राज्यसभा सचिवालय
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विभाग-संबंधित कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति की 162वीं रिपोर्ट पर प्रेस विज्ञप्ति

प्रविष्टि तिथि: 16 MAR 2026 6:03PM by PIB Delhi

श्री बृज लाल, संसद सदस्य, राज्य सभा की अध्यक्षता में विभाग-संबंधित कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने दिनांक 16 मार्च , 2026 को न्याय विभाग (विधि और न्याय मंत्रालय) की अनुदान मांगों (2026-27) के संबंध में अपना 162वां प्रतिवेदन संसद की दोनों सभाओं में प्रस्तुत किया।

अनुदान मांगों की जांच करते समय, समिति ने 19 फरवरी, 2026 को आयोजित बैठक के दौरान चालू वित्तीय वर्ष में भारत की संचित निधि से किए गए व्यय के संबंध में राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए), राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) और भारत के उच्चतम न्यायालय के साथ-साथ न्याय विभाग के निष्पादन, कार्यक्रमों और नीतियों का मूल्यांकन भी किया है।

समिति ने न्याय विभाग के सचिव के साथ अपनी बैठक में अनुदान मांगों की गहन जांच की। समिति द्वारा 12 मार्च, 2026 को प्रतिवेदन पर विचार किया गया और उसे स्वीकार किया गया। इस प्रतिवेदन में समिति द्वारा की गई सिफारिशें/समुक्तियां संलग्न हैं। संदर्भ के उद्देश्य से प्रत्येक सिफारिश/समुक्ति के अंत में प्रतिवेदन के पैरा संख्या का उल्लेख किया गया है। संपूर्ण प्रतिवेदन https://sansad.in/rs/hi  पर उपलब्ध है।

 

न्याय विभाग (विधि और न्याय मंत्रालय) की अनुदान मांगों (2026-27 ) के संबंध में 162वें  प्रतिवेदन की सिफारिशें/समुक्तियां

न्याय विभाग

अनुदान मांगों का समग्र मूल्यांकन

1. समिति ने समुक्ति की है कि विभाग को वर्ष 2026–27 के बजट अनुमान (बीई) के तहत किया गया प्रावधान वर्ष 2025–26 के संशोधित अनुमान की तुलना में यद्यपि थोड़ा-सा अधिक है, तथापि यह विभाग द्वारा किए गए अनुमानों से अभी भी काफी कम है। समिति ने आगे नोट किया कि 09 फरवरी 2026 की स्थिति के अनुसार, वर्ष 2025–26 के दौरान किया गया व्यय ₹2,027.87 करोड़ है, जो ₹2,847.03 करोड़ के संशोधित अनुमान का लगभग 71 प्रतिशत है। अनुमानों, आवंटन तथा व्यय की गति के बीच विद्यमान अंतराल को ध्यान में रखते हुए, समिति का मत है कि बजट अनुमानों एवं वास्तविक व्यय के रूझानों के बीच अधिक घनिष्ठ सामंजस्य की आवश्यकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि विभाग भविष्य के बजट प्रस्ताव तैयार करते समय अपनी आवश्यकताओं और कार्यान्वयन क्षमता का यथार्थवादी आकलन करे, ताकि निधियों का इष्टतम उपयोग तथा कार्यक्रमों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 1.12)

न्याय विभाग की योजनाएं

2.         समिति ने नोट किया कि न्यायपालिका के लिए अवसंरचना सुविधाओं के विकास हेतु केंद्र प्रायोजित योजना (सीएसएस) ने राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में न्यायिक अवसंरचना को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जैसाकि संचित रूप से केन्‍द्रीय सहायता जारी किए जाने तथा कोर्ट हॉल और आवासीय इकाइयों के निर्माण से परिलक्षित होता है। तथापि, समिति इस ने बात पर चिंता व्यक्त की है कि 202526 के दौरान योजना के अंतर्गत पर्याप्त राशि जारी किए जाने के बावजूद, अनेक राज्यों में व्यय की गति और निधियों के उपयोग की स्थिति संतोषजनक नहीं रही है।                                                                                                                    (पैरा 1.20)

3.         अतः समिति सिफारिश करती है कि विभाग, राज्य सरकारों तथा उच्च न्यायालय स्तर की निगरानी समितियों के साथ समन्वय स्थापित करके, निधियों के समयबद्ध उपयोग और परियोजनाओं की त्वरित पूर्णता सुनिश्चित करने हेतु निगरानी एवं समीक्षा तंत्र को सुदृढ़ करे। समिति यह भी सिफारिश करती है कि विभाग प्रक्रियागत तथा प्रणालीसम्बंधी अवरोधों को दूर करने के लिए सक्रिय कदम उठाए, जिनमें एसएनएस्पर्श रूपरेखा के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु क्षमतानिर्माण के उपाय भी शामिल हों, ताकि योजना के उद्देश्यों हासिल किया जा सके।

(पैरा 1.21)

4.         समिति यह भी सिफारिश करती है कि विभाग न्यायिक प्राधिकारियों एवं राज्य सरकारों के साथ समन्वय स्थापित करके देशव्यापी स्तर पर न्यायालयी अवसंरचना के उन्नयन हेतु समयबद्ध उपाय करे। समिति ने न्यायालय परिसरों के लिंगसंवेदनशील डिज़ाइन की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें महिला अधिवक्ताओं, मुवक्किलों एवं कर्मियों के लिए पृथक और पर्याप्त सुविधाओं के साथसाथ न्यायालय परिसरों के भीतर समर्पित बाल देखभाल एवं शिशुसदन की सुविधाओं का प्रावधान भी सम्मिलित हो। समिति आगे सिफारिश करती है कि डिजिटल अवसंरचना में विद्यमान खामियों तथा न्यायालयों में उपयुक्त नेटवर्क कनेक्टिविटी के अभाव को शीघ्रतापूर्वक दूर किया जाए। समिति ने इस बात पर भी बल दिया है कि ऐसी सुविधाएँ केवल भारत के उच्चतम न्यायालय तक ही सीमित न रहें, बल्कि उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायालयों तक समान रूप से विस्तारित की जाएँ।                                                                                                           (पैरा 1.22)

5.         समिति का विचार है कि ग्राम न्यायालयों का उद्देश्य जमीनी स्तर पर न्याय की सुलभता को बेहतर बनाना था। इनकी स्थापना से ये विशेषत: ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में तीव्र, किफायती और विकेंद्रीकृत न्याय प्रदान करने में सक्षम होंगे। इसके अतिरिक्त, ग्राम न्यायालयों की सफलता उनके नियमित संचालन, बुनियादी अवसंरचना की उपलब्धता, प्रशिक्षित न्यायिक अधिकारियों की उपस्थिति और राज्य सरकारों से पर्याप्त समर्थन पर निर्भर करती है।

(पैरा 1.27)

6.         समिति समुक्ति करती है कि ग्राम न्यायालयों की स्थापना राज्यों के लिए अनिवार्य नहीं है और कई राज्यों में जहाँ ऐसे न्यायालय मौजूद हैं, वे केवल सप्ताह में केवल दो दिन कार्य करते हैं, जिससे मामलों के निपटान में उनकी प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।

(पैरा 1.28)

7.         समिति ने अपने 147वें प्रतिवेदन में सिफारिश की थी कि ग्राम न्यायालयों को सप्ताह में एक या दो दिन के बजाय सभी कार्यदिवसों पर संचालन करना चाहिए, के जवाब में विभाग ने कहा कि हालांकि यह मामला राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है, फिर भी विभाग ने इस संबंध में 30.04.2025 को राज्यों को एक पत्र जारी किया है। हालांकि, समिति ने अपने 147वें प्रतिवेदन में की गई सिफारिश दोहराई है कि ग्राम न्यायालयों को स्थानीय स्तर पर मामलों की लंबित फ़ाइलों को प्रभावी ढंग से कम करने के लिए सभी कार्यदिवसों पर संचालन करना चाहिए। समिति का मानना है कि न्यायाधिकारियों के पदों का शीघ्र सृजन और उनके रिक्त पदों को समय पर भरना ग्राम न्यायालयों के निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करेगा।

(पैरा 1.29)

8.         समिति ने ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना के तहत विभाग द्वारा ई-समिति, भारत के उच्चतम न्यायालय के मार्गदर्शन में डिजिटल अवसंरचना को सुदृढ़ बनाने और न्याय तक पहुंच बढ़ाने में की गई महत्वपूर्ण प्रगति की सराहना करती है। समिति सिफारिश करती है कि डब्ल्यूएएन परियोजना के तहत शेष न्यायालय परिसरों को शीघ्रता से जोड़ा जाए और निर्बाध सेवाओं के लिए पर्याप्त साइबर-सुरक्षा और सिस्टम रिडंडेंसी उपाय सुनिश्चित किए जाएं।

(पैरा 1.34)

9. समिति ने नोट किया है कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए संशोधित अनुमान के तहत 931.08 करोड़ की राशि जारी करने के मुकाबले, 20.01.2026 की स्थिति के अनुसार केवल 407.40 करोड़ का ही व्यय किया गया था। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि विभाग समयबद्ध सुधारात्मक उपाय अपनाए, जिसमें निधि के उपयोग की करीबी निगरानी, कार्यान्वयन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना, और कार्यान्वयन अभिकरणों तथा राज्य सरकारों के साथ बेहतर समन्वय शामिल हों, ताकि निधियों का इष्टतम और समय पर उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।

(पैरा 1.35)

10.  समिति ने देश भर में पिछड़े और कानूनी तौर पर कमज़ोर तबकों तक न्याय की पहुँच को सुदृढ़ बनाने के लिए टेली-लॉ, न्याय बंधु, न्याय मित्र, और विधिक साक्षरता तथा विधिक जागरूकता कार्यक्रम को एक साथ लाने में दिशा योजना अपनाए गए व्यापक और एकीकृत दृष्टिकोण की सराहना की।                                                                                              (पैरा 1.44)

11. समिति सिफारिश करती है कि विभाग टेली-लॉ के लिए कार्यान्वयन अभिकरणों के साथ समुचित आयोजना और समन्वय से सहमति ज्ञापनों का समय पर क्रियान्वयन सुनिश्चित कर सकता है और आवंटित निधि का इष्टतम उपयोग कर सकता है। समि‍ति यह भी सिफारिश करती है कि दिशा योजना के तहत लोगों में विधिक साक्षरता और विधिक जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए विभाग सोशल मीडिया और डिजिटल आउटरीच टूल्स का अधिकाधिक‍ इस्तेमाल करे।

(पैरा 1.45)

12. समिति नोट करती है कि वित्तीय वर्ष 2025–26 के दौरान कार्यरत फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों की संख्या के रूप में भौतिक उपलब्धि में सुधार हुआ है, किंतु 28.01.2026 तक निधियों का जारी होना, आवंटन की तुलना में काफी कम रहा है। अतः समिति सिफारिश करती है कि विभाग राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को निधियों का समय पर और पर्याप्त रूप से जारी होना सुनिश्चित करे तथा इसके साथ निरंतर और निकट निगरानी भी रखे, ताकि मौजूदा एफटीएससी का सुचारु संचालन बना रहे और बलात्कार तथा पोक्सो अधिनियम से संबंधित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए न्यायालयों की स्थापना का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

(पैरा 1.51)

 

विभाग में रिक्तियां

13. समिति नोट करती है कि 102 स्वीकृत पदों के मुकाबले वर्तमान में विभाग में केवल 63 अधिकारी/कर्मचारी ही कार्यरत हैं, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 39 प्रतिशत पद रिक्त हैं और इससे विभाग के समग्र कार्यकलाप पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। समिति ने अपने पूर्ववर्ती प्रतिवेदनों में भी न्याय विभाग की मानव संसाधन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गृह मंत्रालय पर निरंतर निर्भरता को लेकर चिंता व्यक्त की थी तथा विभाग के लिए एक पृथक कैडर इकाई स्थापित करने की सिफारिश की थी। समिति अपनी इस सिफारिश को दोहराती है।

(पैरा 1.53)

14. समिति का मानना है कि कर्मचारी संख्या की कमी विभाग के सुचारु संचालन में बाधा डालती है। समिति ने विभाग द्वारा इस कमी को दूर करने के लिए उठाए गए कदमों की सराहना करते हुए यह सिफारिश की है कि विभाग रिक्त पदों को भरने के मामले को डीओपीटी के साथ शीघ्रता से आगे बढ़ाए और उच्चतम स्तर पर इस मुद्दे को उठाकर एक स्वतंत्र कैडर की  जल्द स्वीकृति और क्रियान्वयन सुनिश्चित करे। इसके लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जानी चाहिए, ताकि लगातार चल रही मानव संसाधन की कमी को दूर किया जा सके और विभाग का सुचारु संचालन सुनिश्चित हो सके।

(पैरा 1.55)

उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की रिक्ति

15.       समिति नोट करती है कि 31.12.2025 की स्थिति के अनुसार, उच्च न्यायालयों में मामलों की कुल लंबित संख्या अभी भी काफी उच्च स्तर पर बनी हुई है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार, 25 उच्च न्यायालयों में कुल 44.67 लाख मामले लंबित हैं। इनमें से एक उच्च न्यायालय में लंबित मामलों की संख्या 10 लाख से अधिक है, जबकि 16 उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 1 लाख से अधिक है, जो उच्च न्यायपालिका पर लगातार प्रणालीगत दबाव को दर्शाता है।

(पैरा 1.60)

16. समिति समुक्ति करती है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सबसे अधिक लंबित मामले हैं, जो 12.07 लाख से अधिक हैं, इसके बाद राजस्थान उच्च न्यायालय (6.88 लाख मामले) और बॉम्बे उच्च न्यायालय (6.65 लाख मामले) हैं। इसके अलावा कई अन्य उच्च न्यायालय, जैसे मद्रास, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, पंजाब और हरियाणा, भी राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर लंबित मामलों का सामना कर रहे हैं, जो क्षेत्रीय क्षमता और मामलों के बोझ की चुनौतियों को दर्शाता है।

(पैरा 1.61)

17. समिति नोट करती है कि अधिकांश उच्च न्यायालयों में दीवानी (सिविल) मामलों की लंबित संख्या अधिक है, जबकि आपराधिक मामलों की लंबित संख्या भी बढ़ रही है। इस समस्या के समाधान के लिए अल्टरनेट डिस्प्यूट रिड्रेसल (एडीआर) को बढ़ावा दिया जा सकता है और इन मामलों को अरबिट्रेशन, मध्यस्थता, सुलह और लोक अदालतों को भेजा जा सकता है। दीवानी विवादों में प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता को अनिवार्य बनाना भी लंबित मामलों को कम करने में मदद करता है।

(पैरा 1.62)

18.       समिति का मत है कि केवल निपटान में क्रमिक सुधार लंबित मामलों की समस्या को हल करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए तत्काल उपाय आवश्यक हैं, जैसे न्यायिक रिक्तियों को समय पर भरना, अवसंरचना को मजबूत करना बेहतर केस मैनेजमेंट और तकनीक और अल्टरनेट डिस्प्यूट रिड्रेसल तंत्र का अधिकतम उपयोग।

(पैरा 1.63)

19. इसलिए समिति यह सिफारिश करती है कि विभाग, उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों के समन्वय में, प्रत्येक न्यायालय के लिए समयबद्ध कार्य योजना तैयार करे ताकि लंबित मामलों को कम किया जा सके और रिक्त पदों को तुरंत भरा जा सके। समिति यह भी सिफारिश करती है कि उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालयों सहित, सभी न्यायालयों में न्यायालय की कार्यवाहियों की चरणबद्ध लाइव-स्ट्रीमिंग बढ़ायी जाए और एआई आधारित उपकरणों के उपयोग को न्यायिक कार्य में समर्थन और दक्षता बढ़ाने के लिए अपनाने पर विचार किया जाए।

(पैरा 1.64)

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण

 

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) को आवंटित बजट का आकलन

20.       समिति इस बात को लेकर चिंतित है कि अनुमानित बजट आवंटन में कमी राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) की योजनाओं और कार्यक्रमों, जैसे कानूनी सहायता रक्षा परामर्श प्रणाली (एलएडीसीएस) के प्रभावी कार्यान्वयन को प्रभावित कर सकती है। अतः समिति यह सिफारिश करती है कि नालसा, विभाग के माध्यम से, वित्त मंत्रालय के समक्ष वित्तीय वर्ष 2026–27 के बजट अनुमानों में उपयुक्त वृद्धि के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करे, ताकि निधियों की कमी उसके वैधानिक दायित्वों के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधक न बने।

(पैरा 2.4)

नालसा की योजनाएँ/कार्यक्रम

 

21.       समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) अपनी मौजूदा विधिक सहायता सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच को बेहतर बनाने पर ध्यान दे। इसके लिए, उन जिलों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए जहां मामले अधिक लंबित है और जहाँ विचाराधीन कैदी अधिक हैं, ताकि विधिक सहायता उन लोगों तक पहुंच सके जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

(पैरा 2.27)

22. समिति यह भी सिफारिश करती है कि नालसा, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों, जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों और स्थानीय संस्थाओं के साथ समन्वय को मज़बूत करे ताकि विधिक सहायता कार्यक्रमों को बेहतर तरीके से लागू किया जा सके, विशेषकर ग्रामीण, आदिवासी और दूर-दराज के इलाकों में जहाँ न्याय तक पहुँच सीमित होती है। वर्ष 2026-27 के लिए अनुदान मांगों (डीएफजी) की जाँच के दौरान, समिति ने पाया कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) द्वारा बनाया गया थीम सॉन्ग ठीक को पर्याप्त दृश्यता नहीं मिली है और यह आम जनता के बीच अधिक विख्यात नहीं है। इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि थीम सॉन्ग की पहुँच और आउटरीच का समुचित रूप से संवर्धन करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं, विशेषकर आधार स्तर पर, ताकि विधिक सहायता और उससे जुड़े प्रयासों के बारे में लोगों की बीच जागरूकता बढ़ सके।

(पैरा 2.28)

 

23.       समिति इस बात पर ज़ोर देती है कि नालसा नियमित निगरानी के साथ-साथ आसान डिजिटल उपकरणों और फील्ड-बेस्ड आउटरीच का अधिक उपयोग करे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विधिक सहायता योजनाएँ, जिसमें विधिक जागरूकता कार्यक्रम और मोबाइल विधिक सहायता पहल शामिल हैं, भली भांति लागू की जाएं और वास्तविकता में देखे जाने वाले परिणाम उत्पन्न कर सकें।

(पैरा 2.29)

 

24. समिति सिफारिश करती है कि विभाग, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के साथ मिलकर, वर्ष 2026-27 के दौरान पुरानी और काम न करने वाली मोबाइल विधिक सहायता इकाइयों को नई गाड़ियों से बदलने के लिए समय पर कदम उठाए, इसके लिए आवश्यक निधि सुनिश्चित करे, और उनके नियमित उपयोग और देखभाल के लिए सही व्यवस्थाएँ करे। समिति यह भी सिफारिश करती है कि अलग-अलग राज्यों में इन गाड़ियों की काम करने की हालत में बड़े अंतर के कारणों की जांच की जाए और सुधार हेतु उपयुक्त कदम उठाए जाएं ताकि मोबाइल विधिक सहायता इकाइयां सभी राज्यों में, विशेषकर दूरस्थ और ग्रामीण इलाकों में प्रभावी रूप से काम कर सकें।

(पैरा 2.33)

नालसा में जन-बल की आवश्यकता

25. समिति ने सिफारिश की है कि सरकार नालसा के लिए अलग-अलग कैडर में संस्वीकृत शेष 35 पद बनाने में तेज़ी लाए, और यह काम एक निर्दिष्ट और तय समय पर हो, यह ध्यान में रखते हुए कि प्राधिकरण को सौंपे गए कार्यों, योजनाओं और आउटरीच गतिविधियों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है।

(पैरा 2.38)

26.       समिति नालसा द्वारा अपनी संस्थागत क्षमता को मज़बूत करने के लिए तुरंत और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर भी बल देती है। इसके लिए कर्मचारियों की कमी को दूर किया जाना चाहिए, विशेषकर निचले और मध्य लेवल पर, ताकि इसकी योजनाओं और कार्यक्रमों को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके और उनकी निगरानी की जा सके; डेटा की समय पर देखरेख हो सके; खातों का सही रखरखाव हो सके; और अभिलेखों का प्रभावी प्रबंधन हो सके।

(पैरा 2.39)

27.       समिति यह भी सिफारिश करती है कि नालसा को जल्द से जल्द एक आंतरिक लेखापरीक्षा विभाग या एक प्रतिबद्ध लेखापरीक्षा प्रकोष्ठ बनाना चाहिए ताकि वित्तीय अनुशासन और आंतरिक नियंत्रण को मजबूत किया जा सके और भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक द्वारा इसकी लेखापरीक्षा रिपोर्ट में बताई गई कमियों को प्रभावी रूप से दूर किया जा सके।

(पैरा 2.40)

राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल

एनजेए के कार्यक्रम

28. समिति नोट करती है कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को सरकार से पर्याप्त भौतिक अवसंरचना, अकादमिक सुविधाएं और वित्तीय समर्थन प्राप्त है। हालांकि, समिति समुक्ति करती है कि हाल के वर्षों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों की संख्या और प्रतिभागियों को कवरेज में कमी आई है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि अकादमी अपने अकादमिक नियोजन का समीक्षा करे ताकि मौजूद संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सके और अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम की पहुंच बढ़ाई जा सके।

(पैरा 3.16)

29.       समिति आगे समुक्ति करती है कि न्यायिक कार्य-निष्पादन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रभाव का कम आकलन हुआ है। समिति सिफारिश करती है कि अकादमी विशेष रूप से प्रौद्योगिकी के उपयोग, मामलों के प्रबंधन, साइबर क्राइम और विशेष मामलों को संभालने जैसे क्षेत्रों में, अपने प्रशिक्षण के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए साफ और परिमाणात्मक सूचकांक विकसित करे।

(पैरा 3.17)

30.न्यायिक व्यवहार की बढ़ती जनता द्वारा संवीक्षा को देखते हुए, समिति यह सिफारिश करती है कि अकादमी न्यायिक नैतिकता, महिलाओं और वल्नरेबल वर्गों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और आज के सामाजिक मुद्दों पर नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करे, जिसमें कार्यरत न्यायाधीशों के लिए समय-समय पर रिफ्रेशर कोर्स भी शामिल हों।

(पैरा 3.18)

31. समिति इस बात की सराहना करती है कि अकादमी द्वारा विदेशी न्यायाधीशों के लिए सफलतापूर्वक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। समिति इन प्रयासों की प्रशंसा करती है तथा अनुशंसा करती है कि ऐसे कार्यक्रमों को अकादमी के घरेलू न्यायिक आवश्यकताओं पर प्राथमिक ध्यान को कम किए बिना निरंतर जारी रखा जाए।

 (पैरा 3.19)

32.       समिति यह भी सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी न्यायाधीशों के लिए नए बने आपराधिक कानूनों, यानी भारतीय न्याय संहिता, 2023; भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023; और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 पर स्ट्रक्चर्ड और ज़रूरी प्रशिक्षण कार्यक्रम डिज़ाइन करे और लागू करे, और यह सुनिश्चित करे कि सभी न्यायिक स्तरों पर उन्हें समय पर शुरू किया जाए ताकि नए कानूनी फ्रेमवर्क को आसानी से और असरदार तरीके से लागू किया जा सके।

(पैरा 3.20)

एनजेए में रिक्तियाँ

33.       समिति नोट करती है कि अकादमी में अकादमिक पद समेत काफी संख्या में संस्वीकृत पद खाली हैं, जिससे प्रशिक्षण और अनुसंधान गतिविधियों की गंभीरता और उन्हें जारी रखने पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि खाली पद जल्दी भरे जाएं और अकादमी के बढ़ते काम को देखते हुए अकादमिक संकाय को मज़बूत करने की आवश्यकता का सही तरीके से अनुमान लगाया जाए।

(पैरा 3.22)

भारत का उच्चतम न्यायालय

 

भारत के उच्चतम न्यायालय को आवंटित बजट का आकलन (मांग सं. 67)

34.       समिति सिफारिश करती है कि भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा निधि के निरंतर और प्रभावी उपयोग और 2024-25 में अनुपूरक प्रावधानों की आवश्यकता को देखते हुए, एससीआई के लिए बजट अनुमान अधिक वास्तविक तरीके से बनाए जाने चाहिए, जिसमें पिछले व्यय के रूझानों को ध्यान में रखा जाए, ताकि अनुपूरक मांगों की आवश्यकता कम से कम हो और संस्थान का काम बिना किसी रुकावट के चलता रहे।

(पैरा 4.4)

35.       समिति आगे नोट करती है कि 2026-27 के लिए भारत के उच्चतम न्यायालय की अनुमानित आवश्यकता और उसके लिए दिए गए बजट अनुमान के बीच लगभग ₹128 करोड़ की कमी है। समिति जानना चाहती है कि क्या इस कमी से उच्चतम न्यायालय के काम करने के तरीके पर बुरा असर पड़ने की संभावना है और अगर ऐसा है, तो किन विशेष जगहों पर इसका असर पड़ सकता है।

(पैरा 4.5)

 

उच्चतम न्यायालय भवन का विस्तार (परियोजना)

36.       समिति का मानना ​​है कि भारत के उच्चतम न्यायालय के भवन का विस्तार करना आज के समय की आवश्यकता बन गई है, क्योंकि यहाँ पार्किंग की सही सुविधा, न्यायाधीशों के लिए अधिक चैंबर, वकीलों के लिए पर्याप्त जगह, सुरक्षा सेवाएँ और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारियों के लिए कार्यालय की अत्यधिक आवश्यकता है।

(पैरा 4.11)

37.       समिति यह सिफारिश करती है कि विस्तार की परियोजना को पूरा करने के लिए एक भली-भांति निर्धारित और वास्तविक समयसूची का क्रियान्वयन एजेंसी  द्वारा सख्ती से पालन किया जाए, ताकि परियोजना समय पर पूरी हो सके और देरी की वजह से लागत बढ़ने या अतिरिक्त निधि की आवश्यकता से बचा जा सके।

(पैरा 4.12)

38.       समिति यह नोट कर चिंतित है कि भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा उन बातों पर चिंता जताई गई है, जिसमें उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री में कुछ अधिकारियों के 20 से 30 वर्ष तक बने रहने की बात कही गई है। समिति का मानना ​​है कि इतने लंबे कार्यकालों का अगर विनियमन न किए जाए, तो इससे संस्थागत अनुशासन और प्रशासनिक निष्पक्षता पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

(पैरा 4.13)

39.       इसलिए, समिति भर्ती संबंधी नीतियों की नियमित समीक्षा, आवर्तनशील नियुक्तियाँ शुरू करने और न्यायालय की रजिस्ट्रियों में आंतरिक जवाबदेही तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता पर ज़ोर देती है, ताकि न्यायिक कामकाज में पारदर्शिता और निपुणता के सिद्धांतों को बनाए रखा जा सके।

(पैरा 4.14)

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आरकेके


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