मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय
मत्स्यपालन सब्सिडी पर विश्व व्यापार संगठन समझौता
प्रविष्टि तिथि:
03 FEB 2026 2:18PM by PIB Delhi
विश्व व्यापार संगठन–मात्स्यिकी सब्सिडी पर समझौता/ वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइज़ेशन-एग्रीमेंट ऑन फिशरीज़ सब्सिडीज़ (WTO-FSA) में हानिकारक सब्सिडियों पर प्रतिबंध लगाते हुए ओवरफिशिंग और ग्लोबल फिश स्टॉक की कमी को दूर करने का प्रावधान है। WTO-FSA पर हुई वार्ताएँ मुख्यतः तीन स्तंभों पर आधारित रही हैं अर्थात्-, (i) अवैध, असूचित और अनियमित मत्स्यन [इल्लीगल, अनरिपोर्टेड एंड अनरेगुलेटेड फिशिंग (IUU)], (ii) अत्यधिक मत्स्य भंडार (ओवरफिश्ड़ स्टॉक), और (iii) अत्यधिक मत्स्यन और आवश्यकता से अधिक मत्स्यन क्षमता [ओवरफिशिंग एंड ओवरकेपेसिटी (OCOF)]।
17 जून 2022 को 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के दौरान WTO-FSA अपनाया गया,जो पर्यावरणीय स्थायित्व (सस्टेनेबिलिटी) को अपने प्रमुख उद्देश्य के रूप में रखने वाला पहला WTO समझौता बन गया है। हालाँकि, WTO-FSA (चरण-I) में अन्य बातों के साथ-साथ दो स्तंभों, अर्थात् IUU फिशिंग और ओवरफिश स्टॉक से संबंधित सब्सिडी के विषय पर बातचीत सीमित हुई । जबकि, तीसरे स्तंभ यानी ‘OCOF' से संबंधित विषयों सहित मात्स्यिकी सब्सिडी पर एक व्यापक समझौते पर अभी भी WTO में वार्ता चल रही है।
मात्स्यिकी सब्सिडियों पर WTO की वार्ता, फरवरी 2024 में आयोजित 13वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन के दौरान जारी रहीं और इस अवसर पर भारत ने अपने लंबे समय से चले आ रहे रुख को दोहराया कि जिम्मेदार और स्थायी मत्स्यन (सस्टेनेबल फिशरीस) भारत के विशाल और वैविध्यतापूर्ण मत्स्यन समुदाय की प्रवृत्ति और प्रथाओं में अंतर्निहित है । इस संदर्भ में, मात्स्यिकी सब्सिडी पर किसी भी व्यापक समझौते में मत्स्यन समुदाय के हितों और कल्याण को ध्यान में रखा जाना चाहिए जो अपनी आजीविका और निर्वहन के लिए समुद्री संसाधनों पर निर्भर हैं। भारत ने इस बात पर बल दिया कि ऐतिहासिक रूप से, जहां मात्स्यिकी क्षेत्र में औद्योगिक बेड़ों (इंडस्ट्रियल फ्लीट्स) को दी जाने वाली सब्सिडी के कारण अत्यधिक दोहन (ओवर एक्सप्लोइटेशन) हुआ है, विकासशील देशों और छोटी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अपने मात्स्यिकी क्षेत्र में विकास और विविधता लाने के पहलू के अलावा अपने मछुआरों की खाद्य सुरक्षा और आजीविका सुरक्षा के लिए सब्सिडी महत्वपूर्ण है। यह वार्ता सस्टेनेबिलिटी की अवधारणा से जुड़ी है हालांकि मात्स्यिकी सब्सिडी पर कोई भी व्यापक समझौता सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं [कॉमन बट डिफ़रेंशिएटेड रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ एंड रिस्पेक्टिव कैपैबिलिटीज़ (CBDR- RC)] के सिद्धांतों पर तैयार किया जाना चाहिए। इसमें विशेष एवं भिन्नता के साथ उपाय [स्पेशल एंड डिफ़रेंशियल ट्रीटमेंट (S&DT)] के प्रावधानों को भी उचित रूप से शामिल किया जाना चाहिए, जैसा कि WTO के सभी समझौतों के मामले में होता है। भारत ने सदस्यों से आग्रह किया कि जो राष्ट्र समुद्र में दूरस्थ जलक्षेत्र में मत्स्यन करते हैं, उनपर एक्सक्लूसिव इकोनोमिक ज़ोन (EEZs) से आगे मत्स्यन गतिविधि या ततसंबंधी गतिविधियों के लिए दी जाने वाली सब्सिडी पर कम से कम 25 वर्षों की अवधि के लिए रोक (मोरटोरियम) लगाई जाए ।
(ग) मात्स्यिकी सब्सिडी पर WTO समझौता विश्व व्यापार संगठन की आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध है। भारत के वार्ता संबंधी रुख अंतर-मंत्रालयी परामर्शों के माध्यम से निर्धारित किए गए हैं, जिनमें तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ किए गए परामर्श तथा संबंधित हितधारकों से प्राप्त सुझाव शामिल हैं।
(घ) मात्स्यिकी सब्सिडी पर WTO समिति अधिसूचना आवश्यकताओं और नियमित रिपोर्टिंग के माध्यम से समझौते के कार्यान्वयन की देखरेख करती है। कोई भी सदस्य ऐसी अधिसूचनाओं और प्रदान की गई जानकारी के संबंध में अधिसूचित करने वाले सदस्य से अतिरिक्त जानकारी का अनुरोध कर सकता है।
(ड़) यह समझौता विवादों पर परामर्श और निपटान के उद्देश्य से विवाद निपटान तंत्र प्रदान करता है। यह तंत्र सभी सदस्यों के लिए समझौते के उद्देश्यपूर्ण और गैर-भेदभावपूर्ण अनुप्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। भारत यह सुनिश्चित करने के लिए डब्ल्यूटीओ में सक्रिय रूप से जुडा रहता है कि नियमों को निष्पक्ष, पारदर्शी और समान रूप से लागू किया जा सके।
यह जानकारी आज लोकसभा में मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री ,भारत सरकार श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने प्रश्न के उत्तर में दी।
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JP
(रिलीज़ आईडी: 2222499)
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