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राज्यसभा सचिवालय
राज्यसभा की विभाग संबंधित वाणिज्य संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 200वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति
प्रविष्टि तिथि:
06 AUG 2026 5:49PM by PIB Delhi
सुश्री दोला सेन, संसद सदस्य, राज्य सभा की अध्यक्षता वाली विभाग संबंधित वाणिज्य संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने 6 अगस्त, 2026 को संसद के दोनों सदनों में भारत-संयुक्त राज्य अमेरिका व्यापार संबंधों का मूल्यांकन के संबंध में अपना 200वां प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। समिति ने अपने प्रतिवेदन में भारत-संयुक्त राज्य अमेरिका व्यापार संबंधों का मूल्यांकन किया है, अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले अमेरिकी टैरिफ उपायों से उत्पन्न प्रमुख चुनौतियों की पहचान की है, और इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण चिंताओं से निपटने के लिए सिफारिशें की हैं।
7 घंटे और 50 मिनट तक चली अपनी चार बैठकों के दौरान, समिति ने इस विषय की जांच की और चर्चा की। वाणिज्य विभाग, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, वित्तीय सेवाएं विभाग, वित्त मंत्रालय, मत्स्य विभाग, मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय, वस्त्र मंत्रालय, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (एमएसडीई), कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए), भारतीय निर्यात संगठन संघ (एफआईईओ), भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई), भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंडल संघ (एफआईसीसीआई), बैंकों और वित्तीय संस्थानों तथा विभिन्न अन्य हितधारकों के प्रतिनिधियों के साथ विषय की जांच और चर्चा की। समिति ने 5 अगस्त, 2026 को आयोजित हुई बैठक में इस प्रारूप प्रतिवदेन पर विचार किया और इसे स्वीकार किया । इस प्रतिवेदन में समिति द्वारा की गई सिफारिशें/समुक्तियाँ संलग्न हैं।
संपूर्ण रिपोर्ट https://sansad.in/rs >Committees>DRPSC-RS>Commerce>Report पर भी उपलब्ध है।
सिफारिशें/समुक्त्यिां- एक नजर में
परिचय
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सभी हितधारकों ने समिति को सूचित किया कि समिति की बैठक में देश भर से समुद्री उत्पादों और मछुआरों, चमड़ा, ऑटोमोटिव, वस्त्र जिसमें जूट और कपास सहित, रत्न और आभूषण, रसायन और पेट्रोरसायन, इस्पात, कृषि और कृषि आधारित उद्योगों के प्रतिनिधि शामिल थे, जिन्होंने अपने विचार व्यक्त किए और अमेरिकी शुल्क बढ़ोतरी को लेकर अपनी चिंताओं को साझा किया। उपरोक्त के दृष्टिगत, समिति देश और इसके नागरिकों के हित में भारत-संयुक्त राज्य अमेरिका व्यापार संबंधों की समीक्षा करने की सिफारिश करती है। (पैरा 1.5)
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंध
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समिति सिफारिश करती है कि सरकार भारत के हितों की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को जल्द से जल्द अंतिम रूप दे। समिति का मत है कि विभाग को मिशन 500 पहल के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए एक समयबद्ध कार्यसूची भी तैयार करनी चाहिए, जिसमें वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार को बढ़ावा देना, निवेश को प्रोत्साहित करना, स्ट्रैटेजिक टेक्नोलॉजी (ट्रस्ट) फ्रेमवर्क का उपयोग करके संबंधों को बदलने के तहत महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में सहयोग को मजबूत करना, आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन में सुधार करना और भारतीय निर्यातकों के सामने आने वाली टैरिफ और गैर-टैरिफ बाजार पहुंच संबंधी बाधाओं का समाधान करना शामिल है।(पैरा 2. 5)
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समिति का मानना है कि व्यापक कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए, रोडमैप में घरेलू उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं के रणनीतिक उपयोग पर स्पष्ट रूप से ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि निर्यात अवसंरचना को मजबूत किया जा सके और वैश्विक आपूर्ति झटकों के मुकाबले लागत-प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाया जा सके। साथ ही, अमेरिकी बंदरगाहों पर व्यापार में मनमानी तकनीकी बाधाओं (टीबीटी) को रोकने के लिए पेशेवर सेवाओं, फार्मास्यूटिकल्स और कृषि मानकों के लिए पारस्परिक मान्यता समझौतों (एमआरए) को शीघ्रता से लागू करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। समिति का यह भी सुझाव है कि मुद्रा अस्थिरता और रसद संबंधी चुनौतियों की नियमित समीक्षा के लिए एक संस्थागत तंत्र स्थापित करना आवश्यक है ताकि लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के नेतृत्व वाले निर्यात क्षेत्रों को अचानक नियामक परिवर्तनों से बचाया जा सके। समिति का मानना है कि इससे भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक मजबूत, अधिक संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी आर्थिक साझेदारी बनाने में मदद मिलेगी।(पैरा 2. 6)
वर्तमान व्यापार परिदृश्य
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समिति का मत है कि सरकार को बाज़ार पहुँच संबंधी मुद्दों को सुलझाकर, गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करके और भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) का समर्थन करके संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने के अपने प्रयासों को जारी रखना चाहिए। समिति सिफारिश करती है कि अस्थिर टैरिफ संबंधी कार्रवाइयों से संवेदनशील लघु उद्योगों की रक्षा के लिए, विभाग को स्थानीय वित्तीय सुरक्षा उपायों और निर्यात ऋण सहायता कार्यक्रमों को सक्रिय रूप से लागू करना चाहिए। (पैरा 3.5)
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समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि भारतीय वस्तुओं पर विदेशी कर बहुत तेजी से और अप्रत्याशित रूप से बदल रहे हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि भारतीय निर्यातकों के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को जल्द से जल्द अंतिम रूप दिया जाए, ताकि दोनों देशों के व्यवसायों को एक स्थिर और पूर्वानुमानित व्यापार वातावरण का लाभ मिल सके। यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह समझौता प्रभावी हो, समिति का मत है कि सरकार भारत के सबसे बड़े निर्यात उत्पादों जैसे जेनेरिक दवाएं, महत्वपूर्ण खनिज और स्मार्टफोन को भविष्य में अमेरिका द्वारा अप्रत्याशित रूप से बढ़ाए जाने वाले करों से पूरी तरह छूट दिलाने के लिए बातचीत करे। इसके अलावा, विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) को अमेरिकी सीमा शुल्क ऑडिट की वास्तविक समय में निगरानी करने के लिए एक विशेष, त्वरित निगरानी डेस्क स्थापित करना चाहिए, ताकि भारतीय निर्यातकों को किसी भी नए आयात नियमों के बारे में तुरंत चेतावनी मिल सके।(पैरा 3.6)
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समिति ने यह भी सिफारिश की है कि लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय को लघु व्यवसायों को उनके दस्तावेज़ों को अद्यतन करने के लिए त्वरित तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए, जिससे यह साबित हो सके कि उनका कच्चा माल वास्तव में कहां से आता है, ताकि अमेरिकी सीमाओं पर शिपमेंट अटके नहीं या विलंबित न हों।(पैरा 3.7)
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समिति को विभाग द्वारा सूचित किया गया कि भारत का अमेरिका को सेवा निर्यात 51.20 बिलियन अमेरिकी डॉलर का है, जो 2020 से 11.58% की वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) से बढ़ रहा है। वहीं, अमेरिका से भारत का सेवा आयात 47.32 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया है, जिसमें 18.68% की सीएजीआर की वृद्धि हुई है। पिछले एक दशक में, अमेरिका के साथ सेवाओं का कुल व्यापार दोगुने से भी अधिक हो गया है, जो 2014 में 40.53 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में 98.52 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है। अमेरिका से भारत का सेवा आयात (18.68% सीएजीआर) हमारे सेवा निर्यात (11.58% सीएजीआर) की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है।(पैरा 3.8)
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समिति का मानना है कि व्यापार अधिशेष की इस प्रवृत्ति को बनाए रखना आवश्यक है। इसके अलावा, समिति का मत है कि विभाग को भारत के व्यापार और वाणिज्य को प्रभावित करने वाले घटनाक्रमों पर बारीकी से नज़र रखनी चाहिए, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका में लागू किए गए शुल्क उपाय और गैर-शुल्क बाधाएं शामिल हैं, और उन क्षेत्रों को समय पर नीतिगत सहायता प्रदान की जानी चाहिए जिन पर शुल्क उपायों के कारण प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, ताकि भारत की निर्यात वृद्धि प्रभावित न हो।(पैरा 3.12)
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समिति आगे यह सिफारिश करती है कि विभाग को वैश्विक 'फ्रेंड-शोरिंग' रुझानों का सक्रिय रूप से लाभ उठाना चाहिए ताकि भारतीय निर्माताओं को संयुक्त राज्य अमेरिका की महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं में गहराई से एकीकृत किया जा सके, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्रों में। समिति का मानना है कि इसके साथ ही, भारत के विनिर्माण क्षेत्र में अमेरिकी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को आकर्षित करने के लिए लक्षित निवेश प्रोत्साहन रणनीतियों को लागू किया जाना चाहिए, जिससे दीर्घकालिक निर्यात वृद्धि को बनाए रखने के लिए आवश्यक उत्पादन क्षमता का विस्तार हो सके। (पैरा 3.13)
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समिति नोट करती है कि अमेरिका की उच्च जीडीपी दर में सेवा और व्यापारिक क्षेत्र दोनों में भारतीय वस्तुओं के लिए अपार संभावनाएं हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि विभाग को संबंधित हितधारकों के साथ समन्वय में उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार, नवाचार को बढ़ावा देने, रसद को मजबूत करने, कौशल विकास, रसद लागत और निर्यातकों को अमेरिका के बदलते नियामक मानकों को पूरा करने में मदद करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके अलावा, समिति का मानना है कि लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि वे निर्यात में अधिक प्रभावी ढंग से भाग ले सकें और अमेरिकी टैरिफ उपायों के बावजूद टिके रह सकें।(पैरा 3.15)
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समिति का मानना है कि विभाग को सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और उभरती प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण जैसे क्षेत्रों में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ सहयोग मजबूत करना चाहिए। समिति का मत है कि इन क्षेत्रों में साझेदारी से घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को लाभ होगा और आयात के किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता भी कम होगी।(पैरा 3.17)
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समिति सिफारिश करती है कि विभाग एक लक्षित क्षेत्रीय दृष्टिकोण अपनाए जो समर्पित औद्योगिक गलियारों के माध्यम से विद्युत मशीनरी और उपकरण में उच्च विकास की गति को सक्रिय रूप से तेज करे, साथ ही साथ घरेलू रोजगार की रक्षा के लिए वस्त्र और परिधान तथा मोती और कीमती पत्थरों जैसे पारंपरिक, श्रम-प्रधान क्षेत्रों में गिरावट को रोकने के लिए विशेष प्रौद्योगिकी-उन्नयन अनुदान प्रदान करे। (पैरा 3.18)
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समिति आगे सिफारिश करती है कि फार्मास्युटिकल उत्पादों और कार्बनिक रसायनों में देखी जा रही स्थिर निर्यात वृद्धि को गति देने और सुरक्षित करने के लिए भारत में संयुक्त राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन (यूएसएफडीए) के दिशानिर्देशों के अनुरूप संस्थागत पूर्व-मंजूरी तंत्र और संयुक्त परीक्षण सुविधाएं स्थापित की जाएं।(पैरा 3.19)
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समिति का मत है कि पारंपरिक निर्यात में ठहराव के लिए तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है और इसलिए, वह सिफारिश करती है कि विभाग एक विशेष बाजार-संबंधित प्रोत्साहन योजना तैयार करे ताकि कपड़ा और रत्न एवं आभूषण निर्यातकों को संयुक्त राज्य अमेरिका में उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताओं के अनुरूप अपने उत्पाद डिजाइनों में विविधता लाने में मदद मिल सके। (पैरा 3.20)
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समिति समुक्ति करती है कि अमेरिकी टैरिफ उपायों के बावजूद भारत और अमेरिका के बीच व्यापार में लगातार वृद्धि हुई है। यह बढ़ता व्यापारिक संबंध दोनों अर्थव्यवस्थाओं की पूरक प्रकृति को दर्शाता है और माल व्यापार में और अधिक वृद्धि के अवसर प्रदान करता है।(पैरा 3.22)
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समिति का मानना है कि विभाग को अमेरिकी बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करनी चाहिए। इसके अलावा, समिति का यह भी मत है कि विभाग को निर्यात उत्पादों के विविधीकरण, वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण, टिकाऊ आपूर्ति श्रृंखलाओं के विकास, मूल्यवर्धित विनिर्माण को बढ़ावा देने और प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को समय पर पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। साथ ही, उभरते व्यापारिक मुद्दों को सुलझाने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बेहतर बनाने के लिए उद्योग और निर्यातकों के साथ नियमित परामर्श भी आयोजित किए जाने चाहिए। (पैरा 3.23)
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समिति विभाग को डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र के लिए एक समर्पित ढांचा तैयार करने की भी सिफारिश करती है, जिसमें सीमा पार डेटा प्रवाह को सुसंगत बनाने और बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाए ताकि संयुक्त राज्य अमेरिका के बाजार में भारतीय वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) और आईटी-सक्षम सेवाओं के विकास को सुनिश्चित किया जा सके। (पैरा 3.24)
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अरबों डॉलर के बढ़ते व्यापार की मात्रा को देखते हुए, समिति विभाग को यह सिफारिश करती है कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका के व्यापार अधिकारियों के साथ एक समर्पित, त्वरित द्विपक्षीय संस्थागत तंत्र की स्थापना के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करे ताकि व्यापारिक घर्षण और अनुपालन विवादों को प्रतिबंधात्मक टैरिफ कार्रवाई में तब्दील होने से पहले ही सक्रिय रूप से चिह्नित किया जा सके, उन पर चर्चा की जा सके और उनका समाधान किया जा सके। (पैरा 3.25)
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समिति का मत है कि उच्च विकास दर को बनाए रखने के लिए मजबूत घरेलू बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है। अतः समिति विभाग को पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के साथ समन्वय स्थापित करने की सिफारिश करती है ताकि विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात होने वाले उच्च मात्रा के व्यापार के लिए त्वरित निर्यात गलियारे और स्वचालित सीमा शुल्क निकासी क्षेत्र बनाए जा सकें।(पैरा 3.26)
क्षेत्रीय विश्लेषण
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समिति का मत है कि विभाग को प्रस्तावित भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिसमें इंजीनियरिंग सामान, ऑटो कंपोनेंट्स और ऑटोमोटिव क्षेत्र से संबंधित अन्य उत्पादों पर टैरिफ कम करने पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि भारतीय निर्यातकों पर अमेरिकी टैरिफ हटने से भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होगा और इससे निर्यातकों को दीर्घकालिक व्यावसायिक रणनीतियां बनाने के लिए आवश्यक निश्चितता मिलेगी। इसके अलावा, इससे दोनों देशों के बीच औद्योगिक सहयोग और आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण को भी बढ़ावा मिलेगा।(पैरा 4.5)
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समिति आगे यह सिफारिश करती है कि इंजीनियरिंग क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत किया जाना चाहिए। अतः समिति का मत है कि प्रौद्योगिकी उन्नयन, स्वचालन, अनुसंधान एवं विकास, गुणवत्ता सुधार और वैश्विक विनिर्माण मानकों को अपनाने को बढ़ावा देकर इसे प्राप्त किया जा सकता है। समिति का मानना है कि संरचनात्मक अक्षमताओं को कम करने से उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी, जिससे अस्थिर टैरिफ व्यवस्थाओं के बावजूद भारतीय ऑटो कंपोनेंट अमेरिकी बाजार में अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे।(पैरा 4.6)
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समिति का मत है कि विभाग भारतीय निर्माताओं और अमेरिकी मूल उपकरण निर्माताओं (ओईएम), टियर-1 आपूर्तिकर्ताओं और प्रमुख खरीदारों के बीच व्यापार-से-व्यापार साझेदारी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। समिति सिफारिश करती है कि विभाग संबंधित मंत्रालयों के समन्वय से निर्यातकों को समय पर निर्यात ऋण, बाजार विविधीकरण, व्यापार वित्त, निर्यात अनुपालन, रसद, विदेशी भंडारण आदि के माध्यम से सहायता प्रदान करे। समिति यह भी सुझाव देती है कि एकल-देश निर्भरता को कम करने के लिए यूरोप, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, खाड़ी क्षेत्र और अन्य उभरते बाजारों सहित वैकल्पिक क्षेत्रों में इंजीनियरिंग निर्यात को बढ़ावा देने के लिए आक्रामक बाजार पहुंच अभियान शुरू किए जाने चाहिए। (पैरा 4.7)
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यह मानते हुए कि ऑटोमोटिव क्षेत्र में लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) का एक विशाल नेटवर्क शामिल है, जिनके पास टैरिफ के झटकों को सहने के लिए वित्तीय सुरक्षा नहीं है, समिति एक समर्पित 'एमएसएमई निर्यात लचीलापन योजना' बनाने की सिफारिश करती है। समिति का सुझाव है कि योजना के तहत विभाग को लक्षित वित्तीय सब्सिडी प्रदान करनी चाहिए, निर्यात ऋणों पर ब्याज दरें कम करनी चाहिए और छोटे निर्माताओं को जटिल अनुपालन और परीक्षण प्रक्रियाओं में सहायता के लिए संस्थागत तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए। (पैरा 4.8)
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खरीदार-विशिष्ट तकनीकी विशिष्टताओं के कारण भारतीय घटकों को नए बाजारों में तुरंत नहीं भेजा जा सकता, इस समस्या के समाधान के लिए समिति एक राष्ट्रीय कोष स्थापित करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि यह कोष भारतीय आपूर्तिकर्ताओं को वित्तीय प्रोत्साहन और अनुदान प्रदान करे ताकि उत्पाद के पुनर्रचना, नए उपकरण निवेश, प्रोटोटाइप विकास और नई वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में प्रवेश के लिए आवश्यक विदेशी तकनीकी प्रमाणपत्र प्राप्त करने से जुड़ी उच्च पूंजी लागत की भरपाई की जा सके।(पैरा 4.9)
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भारत की निर्यात अर्थव्यवस्था को भविष्य के लिए तैयार करने और वैश्विक खरीदारों के पसंदीदा व्यापार साझेदारों की ओर झुकाव का मुकाबला करने के लिए, समिति भारतीय आपूर्तिकर्ताओं को टिकाऊ विनिर्माण प्रथाओं को अपनाने में मदद करने के लिए एक संरचित ढांचा तैयार करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि विभाग को ऊर्जा-कुशल संचालन, कार्बन फुटप्रिंट मैपिंग और वैश्विक पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ईएसजी) मानकों के अनुपालन को प्रोत्साहित करना चाहिए, जो प्रमुख पश्चिमी आपूर्ति श्रृंखलाओं में प्रवेश के लिए तेजी से अनिवार्य शर्तें बनती जा रही हैं। (पैरा 4.10)
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इस उद्योग पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर लोगों के रोजगार को बनाए रखने के लिए, समिति सतत क्षमता निर्माण कार्यक्रम की सिफारिश करती है। समिति का सुझाव है कि विभाग, कौशल विकास मंत्रालय के सहयोग से, स्मार्ट ऑटोमेशन, रोबोटिक्स, सटीक इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) घटक निर्माण जैसी उद्योग 4.0 प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित उन्नत प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करे, क्योंकि इससे तकनीकी क्षमता की कमी को दूर किया जा सकेगा और यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि भारतीय घटक अगली पीढ़ी की वैश्विक बाजार मांगों को पूरा कर सकें।(पैरा 4.11)
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समिति सिफारिश करती है कि विभाग को हितधारकों के साथ मिलकर नए व्यापारिक साझेदारों की पहचान करनी चाहिए और प्रतिस्पर्धात्मकता, बाजार विविधीकरण और उत्पाद विविधीकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों को आगे बढ़ाना चाहिए। इन पहलों से भारत के रत्न और आभूषण निर्यात की दीर्घकालिक वृद्धि को मजबूती मिलेगी।(पैरा 4.20)
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समिति का मत है कि विभाग निर्यात ऋण, ब्याज समतुल्यीकरण, निर्यात बीमा, कार्यशील पूंजी सहायता और व्यापार वित्त के माध्यम से इस क्षेत्र के लिए एक व्यापक सहायता पैकेज प्रदान करे, विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए। समिति का यह मत है कि वित्तीय संस्थानों और बैंकों को किफायती ऋण की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि निर्यातक वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं से उत्पन्न अस्थायी व्यवधानों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सकें। (पैरा 4.21)
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समिति का विचार है कि मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग, हॉलमार्किंग, डिज़ाइन नवाचार और उन्नत विनिर्माण प्रौद्योगिकियों पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए। समिति का मत है कि प्रयोगशाला में उत्पादित हीरे, डिज़ाइनर आभूषण, ब्रांडेड आभूषण और कीमती धातु के आभूषण जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों के लिए विशेष प्रोत्साहन प्रदान किए जा सकते हैं। इसके अलावा, समिति अनुसंधान, डिज़ाइन विकास और कौशल उन्नयन को मजबूत करने की भी सिफारिश करती है ताकि भारत वैश्विक मूल्य श्रृंखला में और आगे बढ़ सके और निर्यात आय में वृद्धि कर सके। (पैरा 4.22)
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समिति यह भी सिफारिश करती है कि विभाग रत्न एवं आभूषण क्षेत्र पर शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं के प्रभाव का नियमित आकलन करने के लिए एक समर्पित निगरानी तंत्र स्थापित करे। समिति का मत है कि उभरते व्यापार जोखिमों की पहचान करने, अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियों में बदलावों की निगरानी करने और समय पर नीतिगत हस्तक्षेपों को सुविधाजनक बनाने के लिए एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित की जा सकती है। समिति उद्योग संघों, निर्यात संवर्धन परिषदों और अन्य हितधारकों के साथ निरंतर परामर्श की भी सिफारिश करती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि क्षेत्र की बदलती जरूरतों के अनुरूप सहायता समय पर उपलब्ध रहे।(पैरा 4.33)
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समिति सिफारिश करती है कि भारतीय रत्नों और आभूषणों के निर्यात में 2025 के शुल्क उपायों के कारण आई 48% की भारी गिरावट को दूर करने के लिए विभाग द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ लक्षित द्विपक्षीय व्यापार वार्ता शुरू की जाए। समिति का मानना है कि भारत की बाजार हिस्सेदारी में हो रही हानि को रोकने के लिए स्विट्जरलैंड, कनाडा और मैक्सिको जैसे वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के साथ शुल्क समानता हासिल करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। (पैरा 4.24)
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समिति यह भी सिफारिश करती है कि विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास, जीजेईपीसी और उद्योग संघों के समन्वय से, भारतीय रत्न एवं आभूषण उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए क्रेता-विक्रेता बैठकें, व्यापार प्रदर्शनियाँ और व्यावसायिक प्रतिनिधिमंडल आयोजित करें। इसके अलावा, खाड़ी क्षेत्र, यूरोप, पूर्वी एशिया, आसियान, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में निर्यात बढ़ाकर भारत के निर्यात बाजारों में विविधता लाने के प्रयास किए जाने चाहिए। (पैरा 4.25)
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समिति को इस बात की चिंता है कि लंबे समय तक चलने वाली व्यापार अनिश्चितता इस अत्यधिक श्रम प्रधान क्षेत्र में छंटनी का कारण बनेगी। इसे रोकने के लिए, समिति का मानना है कि राज्य समर्थित निर्यात इनवॉइस डिस्काउंटिंग विंडो स्थापित की जानी चाहिए, ताकि लघु एवं मध्यम उद्यमों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाए रखा जा सके और लाखों श्रमिकों की आजीविका सुरक्षित रखी जा सके।(पैरा 4.26)
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समिति हांगकांग, थाईलैंड और यूनाइटेड किंगडम जैसे बढ़ते बाजारों में "भारत आभूषण व्यापार और वितरण केंद्र" स्थापित करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि इन क्षेत्रों में निर्यातकों द्वारा उच्च अमेरिकी शुल्कों से बचने के लिए स्वतः ही बाजार विविधीकरण हो रहा है। समिति का मानना है कि इन वैकल्पिक केंद्रों में सुरक्षित माल भंडारण और शुल्क-मुक्त भंडारण क्षमता स्थापित करने से इन लाभों को संस्थागत रूप दिया जा सकेगा। समिति का यह भी मत है कि एकल बाजार पर निर्भरता कम करना वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों के खिलाफ सबसे प्रभावी दीर्घकालिक सुरक्षा कवच है।(पैरा 4.27)
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समिति का मानना है कि प्रस्तावित भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के तहत इस्पात, एल्युमीनियम, तांबा और रासायनिक उत्पादों से संबंधित शुल्क मुद्दों को हल करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके अलावा, विभाग को धारा 232 शुल्क और धारा 301 जांच के संबंध में घरेलू उद्योग के हितों की रक्षा के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ सक्रिय रूप से बातचीत करनी चाहिए, साथ ही भारतीय निर्यातकों के लिए स्थिर और पूर्वानुमानित बाजार पहुंच सुनिश्चित करनी चाहिए। समिति की सिफारिश है कि विभाग को अमेरिकी एल्युमीनियम और तांबे के स्क्रैप तक दीर्घकालिक, बाधा-मुक्त पहुंच सुनिश्चित करने के लिए अमेरिकी अधिकारियों के साथ सक्रिय रूप से बातचीत करनी चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि अपशिष्ट और स्क्रैप पर भविष्य में कोई भी अमेरिकी निर्यात प्रतिबंध भारत के उद्योगों की कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित न करे।(पैरा 4.38)
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समिति आगे सिफारिश करती है कि विभाग प्रौद्योगिकी उन्नयन, स्वचालन, अनुसंधान एवं विकास, ऊर्जा दक्षता और उच्च मूल्य वाले उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देकर इन क्षेत्रों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करे। समिति का मत है कि रसद लागत को कम करने और बंदरगाह अवसंरचना में सुधार पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए ताकि भारतीय उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहें। समिति सिफारिश करती है कि इस प्रतिस्पर्धात्मकता को बनाए रखने के लिए, विभाग को एक समर्पित कार्यबल का गठन करना चाहिए जो भारतीय निर्यातकों को कार्बन सीमा समायोजन जैसे विकसित हो रहे अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप ढलने में मदद करे और यह सुनिश्चित करे कि भारतीय गैर-लौह उत्पाद अमेरिकी बाजार के लिए आवश्यक स्थिरता मानकों को पूरा करते हैं। (पैरा 4.39)
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समिति सिफारिश करती है कि इस्पात, एल्युमीनियम और तांबा उद्योगों में कार्यरत लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को किफायती ऋण, निर्यात वित्त, प्रौद्योगिकी अधिग्रहण और अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता प्रमाणन तक आसान पहुंच के माध्यम से विशेष सहायता प्रदान की जाए। समिति ने इनपुट लागत को कम करने और संसाधन दक्षता में सुधार करने के लिए घरेलू पुनर्चक्रण अवसंरचना को मजबूत करने की भी सिफारिश की है, विशेष रूप से एल्युमीनियम और तांबे के स्क्रैप के लिए। (पैरा 4.40)
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समिति यह भी सिफारिश करती है कि उच्च श्रेणी के मूल्यवर्धित गैर-लौह उत्पादों के लिए संयुक्त उद्यमों में अमेरिकी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को आकर्षित करने हेतु भारत की विनिर्माण क्षेत्र की क्षमताओं का लाभ उठाया जाए। समिति का मानना है कि इस समन्वय से भारतीय विनिर्माण कंपनियां अमेरिकी एयरोस्पेस, रक्षा और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत हो जाएंगी, जिससे द्विपक्षीय संबंध कच्चे माल के बदले तैयार माल के लेन-देन से बदलकर एक मजबूत, उच्च-प्रौद्योगिकी सह-विनिर्माण साझेदारी में परिवर्तित हो जाएंगे।(पैरा 4.41)
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समिति भारत की वैश्विक महत्वपूर्ण खनिज और धातु मूल्य श्रृंखलाओं में स्थिति को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन, फोरम फॉर रेजिलिएंट ग्लोबल प्रोसेसिंग एंड एक्सट्रैक्शन (एफओआरजीई/फोर्ज), भारत-अमेरिका रणनीतिक खनिज पुनर्प्राप्ति पहल, इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (आईपीईएफ) और क्वाड महत्वपूर्ण खनिज पहल जैसी रणनीतिक पहलों का लाभ उठाने की सिफारिश करती है। समिति आग्रह करती है कि खनिज अन्वेषण, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण, दुर्लभ पृथ्वी धातुओं, बैटरी सामग्री और उन्नत विनिर्माण प्रौद्योगिकियों में निवेश आकर्षित करने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।(पैरा 4.42)
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समिति यह भी सिफारिश करती है कि विभाग को उद्योग संघों और निर्यातकों के साथ नियमित परामर्श की सुविधा प्रदान करनी चाहिए, जिससे भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता की रक्षा करने और भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लचीलेपन को बढ़ाने के लिए समय पर नीतिगत हस्तक्षेप संभव हो सके।(पैरा 4.43)
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समिति मत्स्यपालन विभाग, एमपीईडीए, सीआईएफटी, ईआईसी और अन्य एजेंसियों द्वारा ट्रेसिबिलिटी प्रणालियों को सुदृढ़ करने, संधारणीय मत्स्य पालन प्रथाओं को बढ़ावा देने, स्वदेशी टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस को विकसित करने और समुद्री स्तनधारियों की तुलनात्मकता प्राप्त करने के लिए की गई पहलों पर ध्यान देती है। समिति का मानना है कि प्रीमियम निर्यात बाजारों तक निरंतर पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सतत प्रयासों की आवश्यकता होगी। (पैरा 4.54)
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समिति का यह भी मानना है कि मूल्यवर्धित समुद्री खाद्य उत्पादों, समुद्री कृषि, समुद्री शैवाल की खेती, जलीय पिंजरें युक्त अपतटीय मत्स्य पालन और उन्नत प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों में विविधता लाकर भारत में समुद्री निर्यात को विस्तारित करने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। समिति समुक्ति करती है कि समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीए), केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीएमएफआरआई), केंद्रीय मत्स्य प्रौद्योगिकी संस्थान (आईसीएआर सीआईएफटी) और राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म (एनएफडीबी) जैसे संस्थानों ने नियंत्रित वातावरण में प्रजनन, रोग-प्रतिरोधी प्रजातियों, कटाई के बाद के प्रसंस्करण, खाद्य सुरक्षा और मूल्यवर्धन से संबंधित प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं। समिति सिफारिश करती है कि पकाने और खाने के लिए तैयार समुद्री खाद्य उत्पादों पर अधिक जोर दिया जाए, शीत-श्रृंखला अवसंरचना, ब्रांडिंग और प्रमाणन से निर्यात आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।(पैरा 4.55)
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समिति व्यापार व्यवधानों से प्रभावित निर्यातकों, प्रसंस्करणकर्ताओं, हैचरी और झींगा पालकों के लिए रियायती निर्यात ऋण, कार्यशील पूंजी सहायता, ब्याज पर राजसहायता, ऋण गारंटी सहायता और पुनर्गठन सुविधाओं सहित समुद्री उत्पाद क्षेत्र के लिए एक व्यापक सहायता पैकेज तैयार करने की सिफारिश करती है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि वित्तीय संस्थान और बैंक समुद्री खाद्य निर्यात में लगे लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए राहत उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करें। इसके अलावा, समिति का यह भी मानना है कि विभाग को तटीय प्राथमिक उत्पादकों के लाभ मार्जिन की रक्षा करने वाले एक पूर्वानुमानित शुल्क ढांचे को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, डंपिंग-विरोधी और प्रतिपूरक शुल्कों की मनमानी वृद्धि का विशेष रूप से विरोध करने के लिए संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (यूएसआर) के साथ उच्च स्तरीय द्विपक्षीय व्यापार वार्ता शुरू करनी चाहिए।(पैरा 4.56)
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समिति की सिफ़ारिश है कि एमपीईडीए, मत्स्य विभाग और वाणिज्य मंत्रालय द्वारा संयुक्त प्रयास किए जाएं ताकि यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम, जापान, दक्षिण कोरिया और अन्य उभरते बाजारों में निर्यात बढ़ाकर बाजार विविधीकरण किया जा सके। समिति का यह भी मानना है कि मूल्यवर्धित समुद्री खाद्य उत्पादों को बढ़ावा देने, ब्रांडिंग करने और घरेलू समुद्री खाद्य बाजार के विकास पर ज़ोर दिया जाना चाहिए ताकि किसी एक निर्यात गंतव्य पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके। समिति का मत है कि आपूर्ति संबंधी कमज़ोरियों को दूर करने के लिए, विभाग को एक आत्मनिर्भरता योजना लागू करनी चाहिए ताकि विशिष्ट रोगजनक मुक्त (एसपीएफ) ब्रूडस्टॉक के घरेलू प्रजनन और विशेष फ़ीड के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा दिया जा सके, जिससे मत्स्य पालन संबंधी इनपुट के लिए भारत की अमेरिका पर निर्भरता प्रभावी रूप से समाप्त हो सके।(पैरा 4.57)
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समिति का मत है कि आधुनिक प्रसंस्करण सुविधाओं, परीक्षण प्रयोगशालाओं, मछली पालन और प्रमाणन में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता है। समिति का यह भी विचार है कि कछुआ निरोधक उपकरणों (टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइसेस) के राष्ट्रव्यापी कार्यान्वयन में तेजी लाने के प्रयास किए जाने चाहिए। समिति का मानना है कि विभाग को लक्षित प्रचार अभियानों के माध्यम से अन्य बाजारों में निर्यात बढ़ाने और झींगा की घरेलू खपत बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इससे निर्यात में होने वाली कमी को पूरा किया जा सकेगा, जो अन्यथा किसानों को झींगा पालन और उत्पादन से हतोत्साहित कर सकती है, जिससे संबंधित क्षेत्रों में पूरी श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। (पैरा 4.58)
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समिति सिफारिश करती है कि विभाग को आईसीएआर-सीआईएफटी द्वारा विकसित कछुआ निरोधक उपकरणों (टीईडी) को सभी मशीनीकृत ट्रॉलरों में अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए जल्दी सब्सिडी देनी चाहिए और इसे लागू करना चाहिए ताकि अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) से प्रमाणन प्राप्त हो सके। इससे भारतीय जंगली झींगा पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध को समाप्त किया जा सकेगा और खोई हुई बाजार हिस्सेदारी को पुनः प्राप्त किया जा सकेगा।(पैरा 4.59)
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समिति का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए तकनीकी वस्त्र, मानव निर्मित फाइबर उत्पाद, संधारणीय वस्त्र, घरेलू साज-सज्जा और उच्च मूल्य वाले परिधानों की ओर अधिक विविधीकरण आवश्यक होगा। समिति ने इस क्षेत्र के आधुनिकीकरण और उत्पादकता को मजबूत करने के लिए पीएम मित्रा पार्क, पीएलआई योजना और समर्थ योजना जैसी पहलों के तेजी से कार्यान्वयन की आवश्यकता पर भी ध्यान दिया। समिति वस्त्र मंत्रालय को कपास पर निर्भरता कम करने के लिए नए पीएम मित्रा पार्कों के भीतर विशेष मानव निर्मित फाइबर (एमएमएफ) विनिर्माण क्लस्टर स्थापित करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि इस पहल का उद्देश्य लघु एवं मध्यम उद्यमों को सिंथेटिक सामग्रियों तक तत्काल, स्थानीय पहुंच प्रदान करना और उत्पादन को उच्च वैश्विक मांग के अनुरूप बनाना है।(पैरा 4.69)
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समिति का मानना है कि सरकार को आरओडीटीईपी, आरओएससीटीएल, ब्याज समतुल्यकरण योजना और अन्य निर्यात प्रोत्साहन उपायों के तहत समर्थन को मजबूत करना चाहिए। समिति का मानना है कि रियायती कार्यशील पूंजी, निर्यात ऋण, ऋण गारंटी कवर और वित्तीय सहायता के त्वरित वितरण के माध्यम से एमएसएमई के लिए नकदी सहायता अवश्य ही बढ़ाई जानी चाहिए। समिति का मानना है कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों को निर्यात ऋण की समय पर स्वीकृति सुनिश्चित करनी चाहिए और शुल्क संबंधी व्यवधानों के कारण अस्थायी तनाव का सामना कर रहे सक्षम निर्यातकों को पर्याप्त सहायता प्रदान करनी चाहिए। समिति आग्रह करती है कि सरकार तकनीकी वस्त्रों, मानव निर्मित फाइबर उत्पादों, संधारणीय वस्त्रों और मूल्यवर्धित परिधानों को बढ़ावा देने के प्रयासों को तेज करे।(पैरा 4.70)
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समिति ने एक ऐसी योजना स्थापित करने की संभावना तलाशने की सिफारिश की है जिसका उद्देश्य अमेरिकी खरीदारों द्वारा कीमतों में की गई कटौती के लिए एमएसएमई कपड़ा निर्यातकों को मुआवजा देने हेतु आरओएससीटीएल योजना के तहत एक आपातकालीन राहत कार्यक्रम बनाना है। समिति का मानना है कि यह उपाय संकट के दौरान वित्तीय सहायता प्रदान करके व्यवसायों को बंद होने से रोकने और संभावित रूप से रोजगार की हानि को रोकने का प्रयास करता है। (पैरा 4.71)
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समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय को उद्योग निकायों के साथ साझेदारी करके अमेरिका के प्रमुख शिपिंग प्रवेश बिंदुओं के भीतर सरकारी सब्सिडी वाले वस्त्र भंडारण केंद्र स्थापित करने चाहिए। समिति का मानना है कि अमेरिका में स्थानीय स्तर पर बिक्री के लिए तैयार माल का भंडारण करके और भारतीय बंदरगाहों पर ग्रीन-चैनल फास्ट कस्टम कॉरिडोर स्थापित करके, भारतीय निर्यातक अपने प्रदायगी के लंबे समय को काफी कम कर सकते हैं, बिचौलियों की भारी कीमत मांगों से बच सकते हैं और वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की आक्रामक टर्नअराउंड गति का सफलतापूर्वक मुकाबला कर सकते हैं।(पैरा 4.72)
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समिति को इस बात की चिंता है कि अमेरिकी बाजार में उच्च शुल्क और घटती मांग से कारीगरों की आय और रोजगार में काफी कमी आ सकती है, जबकि तुर्की, पाकिस्तान, नेपाल और चीन जैसे प्रतिस्पर्धी आपूर्तिकर्ताओं को अपना बाजार हिस्सा बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। इसलिए, समिति की सिफारिश है कि व्यापार मेलों, ब्रांडिंग, भौगोलिक संकेत (जीआई) प्रचार, क्रेता-विक्रेता बैठकों और डिजाइन विकास के माध्यम से कालीन निर्यातकों को पर्याप्त विपणन सहायता प्रदान की जाए।(पैरा 4.73)
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समिति को चिंता है कि लंबे समय तक शुल्क की अनिश्चितता पारंपरिक बुनाई समुदायों और लघु एवं मध्यम उद्यम निर्यातकों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है। इसलिए समिति अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों, ब्रांडिंग, जीआई प्रमोशन, डिजिटल मार्केटिंग, उत्पाद विविधीकरण, डिजाइन नवाचार और हथकरघा उत्पादों के निर्यात प्रोत्साहन के लिए अधिक सहायता प्रदान करने की सिफारिश करती है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि गुणवत्ता में सुधार और नए बाजारों में निर्यात विस्तार के लिए पारंपरिक बुनाई समूहों को भी सहायता प्रदान की जानी चाहिए।(पैरा 4.74)
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समिति सिफारिश करती है कि विभाग कारीगरों के कल्याण, क्लस्टर अवसंरचना, ब्रांडिंग, जीआई उत्पादों, डिजिटल वाणिज्य, प्रत्यक्ष निर्यात प्लेटफार्मों, डिजाइन विकास, उत्पाद नवाचार और अंतरराष्ट्रीय विपणन के विस्तार के लिए समन्वित उपाय करे ताकि भारत की पारंपरिक शिल्पकला वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनी रहे और साथ ही देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत संरक्षित रहे। (पैरा 4.75)
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विज्ञान और तकनीक में प्रगति के साथ, तकनीक-आधारित प्रथाओं और सटीक कृषि को अपनाने की सलाह दी जा रही है। हालांकि, इसे भारतीय कृषि की जमीन पर स्थित वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए अपनाया जाना चाहिए, खासकर बड़े और बहुत सारे छोटे और सीमांत किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए। इसलिए, समिति की सिफारिश है कि भारत-अमेरिका कृषि संबंधों, कृषि उत्पादों और कृषि-आधारित उत्पादों के संदर्भ में, भारतीय किसानों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय लागू किए जाएं, जो देश की कुल कृषि स्थिति और किसानों की समग्र आर्थिक स्थिति के अनुरूप हों। (पैरा 4.80)
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समिति का मत है कि विभाग आधुनिक परीक्षण प्रयोगशालाओं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रमाणन सुविधाओं, डिजिटल ट्रेसिबिलिटी सिस्टम, अवशेष निगरानी प्रयोगशालाओं और एकीकृत कोल्ड-चेन अवसंरचना की स्थापना के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण अवसंरचना विकसित करे। समिति आगे सिफारिश करती है कि प्रीमियम बाजारों में भारतीय कृषि उत्पादों की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए अच्छी कृषि पद्धतियों (जीएपी), अवशेष-मुक्त खेती और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत खाद्य सुरक्षा मानकों को बढ़ावा दिया जाए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि विभाग को अमेरिकी सीमा शुल्क और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) के साथ पूर्व-मंजूरी प्रोटोकॉल बनाने की संभावना तलाशनी चाहिए, ताकि सभी प्रमुख कृषि खेपों की भारतीय बंदरगाहों पर पूर्व-जांच सुनिश्चित की जा सके। इससे अमेरिकी सीमाओं पर खाद्य सुरक्षा अस्वीकृति की उच्च दर को समाप्त करने और निर्यातकों को होने वाले भारी वित्तीय नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी।(पैरा 4.81)
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समिति जैविक कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम (एनपीओपी) के तहत प्रमाणन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और हितधारकों के परामर्श से यूएसडीए राष्ट्रीय जैविक कार्यक्रम (एनओपी) लेनदेन प्रमाणपत्रों से संबंधित प्रक्रियात्मक मुद्दों को संबोधित करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि जैविक समूहों, अवशेष-मुक्त खेती और जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण को बढ़ावा देने के लिए भी सहायता प्रदान की जानी चाहिए। समिति का मानना है कि विभाग और एपीडा को अमेरिकी बाजार में राजनयिक रक्षा तंत्र अपनाना चाहिए ताकि बासमती चावल जैसे विशिष्ट भारतीय भौगोलिक संकेत (जीआई) उत्पादों को वैश्विक प्रतिस्पर्धियों द्वारा भ्रामक स्थानीय ब्रांडिंग से बचाया जा सके और इस प्रकार भारत की प्रीमियम मूल्य निर्धारण शक्ति को संरक्षित किया जा सके।(पैरा 4.82)
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समिति सिफारिश करती है कि भारत एक कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था है और उसे ऐसी नीतियों की जरूरत है जो कृषि और कृषि आधारित उद्योगों का पर्याप्त समर्थन करें। समिति सिफ़ारिश करती है कि वित्तीय संस्थान और बैंक ऋण प्रवाह, ग्रामीण भंडारण, एकीकृत पैकेजिंग गृह, खाद्य प्रसंस्करण अवसंरचना, किसान उत्पादक संगठनों और कृषि-रसद को मज़बूत करके निर्यात-उन्मुख कृषि को और अधिक समर्थन दें। इसके अलावा, समिति का मानना है कि निर्यात-उन्मुख फसल किस्मों को विकसित करने, उत्पादकता में सुधार करने और वैश्विक कृषि बाज़ारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को मज़बूत करने के लिए आईसीएआर, कृषि विश्वविद्यालयों, एपीईडीए और उद्योग के बीच अधिक सहयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। समिति यह भी सिफ़ारिश करती है कि कृषि मंत्रालय को प्रमुख निर्यात कार्गो हब के पास स्वचालित विकिरण और वाष्प ताप उपचार (वीएचटी) सुविधाओं के लिए वित्तपोषण करना चाहिए और उन्हें स्थापित करना चाहिए ताकि ताजे फलों और सब्जियों के लिए अमेरिका के सख्त पादप स्वच्छता आयात जनादेश का पालन सुनिश्चित किया जा सके। (पैरा 4.83)
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समिति का मत है कि उन्नत पर्यावरण नियंत्रण प्रणालियों और उभरती कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित प्रौद्योगिकियों से सुसज्जित त्वरित प्रजनन और तीव्र उत्पादन विकास (आरजीए) सुविधाओं की स्थापना फसल प्रजनन में तेजी लाने और सटीक खेती को बेहतर बनाने के लिए समय की आवश्यकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि विभाग उच्च उपज देने वाली, जलवायु-प्रतिरोधी और कीट-प्रतिरोधी फसल किस्मों के विकास में तेजी लाने के लिए प्रमुख कृषि अनुसंधान संस्थानों में ऐसी अत्याधुनिक सुविधाओं की स्थापना करे और उन्हें सुदृढ़ करे।(पैरा 4.86)
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समिति का मानना है कि इस प्रकार के बुनियादी ढांचे के विकास से प्रजनन चक्र में काफी कमी आएगी, शोधकर्ताओं को कम समय में बेहतर फसल किस्में विकसित करने में मदद मिलेगी और किसानों को उन्नत बीज समय पर उपलब्ध हो सकेंगे। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि देश भर में विभिन्न क्षेत्रों की विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, चरणबद्ध तरीके से क्षेत्रीय आधार पर त्वरित प्रजनन और तीव्र उत्पादन विकास (आरजीए) सुविधाओं की स्थापना के लिए एक व्यापक योजना पर विचार किया जाए।(पैरा 4.87)
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समिति भौगोलिक संकेत (जीआई) उत्पादों, जिला-विशिष्ट कृषि उत्पादों और ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ओडीओपी) पहलों को लक्षित ब्रांडिंग, अंतरराष्ट्रीय प्रचार और समर्पित निर्यात सुविधा के माध्यम से बढ़ावा देने की सिफारिश भी करती है। समिति का मानना है कि प्रीमियम विदेशी बाजारों में भारतीय मसालों, बासमती चावल, शहद, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, जैविक उत्पादों और बागवानी उत्पादों की ब्रांडिंग के लिए भी अधिक समर्थन दिया जाना चाहिए। (पैरा 4.88)
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समिति यह भी सिफारिश करती है कि सरकार वाणिज्य विभाग के अंतर्गत एपीईडीए, आईसीएआर, नाबार्ड और राज्य सरकारों के समन्वय से एक स्थायी ‘कृषि व्यापार सुविधा प्रकोष्ठ’ की स्थापना करे, जिसका उद्देश्य शुल्क संबंधी बाधाओं, एसपीएस मुद्दों, अवशेष मानकों, रसद संबंधी अड़चनों और उभरते बाजार अवसरों की निगरानी करना हो।(पैरा 4.89)
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समिति का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय निर्यात को बेहतर बनाने के लिए प्रीमियम फुटवियर, ब्रांडेड चमड़े के सामान, फैशन एक्सेसरीज, स्पोर्ट्स फुटवियर, सेफ्टी फुटवियर और उच्च श्रेणी के चमड़े के उत्पादों के उत्पादन पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए। समिति यह भी मानती है कि डिजाइन, उत्पाद विकास और शिल्प कौशल में भारत की क्षमताएं उच्च मूल्य वाले निर्यात की ओर बढ़ने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती हैं।(पैरा 4.99)
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इसके अलावा, समिति ने उन्नत विनिर्माण प्रक्रियाओं में श्रमिकों को कुशल बनाने और उनके कौशल को बढ़ाने के लिए चमड़ा क्षेत्र कौशल परिषद (एलएसएससी) द्वारा की गई पहलों को नोट किया। समिति का मानना है कि उत्पादकता, उत्पाद की गुणवत्ता और विनिर्माण दक्षता में सुधार लाने के लिए स्वचालन, सीएडी/कैम सिस्टम, रोबोटिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल उत्पाद विकास, 3डी प्रिंटिंग और स्मार्ट विनिर्माण प्रौद्योगिकियों को अधिक से अधिक अपनाना आवश्यक होगा।(पैरा 4.100)
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समिति इस तथ्य को नोट करती है कि चमड़ा उद्योग में, यूरोप जैसे विकसित देशों में बाजार पहुंच के लिए पर्यावरणीय स्थिरता एक महत्वपूर्ण कारक बन गई है। समिति नोट करती है कि खरीदार पर्यावरण संरक्षण, कार्बन फुटप्रिंट, ट्रेसबिलिटी, अपशिष्ट जल उपचार और जिम्मेदार सोर्सिंग से संबंधित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानकों के अनुपालन की मांग कर रहे हैं। समिति ने सामान्य अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र (सीईटीपी) की स्थापना, ‘शून्य तरल निकासी प्रणाली’ अपनाने और पर्यावरण के अनुकूल चमड़ा प्रसंस्करण को बढ़ावा देने में उद्योग द्वारा किए गए प्रयासों की सराहना की। समिति आग्रह करती है कि प्रीमियम बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त स्थिरता प्रमाणन के साथ हरित विनिर्माण प्रौद्योगिकियों में निरंतर निवेश आवश्यक होगा। समिति ने सिफारिश की है कि विभाग को हरित विनिर्माण संसाधनों का दोहन करने और हितधारकों को जागरूक करने के प्रयास करने चाहिए।(पैरा 4.101)
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समिति ने पाया है कि चमड़ा और जूता क्षेत्र में 'मेक इन इंडिया', 'आत्मनिर्भर भारत' और रोजगार-आधारित विनिर्माण विकास के उद्देश्यों में योगदान देने की अपार क्षमता है। समिति का मानना है कि उचित नीतिगत समर्थन, बेहतर बाजार पहुंच, प्रौद्योगिकी अपनाने, निवेश प्रोत्साहन और मूल्यवर्धन बढ़ाने से भारत वैश्विक चमड़ा और जूता बाजार में अपनी हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकता है और दुनिया के प्रमुख निर्यात केंद्रों में से एक के रूप में उभर सकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि चमड़ा, चमड़ा उत्पादों और जूतों के लिए तरजीही या शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच सुनिश्चित करने के प्रयास किए जाएं ताकि अमेरिकी बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बहाल किया जा सके। इसके अलावा, निर्यातकों को निर्यात ऋण, ब्याज समतुल्यीकरण, कार्यशील पूंजी सहायता, निर्यात ऋण गारंटी और अन्य व्यापार सुगमता उपायों के माध्यम से लक्षित राहत प्रदान की जा सकती है, विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए। समिति का मानना है कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अस्थायी व्यापार व्यवधानों से प्रभावित सक्षम निर्यातकों को समय पर किफायती वित्त उपलब्ध हो।(पैरा 4.104)
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समिति अनुसंधान एवं विकास, स्वचालन, उद्योग 4.0 प्रौद्योगिकियों, रोबोटिक्स, सीएडी/कैम सिस्टम, डिजिटल उत्पाद विकास और उन्नत विनिर्माण प्रक्रियाओं में निवेश की सिफारिश करती है। इसके अलावा, समिति का मानना है कि चमड़ा संस्थानों को उच्च कुशल कार्यबल तैयार करने के लिए उद्योग-उन्मुख कौशल विकास कार्यक्रमों को मजबूत करना चाहिए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि चमड़ा संस्थानों को टिकाऊ सिंथेटिक पॉलिमर और पर्यावरण के अनुकूल गैर-चमड़ा उत्पाद निर्माण पर विशेष तकनीकी मॉड्यूल शुरू करने चाहिए, ताकि कौशल पारिस्थितिकी तंत्र को एथलेटिक और कैजुअल गैर-चमड़ा जूतों की भारी अमेरिकी मांग के अनुरूप बनाया जा सके।(पैरा 4.105)
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समिति आगे यह सिफारिश करती है कि विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास, चमड़ा परिषदों, निर्यात और उद्योग संघों के समन्वय से, क्रेता-विक्रेता बैठकों, व्यापार मेलों, व्यापार प्रतिनिधिमंडलों और निवेश प्रोत्साहन गतिविधियों को सक्रिय रूप से सुगम बनाएं। समिति यह भी सिफारिश करती है कि निर्यातकों को यूरोप, यूनाइटेड किंगडम, जापान, ऑस्ट्रेलिया, खाड़ी क्षेत्र, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में अपनी उपस्थिति बढ़ाने में सहायता प्रदान की जानी चाहिए ताकि निर्यात गंतव्यों में विविधता लाई जा सके। (पैरा 4.106)
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समिति लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को परीक्षण सुविधाओं, गुणवत्ता प्रमाणन, डिजिटल वाणिज्य प्लेटफार्मों और अंतरराष्ट्रीय अनुपालन मानकों तक आसान पहुंच प्रदान करके समर्थन को मजबूत करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि छोटे निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार के लिए क्लस्टर-आधारित बुनियादी ढांचे, साझा सुविधा केंद्रों और रसद सहायता का भी विस्तार किया जाना चाहिए।(पैरा 4.107)
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समिति आगे सिफारिश करती है कि संबंधित परिषद और अन्य हितधारकों के परामर्श से एक समर्पित तंत्र स्थापित किया जाए, ताकि अंतरराष्ट्रीय टैरिफ उपायों, गैर-टैरिफ बाधाओं और बदलते उपभोक्ता प्राथमिकताओं की निरंतर निगरानी की जा सके, जिससे समय पर नीतिगत हस्तक्षेप संभव हो सके और वैश्विक चमड़ा और जूता उद्योग में भारत की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत किया जा सके।(पैरा 4.108)
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समिति का मानना है कि रासायनिक क्षेत्र में भारत की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता अनुसंधान और विकास, नवाचार, उन्नत विनिर्माण और उच्च मूल्य वाले विशिष्ट रसायनों के विकास में निरंतर निवेश पर निर्भर करेगी। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार प्रस्तावित भारत-संयुक्त राज्य अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के अंतर्गत रासायनिक और पेट्रोरसायन उत्पादों से संबंधित शुल्क संबंधी मुद्दों के समाधान को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। समिति यह भी सिफारिश करती है कि निरंतर द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करते हुए भारतीय रासायनिक निर्यात के लिए स्थिर और पूर्वानुमानित बाजार पहुंच सुनिश्चित करने के प्रयास किए जाएं।(पैरा 4.123)
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समिति सिफारिश करती है कि भारतीय पेट्रोरसायन और एग्रोरसायन के निर्यात में भारी गिरावट आई है, इसलिए अमेरिका के साथ रसायनों के व्यापार में होने वाले 7,580 करोड़ रुपये के अधिशेष का लाभ उठाकर इन पर कम टैरिफ लगाने के लिए रणनीतिक रूप से बातचीत की जाए। समिति ने यह भी सिफारिश की है कि व्यापार नीति मंच (टीपीएफ) के तहत एक औपचारिक, उच्च-स्तरीय संस्थागत तंत्र स्थापित किया जाए ताकि बाजार तक निश्चित पहुंच सुनिश्चित हो सके और भविष्य में अचानक टैरिफ वृद्धि को रोका जा सके।(पैरा 4.124)
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समिति आगे सिफारिश करती है कि सरकार विशेष रसायनों, प्रदर्शन रसायनों, हरित रसायनों और उच्च मूल्य वाले मध्यवर्ती रसायनों को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार करे, जिसमें अनुसंधान एवं विकास, नवाचार और प्रौद्योगिकी उन्नयन पर विशेष जोर दिया जाए। समिति का मानना है निर्यात की अधिक क्षमता वाले उच्च मूल्य वाले रासायनिक उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय प्रोत्साहनों पर भी विचार किया जा सकता है। (पैरा 4.125)
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समिति समर्पित रासायनिक लॉजिस्टिक्स अवसंरचना के निर्माण की भी सिफारिश करती है, जिसमें रासायनिक पार्क और विशेष भंडारण टर्मिनल शामिल हैं। समिति निर्यात संवर्धन मिशन के तहत प्रस्तावित विदेशी भंडारण और पूर्ति केंद्रों के शीघ्र कार्यान्वयन की भी सिफारिश करती है ताकि प्रमुख निर्यात बाजारों में समय पर डिलीवरी सुनिश्चित की जा सके और ग्राहक सेवा में सुधार किया जा सके।(पैरा 4.126)
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समिति भारत के आवश्यक तेल क्षेत्र के लिए एक सख्त संरक्षण ढांचा बनाने की सिफारिश करती है, जिसका वैश्विक बाजार में 85% हिस्सा है। समिति का मानना है कि सरकार को वैश्विक बाजार में नकली उत्पादों को रोकने के लिए गुणवत्ता जांच और जीआई टैगिंग लागू करने हेतु एक राष्ट्रीय आवश्यक तेल उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करना चाहिए। समिति आगे सिफारिश करती है कि लक्षित ब्रांड-निर्माण अभियानों को बाजार पहुंच पहल (एमएआई) योजना के माध्यम से वित्त पोषित किया जाना चाहिए ताकि भारतीय आवश्यक तेल निर्यात को कच्चे थोक शिपमेंट से हटाकर वैश्विक सौंदर्य प्रसाधन, चिकित्सा और स्वाद उद्योगों के लिए उच्च लाभ वाले, खुदरा बिक्री के लिए तैयार उत्पादों की ओर मोड़ा जा सके। (पैरा 4.127)
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समिति का मत है कि लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) निर्यातकों को निर्यात ऋण तक आसान पहुंच, ब्याज दर में समानता, कार्यशील पूंजी सहायता, निर्यात ऋण गारंटी, गुणवत्ता प्रमाणन सहायता और विदेशी उत्पाद पंजीकरण सहायता के माध्यम से अधिक समर्थन दिया जाना चाहिए। समिति नोट करती है कि भारत के निर्यात आधार को व्यापक बनाने के लिए, पहली बार निर्यात करने वाले उद्यमों और निर्यात केंद्रों के रूप में विकसित जिलों में स्थित उद्यमों को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए। (पैरा 4.128)
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समिति लघु एमएसएमई कारखानों को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और उत्पाद पंजीकरण की उच्च लागतों को वहन करने में सहायता के लिए एक वित्तीय योजना बनाने की सिफारिश करती है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि ‘निर्यात प्रोत्साहन मिशन’ के तहत नियोजित विदेशी गोदामों में विशेष, तापमान-नियंत्रित भंडारण इकाइयां शामिल होनी चाहिए जो खतरनाक रसायनों के लिए सुरक्षित हों, जिससे छोटे भारतीय निर्यातकों को वैश्विक खरीदारों तक माल की तेजी से डिलीवरी करने में मदद मिलेगी। (पैरा 4.129)
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समिति पर्यावरण के अनुकूल विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए हरित रसायन विज्ञान, संसाधन-कुशल उत्पादन प्रक्रियाओं, अपशिष्ट पुनर्चक्रण, चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रथाओं, नवीकरणीय ऊर्जा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त पर्यावरण प्रमाणपत्रों को प्रोत्साहित करने की भी सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि विदेशी निवेश आकर्षित करने, घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने और भारतीय उद्यमों को वैश्विक रासायनिक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत करने पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, समिति का यह मत है कि रासायनिक उत्पादों के एक विश्वसनीय वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ब्रांडिंग, गुणवत्ता आश्वासन, डिजिटल व्यापार सुविधा और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुपालन पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए। (पैरा 4.130)
माल एवं सेवा व्यापार
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समिति को यह भी सूचित किया गया है कि निर्यात मांग में अनिश्चितता, मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव (1 यूएसडी लगभग 95 भारतीय रूपया [अगस्त 2026 के अनुसार]) और वस्तु कीमतों में फ्लक्चुएशन मिलकर लागत बढ़ाते हैं और निर्यातकों के लिए कठिनाइयाँ पैदा करते हैं। समिति आगे यह नोट करती है कि जबकि कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की अंतर्राष्ट्रीय कीमतें पिछले कुछ वर्षों में घटती रही हैं, वहीँ भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस सहित सीएनजी और एलपीजी की घरेलू कीमतें उसी अवधि में लगातार बढ़ती रही हैं। यह अंतर भारत के वाणिज्य और कुल अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रहा है। समिति यह भी देखती है कि अमेरिकी टैरिफ, जिसे कुछ महीने पहले काफी बढ़ा दिया गया था और बाद में कुछ हद तक घटा दिया गया, अभी भी 18% पर है। यह पहले की 3% दर की तुलना में काफी ज्यादा है। यह उच्च टैरिफ व्यवस्था भारत के निर्यात और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालती रहती है।(पैरा 5.12)
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समिति की सिफारिश है कि हमें इन कारकों को ध्यान से ध्यान में रखते हुए अपने भारत-यूएस व्यापार संबंधों पर फिर से विचार करना और समीक्षा करनी चाहिए, और इन मामलों में समान अवसर का भी होना चाहिए। (पैरा 5.13)
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समिति भारत-यूएस साझेदारी को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर मानती है ताकि वह एक विश्वसनीय वैश्विक निर्माण और आपूर्ति श्रृंखला केंद्र के रूप में उभर सके। समिति सिफारिश करती है कि 'मेक इन इंडिया', 'प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम्स', 'नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी', 'पीएम गति शक्ति', और भारत की निर्माण प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने वाले अन्य उपायों जैसी पहलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। समिति का मानना है कि ये पहलें वैश्विक कंपनियों की भारत के निर्माण क्षेत्र में अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करेंगी।(पैरा 5.14)
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द्विपक्षीय व्यापार में वृद्धि के बावजूद, कई चुनौतियाँ इसकी पूरी क्षमता को सीमित करती रहती हैं, जैसे कि शुल्क और गैर-शुल्क बाधाएँ, जटिल नियामक आवश्यकताएँ, उत्पाद मानक, रसद लागत, सीमा शुल्क प्रक्रियाएँ, बाजार पहुँच संबंधी प्रतिबंध, अनुपालन लागत और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में लघु एवं मध्यम उद्यमों की सीमित भागीदारी।(पैरा 5.15)
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समिति का यह मत है कि इन संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करने से भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और द्विपक्षीय व्यापार में अधिक संतुलित और टिकाऊ विकास को बढ़ावा मिलेगा। समिति यह भी मानती है कि यद्यपि भारत ने अपने निर्यात उत्पादों में काफी विविधता हासिल कर ली है, फिर भी उच्च मूल्य वाले विनिर्मित वस्तुओं और प्रौद्योगिकी-प्रधान उत्पादों के निर्यात को बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं, साथ ही साथ सेवाओं के निर्यात को मजबूत करना और कुछ ही बाजारों और उत्पाद श्रेणियों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना भी जरूरी है।(पैरा 5.16)
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समिति उन क्षेत्रों को निरंतर नीतिगत समर्थन देने की सिफारिश करती है जो प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं और जिन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका में मजबूत निर्यात क्षमता प्रदर्शित की है, जिनमें इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, रत्न और आभूषण, वस्त्र, समुद्री उत्पाद, कृषि और चमड़ा शामिल हैं। समिति का यह भी मानना है कि डिजिटल व्यापार, वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी), कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, फिनटेक, इंजीनियरिंग सेवाओं और अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देकर सेवाओं के निर्यात के वैश्विक केंद्र के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत करने के लिए एक व्यापक रणनीति आवश्यक है। समिति का मानना है कि भारत की ज्ञान अर्थव्यवस्था को मजबूत करने से दीर्घकालिक निर्यात वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा। (पैरा 5.17)
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समिति का मत है कि द्विपक्षीय व्यापार में लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की अधिक भागीदारी को सुगम बनाने के लिए विशेष नीतिगत हस्तक्षेप शुरू किए जाएं। इसके लिए निर्यात वित्त, डिजिटल प्लेटफॉर्म, गुणवत्ता प्रमाणीकरण, अंतरराष्ट्रीय विपणन सहायता, कौशल विकास और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकरण जैसी सुविधाओं तक बेहतर पहुंच प्रदान की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त, समिति का मानना है कि क्षेत्र-विशिष्ट व्यापार मिशनों, बेहतर बाजार सूचना और विदेशों में भारतीय दूतावासों के साथ घनिष्ठ संपर्क के माध्यम से वाणिज्यिक कूटनीति को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि उभरते अवसरों की पहचान की जा सके, बाजार पहुंच संबंधी मुद्दों का समाधान किया जा सके और संयुक्त राज्य अमेरिका तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों और सेवाओं को बढ़ावा दिया जा सके। (पैरा 5.18)
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समिति करती सिफारिश है कि सरकार रसद लागत, बुनियादी ढांचे की कमियों, नियामक अनुपालन और किफायती वित्त तक पहुंच से संबंधित संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करके भारत को एक पसंदीदा वैश्विक विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला केंद्र के रूप में स्थापित करने के प्रयासों को तेज कर सकती है। रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा सकता है। (पैरा 5.19)
निवेश संबंध
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समिति की सिफारिश है कि उन्नत विनिर्माण, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वच्छ ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, रक्षा उत्पादन, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल अवसंरचना जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय निवेश को आकर्षित करने के लिए निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए। समिति का मानना है नियामक बाधाओं को दूर करने, निवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाने, नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित करने और पारस्परिक रूप से लाभकारी द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) को शीघ्रता से लागू करने के प्रयासों को तेज किया जाना चाहिए ताकि निवेशकों का विश्वास बढ़े और द्विपक्षीय निवेश सहयोग की पूरी क्षमता का दोहन हो सके। (पैरा 6.4)
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समिति आगे यह सिफारिश करती है कि भारतीय और अमेरिकी उद्यमों, शैक्षणिक संस्थानों और अनुसंधान संगठनों के बीच अधिक साझेदारी के माध्यम से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सहयोगात्मक अनुसंधान और विकास, नवाचार और कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए द्विपक्षीय निवेश को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे निवेश प्रवाह के दीर्घकालिक विकासात्मक लाभों को अधिकतम किया जा सके। (पैरा 6.5)
संस्थागत ढांचा और समझौते
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समिति सिफारिश करती है कि कृषि, मत्स्य पालन, खाद्य सुरक्षा और सेवा क्षेत्र में अपने विकासात्मक हितों की रक्षा के लिए विभाग को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) वार्ताओं में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। समिति आगे सिफारिश करती है कि भारत को पारदर्शी और पूर्वानुमानित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को मजबूत करने के लिए समान विचारधारा वाले डब्ल्यूटीओ सदस्यों के साथ मिलकर काम करना जारी रखना चाहिए, साथ ही विकासशील देशों के हितों और चिंताओं को उचित रूप से प्रतिबिंबित करने वाले सुधारों की वकालत करनी चाहिए। (पैरा 7.3)
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समिति सिफारिश करती है कि भारतीय निर्यात को प्रभावित करने वाली लंबे समय से लंबित बाजार पहुंच संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए व्यापार नीति मंच का अधिक सक्रिय रूप से उपयोग किया जाए और यह सुनिश्चित करने के लिए कि व्यापार वार्ता में हितधारकों की चिंताओं का पर्याप्त रूप से समाधान हो, परामर्श प्रक्रिया में उद्योग संघों, लघु एवं मध्यम उद्यमों, निर्यात प्रोत्साहन परिषदों और क्षेत्रीय विशेषज्ञों के प्रतिनिधित्व को शामिल किया जाए। समिति आगे सिफारिश करती है कि व्यापार नीति मंच को व्यापार संबंधी मुद्दों के समाधान की समीक्षा और निगरानी के लिए एक समयबद्ध तंत्र अपनाना चाहिए, जिसमें विभिन्न क्षेत्रीय कार्य समूहों के तहत हुई प्रगति का समय-समय पर मूल्यांकन किया जाए। (पैरा 7.5)
व्यापार संबंधों में प्रमुख चुनौतियाँ
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समिति नोट करती है कि यद्यपि दोनों देशों ने व्यापार संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए भारत-अमेरिका व्यापार नीति मंच और वाणिज्यिक संवाद जैसे संस्थागत तंत्र स्थापित किए हैं, फिर भी बाजार पहुंच से संबंधित कई मुद्दे अनसुलझे हैं। समिति का मानना है कि शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं की निरंतरता द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंधों की पूर्ण क्षमता को सीमित कर सकती है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब दोनों देशों ने "मिशन 500" पहल के तहत 2030 तक 500 अरब अमेरिकी डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। (पैरा 8.3)
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समिति सिफारिश करती है कि सरकार व्यापार विवादों के समाधान हेतु संवाद, परामर्श और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधानों के माध्यम से संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ सक्रिय रूप से बातचीत जारी रखे। समिति का मानना है कि विवाद समाधान के लिए संस्थागत तंत्रों को सुदृढ़ करने और यह सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा सकते हैं कि क्षेत्र-विशिष्ट चिंताओं को समय पर उठाया जाए। समिति आगे सिफारिश करती है कि गुणवत्ता मानकों, एसपीएस उपायों, प्रमाणन आवश्यकताओं, लेबलिंग मानदंडों और सीमा शुल्क अनुपालन प्रक्रियाओं सहित गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने पर विशेष जोर दिया जाए, जहां भी संभव हो, नियामक सहयोग को बढ़ाकर और मानकों तथा अनुरूपता मूल्यांकन प्रक्रियाओं की पारस्परिक मान्यता के माध्यम से, ताकि भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से एमएसएमई के लिए अनुपालन लागत को कम किया जा सके। (पैरा 8.4)
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में सहयोग के उभरते क्षेत्र
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समिति ‘महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पहल (आईसीईटी)’ पहल और यूएस-इंडिया कॉम्पैक्ट फ्रेमवर्क को नोट करती है जिनमें डिजिटल प्रौद्योगिकियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत संचार, क्वांटम प्रौद्योगिकियों और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्रों को प्रमुख सहयोग क्षेत्रों के रूप में स्वीकार किया गया है। इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से आर्थिक विकास, तकनीकी उन्नति, कौशल विकास और उच्च-मूल्य वाले रोजगार के अवसरों के सृजन में योगदान मिलने की उम्मीद है। समिति सिफारिश करती है कि नवाचार को बढ़ावा देने और डिजिटल प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए स्टार्टअप, अनुसंधान संस्थानों और प्रौद्योगिकी कंपनियों के बीच अधिक सहयोग को सुगम बनाने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए। (पैरा 9.4)
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समिति आगे यह सिफारिश करती है कि लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को प्रौद्योगिकी, डिजिटल अवसंरचना, नवाचार समर्थन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के अवसरों तक बेहतर पहुंच प्रदान करके भारत-अमेरिका डिजिटल प्रौद्योगिकी साझेदारी में भाग लेने में सक्षम बनाने के लिए समर्पित पहल की जाए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए सुसज्जित कार्यबल विकसित करने हेतु संयुक्त क्षमता निर्माण और उन्नत डिजिटल कौशल विकास कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाए।(पैरा 9.5)
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आरकेके
(रिलीज़ आईडी: 2295631)
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