॉर द वर्ल्ड' को गति मिलेगी
इन परियोजनाओं से रोजगार सृजन होगा और एमएसएमई सहित सहायक उद्योगों के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे
"आत्मनिर्भरता केवल एक नीति नहीं है; यह युद्धक्षेत्र में क्षमता बढ़ाने वाला एक कारक है": श्री राजनाथ सिंह
"उभरता 'क्षमता विरोधाभास' भारत के वैश्विक जहाज निर्माण केंद्र के रूप में उभरने का सुनहरा अवसर है"
प्रविष्टि तिथि:
23 AUG 2026 3:59PM by PIB Delhi
रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री श्री सुवेंदु अधिकारी ने 23 अगस्त, 2026 को कोलकाता स्थित जीआरएसई भवन से वर्चुअल माध्यम से गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसई) की तीन और यंत्र इंडिया लिमिटेड (वाईआईएल) की दो विस्तार परियोजनाओं के भूमि पूजन समारोह की अध्यक्षता की। इन परियोजनाओं में कुल मिलाकर लगभग 3,500 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। कोलकाता के किद्दरपोर, हावड़ा के शालीमार और दक्षिण 24 परगना के रायचक स्थित जीआरएसई सुविधाएं देश की जहाज निर्माण और जहाज मरम्मत क्षमताओं को मजबूत करेंगे जबकि ईशापुर स्थित वाईआईएल के धातु एवं इस्पात कारखाने की परियोजनाएं स्वदेशी धातुकर्म और उत्पादन क्षमताओं को मजबूत करेगी।

रक्षा मंत्री ने अपने संबोधन में विश्वास व्यक्त किया कि ये परियोजनाएं रक्षा क्षेत्र में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की 'आत्मनिर्भरता', 'मेक इन इंडिया' और 'मेक फॉर द वर्ल्ड' की भावना को और मजबूत करेंगी। उन्होंने कहा, “'रक्षा शक्ति' उन 'सप्तधाराओं' में से एक है जिनका उल्लेख प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से 2026 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में किया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि जैसे-जैसे हम एक विकसित राष्ट्र बनते जा रहे हैं, रक्षा क्षेत्र को पूरी तरह आत्मनिर्भर बनना होगा। हम किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रह सकते। हमारी अपनी कंपनियों और अनुसंधान संस्थानों को ही इस क्षेत्र में पूर्ण प्रभुत्व स्थापित करना होगा। ये पांच परियोजनाएं रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के सरकार के दृष्टिकोण को दर्शाती हैं।”
श्री राजनाथ सिंह ने आगे कहा कि इन परियोजनाओं से न केवल रक्षा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि हजारों लोगों के साथ-साथ एमएसएमई और संबद्ध उद्योगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। उन्होंने कहा, "एक तरह से, ये परियोजनाएं पश्चिम बंगाल की सामाजिक-आर्थिक प्रगति में एक नया अध्याय शुरू कर रही हैं।"

रक्षा मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि ऑपरेशन सिंदूर ने स्वदेशी हथियारों और प्लेटफार्मों के महत्व को दर्शाया। इससे विश्व ने भारतीय रक्षा प्रणालियों की क्षमता देखी। उन्होंने कहा कि आगे चलकर, देश की प्रयोगशालाएं, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम और निजी हितधारक, रक्षा मंत्रालय के सहयोग से, रक्षा बलों को स्वदेशी प्लेटफार्म से लैस करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने आगे कहा, “आत्मनिर्भरता केवल एक नीति नहीं है; यह युद्धक्षेत्र में क्षमता बढ़ाने वाला कारक है। इस प्रयास में जीआरएसई और वाईआईएल की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।”
श्री राजनाथ सिंह ने रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के प्रयासों के लिए जीआरएसई की सराहना करते हुए उन्नत निर्देशित मिसाइल फ्रिगेट आईएनएस दुनागिरी का विशेष रूप से उल्लेख किया। इसे इस वर्ष के प्रारंभ में प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किया था। उन्होंने कहा, “जीआरएसई ने अब तक 800 से अधिक पोतों का निर्माण किया है। वर्तमान में निर्माणाधीन अगली पीढ़ी के अपतटीय गश्ती पोतों में भी 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री होगी। यह दर्शाता है कि हम विदेशी स्रोतों पर अपनी निर्भरता तेजी से कम कर रहे हैं।” उन्होंने शिपयार्ड को 'नवरत्न' का दर्जा प्राप्त करने पर बधाई भी दी।
रक्षा मंत्री ने वाईआईएल को भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमता का एक मजबूत स्तंभ बताया और आशा व्यक्त की कि ईशापुर स्थित मेटल एंड स्टील फैक्ट्री में नई आधुनिक सुविधाएं उन्नत हथियारों और रणनीतिक घटकों की महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह से सुरक्षित करेगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अक्टूबर 2021 में स्थापित होने के बावजूद, कंपनी ने शुरुआती चुनौतियों को पार कर लिया है और लगातार वित्तीय और नियामक उत्कृष्टता प्राप्त की है। उन्होंने कहा, “वाईआईएल ने एमएसएफ ईशापुर में 750 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया है। 1976 से चली आ रही पुरानी प्रणालियों को बदलकर, यह निवेश उद्योग 4.0 के अनुरूप सटीक विनिर्माण स्थापित करेगा जिससे स्वदेशी हथियार निर्माण की दिशा में हमारी प्रगति में तेजी आएगी।”
श्री राजनाथ सिंह ने आगे कहा कि सकारात्मक सोच के साथ आत्मनिर्भरता के पथ पर अग्रसर होते हुए, वैश्विक जहाज निर्माण क्षेत्र में उभरते "क्षमता विरोधाभास" पर विचार करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि नौसेना और वाणिज्यिक जहाजों की मांग बढ़ रही है, जबकि पारंपरिक जहाज निर्माण करने वाले देशों की क्षमता में लगातार कमी आ रही है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि तकनीकी बदलाव की तीव्र गति के साथ-साथ इस स्थिति ने डिजाइन, निर्माण और रखरखाव, मरम्मत एवं पुनर्निर्माण (एमआरओ) के क्षेत्र में वैश्विक जहाज निर्माण में एक खालीपन पैदा कर दिया है। यह भारत के लिए एक प्रमुख वैश्विक जहाज निर्माण केंद्र के रूप में उभरने का एक अवसर है।

रक्षा मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक जहाज निर्माण करने वाले देशों के पास जो डिजाइन विशेषज्ञता थी, वह धीरे-धीरे कम हो रही है और भारत को अपने इंजीनियरों, आईटी पेशेवरों और सिमुलेशन एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता में विशेषज्ञता का लाभ उठाकर स्वदेशी जहाज डिजाइन विकसित करने, पेटेंट प्राप्त करने और उन्हें वैश्विक स्तर पर निर्यात करने चाहिए। विनिर्माण के विषय पर उन्होंने कहा कि कई विकसित देश बढ़ती लागत और कुशल श्रमशक्ति की कमी के कारण श्रम-प्रधान जहाज निर्माण से पीछे हट रहे हैं जबकि भारत के पास कुशल कार्यबल, एक मजबूत इस्पात उद्योग और एक सशक्त एमएसएमई तंत्र मौजूद है। उन्होंने शिपयार्डों के आधुनिकीकरण और वैश्विक गुणवत्ता मानकों के पालन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, "यदि हम अपनी विनिर्माण क्षमता का आधुनिकीकरण करें और वैश्विक गुणवत्ता मानकों का पालन करें तो भारत विश्व का अगला प्रमुख जहाज निर्माण केंद्र बन सकता है।"
श्री राजनाथ सिंह ने एमआरओ को एक आसान लक्ष्य बताते हुए कहा कि इसमें न तो भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है और न ही विशाल कार्यबल की। उन्होंने भारत से हिंद महासागर क्षेत्र में जहाज मरम्मत और नवीनीकरण का केंद्र बनने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “एमआरओ के लिए केवल गुणवत्ता, अनुशासन और समयबद्धता आवश्यक है। यदि हम जहाज मरम्मत और नवीनीकरण के केंद्र के रूप में खुद को स्थापित कर लेते हैं तो हम न केवल विदेशी मुद्रा की बचत करेंगे बल्कि हजारों रोजगार भी सृजित करेंगे।”
रक्षा मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि जीआरएसई की रायचक सुविधा 200 मीटर तक की लंबाई वाले युद्धपोतों के निर्माण की क्षमता प्रदान करेगी और शिपयार्ड को अगली पीढ़ी के विध्वंसक जहाजों के लिए बोली लगाने में सक्षम बनाएगी, जबकि हावड़ा के टिम्बर पॉन्ड और दामोदर कॉम्प्लेक्स में स्थित सुविधाएं जहाज निर्माण मूल्य श्रृंखला को मजबूत करेंगी। उन्होंने आगे कहा कि वाईआईएल की दो फोर्जिंग सुविधाएं भारी तोपखाने, नौसैनिक हथियारों और उन्नत रक्षा उपकरणों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली धातुओं का उत्पादन करेंगी जिससे नौसेना की परिचालन तैयारी मजबूत होगी।
श्री राजनाथ सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि जहाज निर्माण और रक्षा विनिर्माण के विस्तार से विदेशी मुद्रा की बचत होगी, उद्योगों और एमएसएमई को मजबूती मिलेगी और प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होगा जिससे आर्थिक विकास में योगदान मिलेगा। उन्होंने जीआरएसई से आग्रह किया कि वह अपनी बढ़ी क्षमता का पूरा उपयोग करे और 'मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड' के विजन को साकार करने के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अधिक आक्रामक रूप से प्रतिस्पर्धा करे। उन्होंने वैश्विक स्तर पर विश्वसनीय गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धी लागत और समय पर डिलीवरी का आह्वान किया ताकि बार-बार ऑर्डर प्राप्त किए जा सकें और भारत को एक पसंदीदा आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित किया जा सके। उन्होंने कहा, “हमारी सोच अब इस बात पर केंद्रित नहीं होनी चाहिए कि भारत को दुनिया से क्या खरीदना चाहिए बल्कि हमें इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि दुनिया भारत से क्या खरीदना चाहती है।”
रक्षा मंत्री ने कहा कि ये पांच परियोजनाएं भारत की रक्षा विनिर्माण क्षमताओं का रणनीतिक विस्तार दर्शाती हैं और रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, निजी उद्योग, एमएसएमई और शैक्षणिक संस्थानों की संयुक्त भागीदारी का आह्वान करती हैं।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री श्री सुवेंदु अधिकारी ने इस अवसर पर बोलते हुए भूमि पूजन को ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि विस्तार परियोजनाओं से न केवल जीआरएसई और वाईआईएल की क्षमता बढ़ेगी बल्कि पश्चिम बंगाल के औद्योगिक क्षेत्र में भी नई जान आएगी। उन्होंने आगे कहा कि इन परियोजनाओं से रोजगार सृजित होंगे और एमएसएमई सहित सहायक उद्योगों के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध होंगे।
इस अवसर पर पश्चिम बंगाल सरकार के मुख्य सचिव श्री मनोज अग्रवाल; रक्षा उत्पादन सचिव श्री संजीव कुमार; जीआरएसई के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक कमोडोर पीआर हरि; वाईआईएल के सीएमडी श्री विजयकुमार अय्यर और रक्षा उत्पादन विभाग, जीआरएसई और वाईआईएल के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

जीआरएसई परियोजनाओं के बारे में
जीआरएसई ने 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' पहलों के अनुरूप, अगली पीढ़ी के युद्धपोतों और वाणिज्यिक प्लेटफार्मों के निर्माण के लिए एक व्यापक विस्तार पहल शुरू की है। इस योजना के तहत, जीआरएसई ने कोलकाता स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट (एसएमपीके) के साथ नदी के दोनों किनारों पर अप्रयुक्त पड़े दो छोटे शिपयार्डों और रायचक में नदी के किनारे स्थित 32 एकड़ भूमि के पट्टे समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। जीआरएसई को इन नए स्थानों से युद्धपोतों के साथ-साथ छोटे और मध्यम आकार के वाणिज्यिक जहाजों का निर्माण और नवीनीकरण करने में सुविधा होगी।
रायचक में जीआरएसई द्वारा अधिग्रहित 32 एकड़ भूमि में 356 मीटर का तटवर्ती क्षेत्र और 96 मीटर का मौजूदा घाट है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहां 8-10 मीटर का जलस्तर है जो इसे जहाज निर्माण के लिए आदर्श स्थान बनाता है।
शिपयार्ड 2,500 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश से रायचक को एक जहाज निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है। इस सुविधा से 200 मीटर तक की लंबाई वाले युद्धपोतों और 60,000 टन तक के भार वाले वाणिज्यिक जहाजों (सुप्रामैक्स जहाजों) का निर्माण संभव हो सकेगा।
इस सुविधा केंद्र में 200 मीटर लंबा ड्राई डॉक, 200 मीटर लंबा स्लिपवे, 200 मीटर लंबा जहाज लॉन्चिंग पैड, 120 मीटर और 86 मीटर के दो जेट्टी, ब्लॉक निर्माण और समेकन की सुविधाएं, पतवार मरम्मत की दुकानें और भंडार तथा प्रशासनिक कार्यालय होंगे।
हावड़ा के शालीमार में स्थित टिम्बर पॉन्ड, हुगली नदी के ठीक दूसरी ओर जीआरएसई के सामने चार एकड़ में फैला हुआ है। इसे एसएमपीके से 30 साल के पट्टे पर लिया गया है। इस सुविधा में एक जर्जर ड्राईडॉक और लगभग 88 मीटर का तटवर्ती क्षेत्र है। जीआरएसई इसे इसे फिर से शुरू करने और मध्यम आकार के जहाजों के लिए जहाज निर्माण और मरम्मत सुविधा में बदलने के लिए लगभग 100 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना बना रहा है।
इस योजना में 130 मीटर लंबे ड्राई डॉक का जीर्णोद्धार, 120 मीटर लंबे नए स्लिपवे का निर्माण, तटरेखा संरक्षण कार्य और ड्राई डॉक गेट तथा गैन्ट्री क्रेन की स्थापना शामिल है। ब्लॉक निर्माण, भंडारगृह और वर्कशॉप के लिए सुविधाओं के निर्माण की भी योजना है।
कोलकाता के किद्दरपोर डॉक्स (केपीडी) में स्थित एसएमपीके से एक पुरानी वर्कशॉप और 25 मीटर लंबा तटवर्ती क्षेत्र 30 साल के पट्टे पर लिया गया है। दामोदर के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र केपीडी में स्थित तीन ड्राई डॉक्स के निकट है जिनका उपयोग जीआरएसई द्वारा जहाजों की मरम्मत और नवीनीकरण के लिए पहले से ही किया जा रहा है। शिपयार्ड इस सुविधा को विकसित करने के लिए लगभग 70 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना बना रहा है ताकि मध्यम आकार के जहाजों की मरम्मत की जा सके और इलेक्ट्रिक फेरी के साथ-साथ अन्य छोटे जलयानों का निर्माण किया जा सके।
वाईआईएल परियोजनाओं के बारे में
वाईआईएल की इन दो अत्याधुनिक परियोजनाएं 750 करोड़ रुपये से अधिक का संयुक्त निवेश निवेश किया गया है। ये भारी आयुध, रेलवे, परमाणु अवसंरचना और उन्नत हथियार प्रणालियों के लिए स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करेंगी। पहली सुविधा 3,000 टन क्षमता वाली हेवी ड्यूटी हाइड्रोलिक ओपन डाई फोर्जिंग प्रेस है। इसमें दो एकीकृत रेल-आधारित मैनिपुलेटर लगे हैं। यह सीधे तौर पर 1976 से चल रही 2,650 टन की पुरानी प्रेस का स्थान लेगी। 26 महीनों में पूरी होने वाली इस नई सुविधा से महत्वपूर्ण तोप बैरल, गोला-बारूद घटकों और भारी रक्षा फोर्जिंग के निर्बाध, उच्च-सटीक उत्पादन होगा।
परिचालन सुरक्षा और सटीकता बढ़ाने के अलावा, 3,000 टन की यह प्रेस उल्लेखनीय आर्थिक और परिचालन व्यवहार्यता प्रदान करती है। अनुमान है कि यह डाउनटाइम और रखरखाव लागत में भारी कटौती करके प्रति वर्ष 25.58 करोड़ रुपये की बचत करेगी जबकि 500 करोड़ रुपये के वार्षिक कारोबार में सहयोग करेगी। 11 वर्षों की पेबैक अवधि और 7.3% की आंतरिक प्रतिफल दर (आईआरआर) के साथ, यह सुविधा रक्षा बलों के लिए दीर्घकालिक आपूर्ति श्रृंखला विश्वसनीयता की गारंटी देती है।
दूसरा नया संयंत्र रेडियल फोर्जिंग प्लांट है, जो व्यापक अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम सुविधाओं से सुसज्जित है। 473.84 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित और 30 महीनों में पूरे होने वाले इस संयंत्र से एमएसएफ ईशापुर में उन्नत रेडियल फोर्जिंग तकनीक की शुरुआत होगी। इससे वाईआईएल की सुपर अलॉय फोर्जिंग, हवाई बमों के लिए खोखली ट्यूब, भविष्य के आयुध प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण हार्डवेयर, उच्च-शक्ति वाले रेलवे एक्सल और परमाणु रिएक्टर घटकों के उत्पादन की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
यह रेडियल फोर्जिंग यूनिट इंडस्ट्री 4.0 मानकों, ऊर्जा-कुशल संचालन और उत्कृष्ट परिशुद्धता इंजीनियरिंग का संयोजन है। रणनीतिक दृष्टि से, इससे लगभग 69 करोड़ रुपये का प्रभावशाली वार्षिक लाभ, 10.58% की उच्च ब्याज दर (आईआरआर) और लगभग 6 वर्षों की त्वरित पे-बैक अवधि का अनुमान है। रणनीतिक फोर्जिंग और रेलवे अवसंरचना घटकों पर आयात निर्भरता को कम करके, यह संयंत्र घरेलू रक्षा कार्यक्रमों के लिए आत्मनिर्भरता की नींव रखता है।
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पीके/केसी/पीपी/आरके
(रिलीज़ आईडी: 2302536)
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