राज्यसभा सचिवालय
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परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी विभागीय संसदीय स्थायी समिति की 387वीं, 388वीं, 389वीं, 390वीं और 391वीं रिपोर्टों पर प्रेस विज्ञप्ति

प्रविष्टि तिथि: 02 APR 2026 6:55PM by PIB Delhi

विभाग-संबंधित परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी संसदीय स्थायी समिति द्वारा श्री संजय कुमार झा, संसद सदस्य,  राज्य सभा की अध्यक्षता में बुधवार 25 मार्च, 2026 को 387वें से 391वें प्रतिवेदन  क्रमशः राज्य सभा एवं लोक सभा में प्रस्तुत किए गए /सभा पटल पर रखे गए। इन प्रतिवेदनों  को समिति द्वारा सोमवार, 23 मार्च 2026 को स्वीकार किया गया था। प्रतिवेदनों का विवरण निम्नानुसार है:-

क)      नागर विमानन मंत्रालय की अनुदान मांगों (2026-27) संबंधी तीन सौ सत्तासीवां प्रतिवेदन;

ख)      संस्कृति मंत्रालय की अनुदान मांगों (2026-27) संबंधी तीन सौ अठासीवां प्रतिवेदन;

ग)       पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय की अनुदान मांगों (2026-27) संबंधी तीन सौ नवासीवां प्रतिवेदन;

घ)       सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की अनुदान मांगों (2026-27) संबंधी तीन सौ नब्बेवां प्रतिवेदन; और

ङ)      पर्यटन मंत्रालय की अनुदान मांगों (2026-27) संबंधी तीन सौ इक्यानवेवाँ प्रतिवेदन।

2.        समिति ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए उपर्युक्त पाँच मंत्रालयों की अनुदान मांगों की जाँच की, संबंधित मंत्रालयों के प्रतिनिधियों के मौखिक साक्ष्य लिए और उनके द्वारा प्रस्तुत विस्तृत लिखित सामग्री का परीक्षण किया। समिति द्वारा इन प्रतिवेदनों को स्वीकार कर लिया गया। इन प्रतिवेदनों में अंतर्विष्ट मुख्य समुक्तियाँ/सिफारिशें संलग्न हैं।

मुख्य समुक्तियाँ/सिफारिशेंएक नज़र में

क. प्रतिवेदन संख्या 387:नागर विमानन मंत्रालय (मांग संख्या 8; 2,102.87 करोड़ रुपये)

(i) विमानन सुरक्षा पर स्वतंत्र उच्च स्तरीय समिति का गठन: नागर विमानन महानिदेशालय द्वारा 754 विमानों के लेखा परीक्षण में 377 विमानों (50%) में बार-बार दोष पाए गए। अहमदाबाद दुर्घटना (260 मृतक), एक वर्ष में लगभग 100 सुरक्षा चूकें तथा 19 सुरक्षा उल्लंघन नोटिस एक प्रणालीगत समस्या की ओर संकेत करते हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि विमानन सुरक्षा पर एक स्वतंत्र उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाए, जो समग्र सुरक्षा समीक्षा कर छह माह के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे। (पैरा 6.6.1–6.6.2)

(ii) उड़ान योजना का औपचारिक प्रभाव आकलन: आरसीएस-उड़ान योजना के अंतर्गत 657 मार्ग परिचालित किए जा चुके हैं तथा इस पर  9,200 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय हो चुका है। तथापि, मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (वीजीएफ) अवधि पूर्ण करने वाले मार्गों के लिए कोई संरचित निकास रणनीति उपलब्ध नहीं है। साथ ही, 150 से अधिक स्वीकृत मार्ग अभी तक प्रारंभ नहीं हो सके हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि योजना का एक स्वतंत्र एवं औपचारिक प्रभाव आकलन कराया जाए, जिसमें प्रति यात्री लागत, मार्ग-वार व्यवहार्यता तथा स्वयं-निर्भरता प्राप्त करने वाले मार्गों के अनुपात का सम्यक् विश्लेषण किया जाए। (पैरा 6.2.1–6.2.2)

(iii) नागर विमानन महानिदेशालय के लिए मानव संसाधन योजना: डीजीसीए में 1,630 स्वीकृत पदों के विरुद्ध केवल 843 कर्मी कार्यरत हैं, जो 48.3 प्रतिशत की रिक्ति दर है। समिति सिफ़ारिश करती है कि डीजीसीए एक समग्र एवं समयबद्ध भर्ती तथा प्रतिनियुक्ति योजना तैयार कर प्रस्तुत करे, ताकि रिक्त पदों को शीघ्र भरकर संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ किया जा सके। (पैरा 6.3.1–6.3.2)

(iv) वैधानिक यात्री अधिकार चार्टर:भारत में प्रतिवर्ष 350 मिलियन से अधिक यात्री हवाई यात्रा करते हैं, किन्तु अभी तक कोई वैधानिक यात्री अधिकार ढांचा उपलब्ध नहीं है। समिति सिफ़ारिश करती है कि भारतीय वायुयान अधिनियम 2024 के अंतर्गत एक औपचारिक यात्री अधिकार चार्टर विकसित किया जाए, जिसमें मुआवजा, देरी प्रबंधन तथा जवाबदेही मानकों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। (पैरा 6.6.5–6.6.6)

(v) भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) के पूंजीगत निवेश की संसदीय दृश्यता: एएआई ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में 20,648.25 करोड़ रुपये का राजस्व और 7,233.28 करोड़ रुपये का लाभ दर्ज किया है, किन्तु   4,699.92 करोड़ रुपये का इसका पूंजीगत निवेश, आंतरिक और अतिरिक्त बजटीय संसाधन के माध्यम से अनुदान मांगों का हिस्सा नहीं है। समिति सिफ़ारिश करती है कि एएआई के पूंजीगत निवेश कार्यक्रम की संसदीय निगरानी एवं दृश्यता को बढ़ाया जाए, ताकि इसके व्यय एवं निवेश का समुचित परीक्षण सुनिश्चित हो सके। (पैरा 6.2.9–6.2.10)

. प्रतिवेदन संख्या 388: संस्कृति मंत्रालय (मांग संख्या 18; 3,416.63 करोड़ रुपये)

(i) स्मारक संरक्षण हेतु टिकट राजस्व का पृथक्करण: केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों से प्राप्त टिकट राजस्व लगभग 365 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष है। वर्तमान में यह राजस्व सामान्य राजकोष में चला जाता है और संरक्षण कार्यों में पुनर्निवेश हेतु उपलब्ध नहीं होता। समिति सिफ़ारिश करती है कि इस राजस्व का एक भाग स्मारकों के संरक्षण, रखरखाव तथा आगंतुक सुविधाओं के विकास हेतु एक निर्धारित राजस्व तंत्र के माध्यम से पृथक् रखा जाए। (पैरा 1.9)

(ii) 16वें वित्त आयोग हेतु मांग-पत्र के साथ संस्थागत क्षमता का आकलन: मंत्रालय की अनुमानित मांग 5,219.97 करोड़ रुपये है, जो स्वीकृत आबंटन 3,416.63 करोड़ रुपये से 1,803.34 करोड़ रुपये (34.55% की कमी) अधिक है। इसके अतिरिक्त, 12,000 करोड़ रुपये की एक प्रस्तावित अवसंरचना योजना पाँच वर्षों से निर्माणाधीन है। समिति सिफ़ारिश करती है कि व्यय वित्त समिति नोट्स के साथ-साथ क्रियान्वयन रूपरेखा, राज्य-वार अवशोषण योजनाएँ तथा केंद्र-राज्य लागत साझेदारी ढांचा  भी प्रस्तुत किया जाए, जिन्हें मापनीय परिणामों से जोड़ा जाए। (पैरा 2.4–2.5)

(iii) एएमएएसआर अधिनियम में संशोधन एवं स्मारकों में स्टाफिंग: भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (एएसआई) तथा स्मारकों में गंभीर स्तर पर स्टाफ की कमी बनी हुई है, यहाँ तक कि कुछ केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों पर कोई सुरक्षा कर्मी तक उपलब्ध नहीं है। समिति सिफ़ारिश करती है कि एएमएएसआर अधिनियम में संशोधन को शीघ्र पारित किया जाए, अधिसूचना समाप्त करने हेतु 90 दिनों की समय-सीमा के साथ मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) निर्धारित की जाए, तथा केंद्रीय रूप से संरक्षित स्मारकों के लिए एक समुचित स्टाफिंग योजना तैयार की जाए। (पैरा 3.14)

(iv) कारपोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) एवं संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडी) के माध्यम से वैकल्पिक वित्तपोषण रणनीति: वित्त वर्ष 2022-23 में कंपनी अधिनियम, 2013 की अनुसूची VII के अंतर्गत विरासत, कला एवं संस्कृति पर कारपोरेट व्यय लगभग 441 करोड़ रुपये रहा। समिति सिफ़ारिश करती है कि संग्रहालयों, पुस्तकालयों एवं धरोहर संरक्षण के लिए एक समर्पित सीएसआर सहभागिता योजना तैयार की जाए। साथ ही, संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के अंतर्गत सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण को एक पात्र व्यय श्रेणी के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव भी किया जाए। (पैरा 1.14)

(v) स्वायत्त निकायों के लिए अनुदान-सहायता वेतन मद में कमी: अनुदान-सहायता वेतन मद को 429 करोड़ रुपये से घटाकर 352 करोड़ रुपये कर दिया गया है, अर्थात 77 करोड़ रुपये (17.95%) की कमी, जबकि 34 स्वायत्त निकाय पूर्णतः वेतन व्यय के लिए सरकारी अनुदानों पर निर्भर हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि प्रत्येक निकाय के अनुसार आबंटन का विस्तृत विवरण, वर्तमान रिक्तियों की स्थिति तथा इस कटौती के प्रभाव का समग्र मूल्यांकन प्रस्तुत किया जाए। (पैरा 1.16)

. प्रतिवेदन संख्या 389: पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय (मांग संख्या 78; 5,164.80 करोड़ रुपये)

(i) नई जहाज निर्माण योजनाओं हेतु टास्क फोर्स का गठन: तीन नवस्वीकृत योजनाएँ— एसबीएफएएस, एसबीडीएस और एमडीएफ —कुल मिलाकर 1,765 करोड़ रुपये (नेट जीबीएस का लगभग 34%) का प्रावधान रखती हैं, किंतु इनके संचालन दिशानिर्देश केवल 26 दिसम्बर, 2025 को जारी किए गए हैं तथा राष्ट्रीय जहाज निर्माण मिशन को नोडल समन्वय निकाय के रूप में अभी औपचारिक रूप से गठित नहीं किया गया है। वर्तमान में भारत का वैश्विक जहाज निर्माण क्षमता में योगदान 1% से भी कम है। समिति सिफ़ारिश करती है कि इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु समयबद्ध लक्ष्यों के साथ एक समर्पित टास्क फोर्स का गठन किया जाए। (पैरा 2.3)

(ii) पोर्ट क्षमता उपयोग लेखा परीक्षण एवं जेएनपीएडीएफसी रेल लिंक:प्रमुख बंदरगाहों की कार्गो हैंडलिंग क्षमता 1,681 एमटीपीए तक पहुँच चुकी है, जबकि वास्तविक थ्रूपुट 854.86 एमएमटी है, जो केवल 50–60% क्षमता उपयोग को दर्शाता है। साथ ही, जेएनपीए (जवाहरलाल नेहरू पोर्ट प्राधिकरण) को समर्पित माल गलियारा (डीएफसी) से कनेक्टिविटी न होने के कारण इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता मुंद्रा बंदरगाह की तुलना में प्रभावित हुई है। समिति सिफारिश करती है कि सभी 12 प्रमुख बंदरगाहों में पोर्ट क्षमता उपयोग लेखा परीक्षण कराया जाए तथा जेएनपीएडीएफसी रेल लिंक परियोजना को शीघ्रता से पूर्ण किया जाए। (पैरा 3.7)

(iii) समुद्री नम्यता एवं व्यापार विविधीकरण ढांचा: पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण फरवरी 2026 से लाल सागर मार्ग में व्यवधान उत्पन्न हुआ, जिससे पारगमन समय में 10–14 दिनों की वृद्धि हुई तथा जेट ईंधन की कीमतों में 58.4% की वृद्धि दर्ज की गई। वर्तमान में भारत के निर्यात-आयात कार्गो का केवल 5% ही भारतीय ध्वज वाले जहाजों के माध्यम से परिवहन होता है। समिति सिफ़ारिश करती है कि इस प्रकार की बाहरी चुनौतियों से निपटने हेतु समुद्री नम्यता एवं व्यापार विविधीकरण ढांचा (एमआरटीडीएफ) को लागू किया जाए। (पैरा 7.3)

(iv) कालूघाट इंटरमॉडल टर्मिनल का स्वतंत्र आकलन: राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (एनडब्ल्यू-1) पर स्थित कालूघाट टर्मिनल पर 125 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश होने के बावजूद अब तक एक भी पोत नहीं आया है। इसके अतिरिक्त, देश के 32 परिचालित अंतर्देशीय जलमार्गों में से लगभग 85% यातायात केवल पाँच जलमार्गों पर केंद्रित है। समिति सिफ़ारिश करती है कि कालूघाट टर्मिनल की जलवैज्ञानिक व्यवहार्यता तथा नौवहन क्षमता का स्वतंत्र आकलन कराया जाए, विशेषकर ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों के संदर्भ में। (पैरा 5.5)

(v) सागरमाला परियोजना के कार्यान्वयन की समीक्षा: लगभग एक दशक के बाद भी सागरमाला कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 839 परियोजनाओं में से केवल 277 (33%) परियोजनाएँ ही पूर्ण हो सकी हैं, जबकि 353 परियोजनाएँ अभी भी योजना चरण में हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं का समग्र मूल्यांकन किया जाए तथा समयबद्ध लक्ष्यों के साथ एक संशोधित कार्यान्वयन रोडमैप तैयार किया जाए। (पैरा 3.10)

. प्रतिवेदन संख्या 390: सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (मांग संख्या 86; 2,94,167.45 करोड़ रुपये)

(i) सड़क सुरक्षा के लिए मापने योग्य लक्ष्य और राष्ट्रीय राजमार्ग सुरक्षा गश्त: वर्ष 2024 में भारत में लगभग 4.73 लाख सड़क दुर्घटनाएँ तथा 1.70 लाख मौतें दर्ज की गईं, जिनमें से 52,600 से अधिक मौतें राष्ट्रीय राजमार्गों पर हुईं। वर्ष 2026-27 के आउटपुट आउटकम मॉनिटरिंग फ्रेमवर्क में दुर्घटनाओं और मृत्युदर में कमी के लक्ष्य स्पष्ट रूप से मात्रात्मक रूप में निर्दिष्ट नहीं हैं। समिति सिफ़ारिश करती है कि आउटकम बजट ढांचे के अंतर्गत दुर्घटनाओं एवं मृत्युदर में कमी के लिए स्पष्ट, मापनीय वार्षिक लक्ष्य निर्धारित किए जाएँ तथा उच्च दुर्घटना-प्रवण मार्गों पर एक समर्पित राष्ट्रीय राजमार्ग सुरक्षा गश्त की स्थापना की जाए। (पैरा 5.1 एवं 5.10)

(ii) एनएचएआई के लिए “कंप्लीशन फ़र्स्ट” नयाचार एवं डब्ल्यूआईपी परिसमापन योजना: राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) वर्तमान में 27,597 किमी सड़कों के निर्माण का प्रबंधन कर रहा है, जिसकी कुल पूंजी लागत लगभग 7.72 लाख करोड़ रुपये है, जिनमें से लगभग 13,228 किमी अभी निर्माणाधीन है। समिति सिफ़ारिश करती है कि नए ठेकों के आबंटन को मौजूदा लंबित परियोजनाओं में प्रगति से जोड़ा जाए, अर्थात् “कंप्लीशन फ़र्स्ट” दृष्टिकोण अपनाया जाए, साथ ही, एक डब्ल्यूआईपी (कार्य प्रगति पर है) परिसमापन योजना तैयार की जाए, जिसमें उन परियोजना खंडों की पहचान की जाए जहाँ निर्माण अवधि के दौरान ब्याज के कारण लागत वृद्धि का जोखिम अधिक है। (पैरा 3.4 एवं 3.4क)

(iii) शून्य-आधारित रखरखाव बजटिंग : वर्ष 2024-25 में रखरखाव मद में 86.4% की वृद्धि (2,500 करोड़ रुपये से बढ़कर 4,660 करोड़ रुपये) देखी गई, जो प्रतिक्रियात्मक बजटिंग को दर्शाती है। साथ ही, अनुदानों की मांगों में दर्शाए गए 6,000 करोड़ रुपये और मौखिक साक्ष्य के दौरान बताए गए 10,000 करोड़ रुपये के रखरखाव व्यय के बीच विसंगति पाई गई है। समिति सिफ़ारिश करती है कि शून्य-आधारित रखरखाव बजटिंग अपनाई जाए, जो नेटवर्क सर्वे वाहनों से प्राप्त अंतरराष्ट्रीय खुरदरापन सूचकांक (आईआरआई) के आंकड़ों पर आधारित हो। साथ ही, कुल रखरखाव व्यय का विस्तृत समन्वयन प्रस्तुत किया जाए। (पैरा 1.11–1.12)

(iv) भारतमाला एवं पोर्ट कनेक्टिविटी मिशन हेतु “लास्ट माइल टास्क फोर्स”: भारतमाला परियोजना (चरण-I) के अंतर्गत 34,800 किमी के लक्ष्य के विरुद्ध 21,785 किमी (63%) ही पूर्ण हो पाया है। पोर्ट कनेक्टिविटी सड़कों की स्थिति और भी कमजोर है, जहाँ 348 किमी के लक्ष्य के मुकाबले केवल 157 किमी (45%) ही पूर्ण हुआ है। साथ ही, चालू वर्ष में 6,346 किमी निर्माण उपलब्धि 10,000 किमी के लक्ष्य से 36.5% कम रही है। समिति सिफ़ारिश करती है कि शेष 13,015 किमी कार्य को शीघ्र पूर्ण करने हेतु एक “लास्ट माइल टास्क फोर्स” का गठन किया जाए तथा पोर्ट, शिपिंग एवं जलमार्ग मंत्रालय के साथ मिलकर एक संयुक्त पोर्ट कनेक्टिविटी मिशन संचालित किया जाए। (पैरा 3.6, 3.6क एवं 4.4)

(v) वाहन–बीमा एपीआई एकीकरण एवं राष्ट्रीय कैलिब्रेशन मानक: वाहन डाटाबेस में 41 करोड़ से अधिक वाहन अभिलेख उपलब्ध हैं, किंतु यह बीमा डाटा से अलग-थलग संचालित होता है। वहीं, 25 राज्यों में लागू आईटीएमएस के अंतर्गत जारी ई-चालानों की विधिक वैधता कैलिब्रेशन की सटीकता पर निर्भर करती है, जिसके लिए वर्तमान में कोई राष्ट्रीय मानक उपलब्ध नहीं है। समिति सिफ़ारिश करती है कि वाहन और बीमा सूचना ब्यूरो के बीच रियल-टाइम एपीआई एकीकरण स्थापित किया जाए, ताकि बिना बीमा वाले वाहनों की स्वचालित पहचान संभव हो सके। साथ ही, विधिक माप विज्ञान अधिनियम के अंतर्गत डिजिटल प्रवर्तन उपकरणों के लिए एक राष्ट्रीय कैलिब्रेशन मानक अधिसूचित किया जाए। (पैरा 7.1–7.2)

. प्रतिवेदन संख्या 391: पर्यटन मंत्रालय (मांग संख्या 99; 2,438.40 करोड़ रुपये)

(i) भारत पर्यटन संवर्धन बोर्ड एवं पृथक् प्रचार बजट: वर्ष 2026-27 में पर्यटन के विपणन तथा प्रचारात्मक गतिविधियों हेतु कोई पृथक् बजटीय प्रावधान नहीं किया गया है। विदेशी प्रचार एवं प्रसार मद के अंतर्गत 3.50 करोड़ रुपये की संपूर्ण राशि संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन(यूएनडब्ल्यूटीओ)को अनिवार्य अंशदान के रूप में आबंटित की गई है। समिति सिफ़ारिश करती है कि एक भारत पर्यटन संवर्धन बोर्ड  की स्थापना की जाए तथा प्रचार बजट को पृथक् करते हुए बहुवर्षीय सुनिश्चित मद के रूप में रखा जाए, जिसका न्यूनतम स्तर कुल पर्यटन अवसंरचना व्यय से संबद्ध हो। (पैरा 1.4–1.4क)

(ii) त्रैमासिक व्यय अनुशासन ढांचा: वर्ष 2024-25 में 2,479.62 करोड़ रुपये के बजट प्राक्कलन के विरुद्ध केवल 164.07 करोड़ रुपये (6.6%) का ही व्यय हुआ, जो लगातार तीन वर्षों से कम उपयोग की प्रवृत्ति को दर्शाता है। समिति सिफ़ारिश करती है कि एक अनिवार्य त्रैमासिक व्यय कार्यक्रम लागू किया जाए—क्वार्टर1 में 20%, क्वार्टर 2 में 25%, और क्वार्टर 3 में 30% व्यय सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, उपयोग प्रमाण पत्र  प्रस्तुत करने हेतु एक डिजिटल पोर्टल विकसित किया जाए, जिसमें उल्लंघन की स्थिति में स्वतः राज्यों के मुख्य सचिवों को सूचना प्रेषित की व्यवस्था हो। (पैरा 1.11)

(iii) स्वदेश दर्शन एवं सीबीडीडी हेतु प्रदर्शन-आधारित परियोजना स्वीकृति:
स्वदेश दर्शन 2.0 एवं सीबीडीडी के अंतर्गत 91 सक्रिय परियोजनाओं में से 84.6% परियोजनाएँ अभी भी 25% से कम भौतिक प्रगति पर हैं। केवल 7 परियोजनाएँ ही 31 मार्च, 2026 तक पूर्ण होने की संभावना है। समिति सिफ़ारिश करती है कि भविष्य में परियोजनाओं की स्वीकृति को राज्यों के पूर्व प्रदर्शन—जैसे भौतिक प्रगति, निधि उपयोग एवं रखरखाव क्षमता—से जोड़ा जाए, अर्थात् एक औपचारिक प्रदर्शन-आधारित तंत्र विकसित किया जाए। (पैरा 2.7)

(iv) भारतीय दूतावासों में पर्यटन अधिकारी एवं आयुर्वेद/योग पर्यटन रणनीति: विदेशी पर्यटकों के आगमन एवं विदेशी मुद्रा आय में गिरावट दर्ज की गई है, तथा वैश्विक पर्यटन में भारत की हिस्सेदारी अभी भी 2% से कम बनी हुई है। समिति सिफ़ारिश करती है कि प्रमुख स्रोत देशों में स्थित भारतीय दूतावासों में नामित पर्यटन अधिकारियों की नियुक्ति की जाए। साथ ही, आयुष मंत्रालय के समन्वय से आयुर्वेद एवं योग पर्यटन के लिए एक समर्पित प्रचार-रणनीति विकसित की जाए। (पैरा 1.4क एवं 6.3)

(v) प्रशाद परियोजनाओं हेतु पूर्व-स्वीकृति समुचित जांच: गोवा स्थित बॉम जीसस बेसिलिका (16.46 करोड़ रुपये) परियोजना एएसआई के हस्तक्षेप के बाद लगभग 24% प्रगति पर रुक गई, जबकि आंध्र प्रदेश के अन्नवरम मंदिर नगर (25.33 करोड़ रुपये) परियोजना में निविदाकारण में विलंब के कारण देरी हुई। समिति सिफ़ारिश करती है कि सभी नई प्रशाद परियोजनाओं के लिए स्पष्ट भूमि स्वामित्व एवं अंतर-विभागीय स्वीकृतियाँ को स्वीकृति के समय अनिवार्य पूर्व-शर्त बनाया जाए। साथ ही, किसी भी विचलन के लिए 30 दिनों की मानक संचालन प्रक्रिया निर्धारित की जाए। (पैरा 2.11)

          पूर्ण प्रतिवेदन राज्य सभा की वेबसाइट https://sansad.in/rs/hi समितियाँ सभा समितियाँ विभागों से संबद्ध स्थायी समितियाँ परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी समिति- प्रतिवेदन पर उपलब्ध है।

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आरकेके


(रिलीज़ आईडी: 2248571) आगंतुक पटल : 89